अध्याय 6: भक्ति-सूफी परंपराएँ
(धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ: लगभग 8वीं से 18वीं सदी तक)
1. परिचय
लगभग 8वीं से 18वीं शताब्दी के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में धार्मिक विश्वासों और आचरणों में बड़े बदलाव आए। इस काल को समझने के लिए इतिहासकार मूर्तिकला, स्थापत्य कला और "संत कवियों" (भक्ति और सूफी) की रचनाओं का उपयोग करते हैं।
2. धार्मिक विश्वासों की गंगा-जमुनी बनावट
2.1 महान और लघु परंपराएँ
इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों (जैसे रॉबर्ट रेडफील्ड) ने धार्मिक प्रक्रियाओं को दो वर्गों में बाँटा है:
* महान परंपरा (Great Tradition): वे कर्मकांड और पद्धतियां जिनका पालन समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग (पुरोहित, राजा) करते थे। ये अक्सर संस्कृत ग्रंथों (वेदों/पुराणों) पर आधारित थीं।
* लघु परंपरा (Little Tradition): वे स्थानीय आचार-विचार जिनका पालन कृषक और सामान्य जन करते थे।
पूजा प्रणालियों का समन्वय:
इस काल में इन दोनों परंपराओं के बीच संवाद हुआ।
* ब्राह्मणीय प्रचार: ब्राह्मणों ने सरल संस्कृत में पुराणों की रचना की ताकि स्त्रियां और शूद्र भी उन्हें समझ सकें।
* स्थानीय देवताओं का एकीकरण: स्थानीय जनजातीय देवी-देवताओं को पौराणिक देवताओं का रूप दिया गया।
* उदाहरण: पुरी (उड़ीसा) में स्थानीय देवता को जगन्नाथ (विष्णु का रूप) माना गया।
* स्थानीय देवियों को लक्ष्मी (विष्णु की पत्नी) या पार्वती (शिव की पत्नी) के रूप में मान्यता दी गई।
2.2 भेद और संघर्ष
* तांत्रिक पूजा: देवी की आराधना पद्धति को 'तांत्रिक' कहा जाता था। इसमें जाति और वर्ण भेद नहीं माना जाता था।
* वैदिक बनाम तांत्रिक: वैदिक परंपरा के समर्थक उन लोगों की निंदा करते थे जो यज्ञ और मंत्रों के बजाय तांत्रिक विधियों या भक्ति (इष्टदेव की पूजा) में विश्वास करते थे।
* जैन और बौद्ध धर्म से संघर्ष: भक्ति परंपरा के संतों ने अक्सर जैन और बौद्ध धर्मों का विरोध किया।
3. प्रारंभिक भक्ति परंपरा (दक्षिण भारत)
भक्ति परंपरा दो मुख्य धाराओं में बँटी थी:
* सगुण भक्ति: शिव, विष्णु या देवी की मूर्त रूप में आराधना।
* निर्गुण भक्ति: अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना।
3.1 अलवार और नयनार संत (तमिलनाडु)
छठी शताब्दी में तमिलनाडु में भक्ति आंदोलन का नेतृत्व अलवारों और नयनारों ने किया।
* अलवार: विष्णु भक्त (इनकी संख्या 12 थी)। इनकी रचनाओं का संकलन 'नलयिरादिव्यप्रबंधम्' है (इसे तमिल वेद कहा जाता है)।
* नयनार: शिव भक्त (इनकी संख्या 63 थी)। इनकी कविताओं का संकलन 'तवरम' है।
जाति के प्रति दृष्टिकोण:
* इन संतों ने जाति प्रथा और ब्राह्मणों की प्रभुता का विरोध किया।
* भक्त विभिन्न समुदायों (ब्राह्मण, किसान, शिल्पकार और "अस्पृश्य") से आते थे।
* उदाहरण: तोंदराडिप्पोडि (एक ब्राह्मण अलवार) ने कहा कि विष्णु को वे "दास" अधिक प्रिय हैं जो भक्त हैं, न कि वे चतुर्वेदी ब्राह्मण जो भक्तिहीन हैं।
3.2 स्त्री भक्त
इस परंपरा में स्त्रियों ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी:
* अंडाल (अलवार): इन्होंने स्वयं को विष्णु की प्रेयसी माना। इनके गीत आज भी गाए जाते हैं।
* कराइक्काल अम्मइयार (नयनार): ये शिव भक्त थीं। इन्होंने घोर तपस्या का मार्ग अपनाया और स्वयं को "राक्षसी" रूप में वर्णित किया ताकि वे पारंपरिक स्त्री सौंदर्य और कर्तव्यों से मुक्त होकर भक्ति कर सकें।
3.3 राज्य के साथ संबंध (चोल शासक)
* चोल सम्राटों (9वीं-13वीं सदी) ने भक्ति परंपरा को समर्थन दिया।
* उन्होंने शिव मंदिरों (चिदम्बरम, तंजावुर, गंगैकोंडचोलपुरम) का निर्माण करवाया और कांस्य मूर्तियां (नटराज) बनवाईं।
* चोल सम्राट परांतक प्रथम ने संत कवियों (अप्पार, संबंदर, सुंदरार) की मूर्तियां मंदिरों में स्थापित करवाईं।
4. कर्नाटक की वीरशैव (लिंगायत) परंपरा
* संस्थापक: 12वीं शताब्दी में बासवन्ना (एक ब्राह्मण और कलचुरी राजा के मंत्री)।
* अनुयायी: वीरशैव (शिव के वीर) या लिंगायत (लिंग धारण करने वाले)।
* विश्वास और आचरण:
* वे शिव की आराधना 'लिंग' रूप में करते हैं। पुरुष बाएं कंधे पर चांदी के पिटारे में लघु लिंग पहनते हैं।
* पुनर्जन्म का खंडन: वे मानते हैं कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाएगा, पुनर्जन्म नहीं होगा। इसलिए वे शवों को दफनाते हैं (जलाते नहीं)।
* जाति विरोध: उन्होंने जाति प्रथा और "दूषित" होने की अवधारणा का विरोध किया।
* सामाजिक सुधार: उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और वयस्क विवाह को मान्यता दी।
* वचन: उनकी शिक्षाएं कन्नड़ भाषा में रचे गए 'वचनों' में मिलती हैं।
5. उत्तरी भारत में धार्मिक उफान
* इस काल में उत्तर भारत में राजपूत राज्यों का उदय हुआ जहाँ ब्राह्मणों का वर्चस्व था।
* नाथ, जोगी और सिद्ध: ये धार्मिक नेता रूढ़िवादी ब्राह्मणवाद के बाहर थे। ये अधिकतर शिल्पी (जुलाहे आदि) समुदाय से थे। उन्होंने वेदों की सत्ता को चुनौती दी।
* तुर्कों का आगमन: 13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। इससे राजपूतों और ब्राह्मणों की शक्ति कम हुई, जिससे सूफी और नए भक्ति संतों के लिए रास्ता खुला।
6. इस्लामी परंपराएँ
6.1 शासक और शासित
* शासक (तुर्क/मुगल) सैद्धांतिक रूप से 'शरिया' (इस्लामी कानून) का पालन करते थे, लेकिन भारत जैसे गैर-मुस्लिम बहुल देश में उन्होंने लचीली नीति अपनाई।
* जिम्मी: वे गैर-मुस्लिम (हिंदू, ईसाई, यहूदी) जो 'जजिया' कर चुकाकर इस्लामी राज्य में संरक्षित रहते थे।
* शासकों ने हिंदू, जैन और अन्य मंदिरों को भी अनुदान दिए (जैसे अकबर और औरंगजेब)।
6.2 लोक प्रचलन में इस्लाम
* धर्मांतरित लोगों ने इस्लाम के 5 स्तंभों (एक ईश्वर, नमाज, रोजा, जकात, हज) को स्वीकार किया, लेकिन स्थानीय रीति-रिवाज भी जारी रखे।
* खोजा इस्माइली: इन्होंने कुरान के विचारों को स्थानीय गीतों (जीनन) के रूप में गाया।
* मस्जिद स्थापत्य: मस्जिदों की दिशा मक्का की ओर (मेहराब) होती थी, लेकिन बनावट स्थानीय होती थी।
* उदाहरण: केरल की मस्जिदें स्थानीय लकड़ी के घरों जैसी थीं, और बांग्लादेश की अतिया मस्जिद ईंटों की बनी थी।
6.3 समुदायों के नाम
* शुरू में "मुसलमान" या "हिंदू" शब्दों का प्रयोग कम होता था।
* लोगों को उनके क्षेत्र/जाति से पहचाना जाता था: तुर्की (तुरुष्क), ईरानी (पारसीक), या 'म्लेच्छ' (जो संस्कृत नहीं बोलते थे और वर्ण व्यवस्था नहीं मानते थे)।
7. सूफीमत का विकास
सूफी वे रहस्यवादी थे जिन्होंने इस्लाम की रूढ़िवादी व्याख्या का विरोध किया और ईश्वर की भक्ति/प्रेम पर जोर दिया।
7.1 खानकाह और सिलसिला
* खानकाह: सूफियों का निवास स्थान जहाँ वे अपने अनुयायियों के साथ रहते थे। इसका नियंत्रण 'शेख' (पीर/मुर्शीद) के हाथ में होता था।
* सिलसिला: इसका अर्थ है 'जंजीर'। यह शेख और मुरीद (शिष्य) के बीच का रिश्ता है जो पैगंबर मोहम्मद तक जाता है।
* जियारत: पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह पर यात्रा करना।
* उर्स: पीर की बरसी (इसे ईश्वर से पीर की आत्मा का विवाह माना जाता था)।
7.2 चिश्ती सिलसिला (सबसे प्रभावशाली)
भारत में चिश्ती सिलसिला सबसे सफल रहा क्योंकि उन्होंने स्थानीय परिवेश को अपनाया।
* महत्वपूर्ण संत:
* ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर) - गरीब नवाज।
* शेख निजामुद्दीन औलिया (दिल्ली)।
* बाबा फरीद (पंजाब)।
खानकाह का जीवन (शेख निजामुद्दीन औलिया):
* उनकी खानकाह दिल्ली (गियासपुर) में यमुना किनारे थी।
* यहाँ 'लंगर' (मुफ्त खाना) चलता था।
* अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम, सिपाही-कवि (अमीर खुसरो) सब यहाँ आते थे।
* उन्होंने स्थानीय योगिक क्रियाएं (सांस पर नियंत्रण) भी अपनाईं।
उपासना के तरीके:
* जियारत और कव्वाली: ईश्वर का नाम जाप (जिक्र) और आध्यात्मिक संगीत (समा/कव्वाली)। अमीर खुसरो ने 'कौल' (कव्वाली की शुरुआत) का प्रचलन किया।
* भाषा: चिश्तियों ने स्थानीय भाषा (हिंदवी) का प्रयोग किया। बाबा फरीद की रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में हैं। बीजापुर में 'दक्खनी' भाषा में लोरीनामा और शादीनामा लिखे गए।
7.3 सूफी और राज्य
* चिश्ती संत सत्ता और धन संचय से दूर रहते थे, लेकिन बिना मांगे मिले अनुदान (नकद या जमीन) को स्वीकार करते थे और उसे तुरंत खर्च कर देते थे।
* सुल्तान भी सूफियों का समर्थन चाहते थे ताकि उन्हें वैधता मिले।
* कभी-कभी सूफियों और सुल्तानों में तनाव भी होता था (जैसे झुककर प्रणाम करने के मुद्दे पर)।
8. नवीन भक्ति पंथ (उत्तर भारत)
8.1 कबीर (14वीं-15वीं सदी)
* पृष्ठभूमि: जुलाहा परिवार (जो हाल ही में मुसलमान बना था)।
* रचनाएं: उनकी वाणी 'बीजक', 'कबीर ग्रंथावली' और 'आदि ग्रंथ साहिब' में मिलती है।
* भाषा: सधुक्कड़ी (संत भाषा) और उलटबाँसी (उलटी उक्तियां)।
* दर्शन:
* उन्होंने हिंदू और इस्लाम दोनों के आडंबरों (मूर्तिपूजा, नमाज) का खंडन किया।
* सत्य को उन्होंने अल्लाह, राम, अलख, निराकार, शब्द और शून्य कहा।
* उन्होंने "निर्गुण भक्ति" का प्रचार किया।
8.2 बाबा गुरु नानक (1469-1539)
* जन्म: ननकाना साहिब (पंजाब)।
* सन्देश: निर्गुण भक्ति। उन्होंने यज्ञ, मूर्तिपूजा और कठोर तप का विरोध किया।
* ईश्वर: रब का कोई लिंग या आकार नहीं है। निरंतर नाम-जाप (सिमरन) ही उपासना है।
* शबद: उन्होंने पंजाबी में 'शबद' रचे।
* संगत: सामुदायिक उपासना के नियम बनाए।
* उत्तराधिकारी: अंगद को गुरु पद दिया। 5वें गुरु अर्जन देव ने 'आदि ग्रंथ साहिब' का संकलन किया। 10वें गुरु गोबिन्द सिंह ने 'खालसा पंथ' की स्थापना की और 5 प्रतीक (केश, कृपाण, कच्छ, कंघा, कड़ा) अनिवार्य किए।
8.3 मीराबाई (15वीं-16वीं सदी)
* परिचय: मारवाड़ की राजपूत राजकुमारी, मेवाड़ के सिसोदिया कुल में विवाह हुआ।
* विद्रोह: उन्होंने पति और राजमहल के नियमों को त्यागा। कृष्ण को अपना पति माना।
* गुरु: रैदास (चर्मकार) को अपना गुरु बनाया, जो जाति प्रथा को चुनौती थी।
* भक्ति: सगुण भक्ति (कृष्ण प्रेम)। उनके गीत गुजरात और राजस्थान में बहुत लोकप्रिय हैं।
8.4 शंकरदेव (असम)
* 15वीं सदी में वैष्णव धर्म का प्रचार किया।
* शिक्षा: 'भगवती धर्म' (भगवद्गीता पर आधारित)।
* नामघर: उन्होंने प्रार्थना गृह (नामघर) और सत्र (मठ) स्थापित किए।
* रचना: कीर्तनघोष।
9. निष्कर्ष
* इस काल में धर्म केवल मंदिरों या मस्जिदों तक सीमित नहीं था।
* संतों ने आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया जिससे धर्म जनसाधारण तक पहुँचा।
* भक्ति और सूफी परंपराओं ने जाति, धर्म और लिंग के भेदों को चुनौती दी और एक साझा संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) का निर्माण किया।
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