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Tuesday, 6 January 2026

Class 12 History Chapter 1 Notes in Hindi | ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ (Complete Notes)



     12th History Notes Hindi                           


    Class 12 History Chapter 1: ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ 

                                                                                            


1. परिचय और काल-निर्धारण

हड़प्पा सभ्यता, जिसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है, की सबसे विशिष्ट पुरावस्तु 'हड़प्पाई मुहर' है, जो सेलखड़ी नामक पत्थर से बनाई जाती थी। इन मुहरों पर जानवरों के चित्र और एक ऐसी लिपि के चिह्न हैं जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। इस सभ्यता के बारे में जानकारी हमें पुरातात्विक साक्ष्यों जैसे आवासों, मृदभाण्डों, आभूषणों, औजारों और मुहरों से मिलती है।

 * नामकरण: इस सभ्यता का नाम 'हड़प्पा' नामक स्थान पर पड़ा जहाँ यह पहली बार खोजी गई थी।

 * काल: सभ्यता का विकसित चरण (परिपक्व हड़प्पा) 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। इससे पहले की बस्तियों को 'आरंभिक हड़प्पा' और बाद की बस्तियों को 'उत्तर हड़प्पा' कहा जाता है।

 * विस्तार: इसका विस्तार अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, जम्मू, पाकिस्तान और भारत (गुजरात, राजस्थान, हरियाणा) तक था।


2. निर्वाह के तरीके (भोजन और कृषि)

हड़प्पा के निवासी पेड़-पौधों और जानवरों (मछली सहित) से भोजन प्राप्त करते थे।

 * आहार: जले हुए अनाज के दानों से पता चलता है कि वे गेहूँ, जौ, दाल, सफेद चना और तिल का उपयोग करते थे। गुजरात में बाजरे के दाने मिले हैं, जबकि चावल के साक्ष्य कम मिले हैं।

 * पशुपालन: जानवरों की हड्डियों (मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस, सूअर) से संकेत मिलता है कि ये जानवर पालतू थे। जंगली जानवरों जैसे वराह (सूअर), हिरण और घड़ियाल की हड्डियाँ भी मिली हैं।

 * कृषि प्रौद्योगिकी: मुहरों और मृण्मूर्तियों पर वृषभ (बैल) के चित्र मिले हैं, जिससे पता चलता है कि खेत जोतने के लिए बैलों का प्रयोग होता था। चोलिस्तान और बनावली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के प्रतिरूप मिले हैं।

 * जुते हुए खेत: कालीबंगन (राजस्थान) में जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं, जहाँ हल रेखाएँ समकोण पर काटती थीं, जो यह दर्शाता है कि एक साथ दो फसलें उगाई जाती थीं।

 * सिंचाई: अफगानिस्तान के 'शोर्तुघई' में नहरों के अवशेष मिले हैं, लेकिन पंजाब और सिंध में नहीं। धोलावीरा (गुजरात) में मिले जलाशयों का प्रयोग संभवतः कृषि के लिए जल संचयन हेतु किया जाता था। अनाज पीसने के लिए 'अवतल चक्कियों' का प्रयोग होता था।


3. मोहनजोदड़ो: एक नियोजित शहरी केंद्र

मोहनजोदड़ो एक विशाल और नियोजित शहर था जो दो भागों में विभाजित था: दुर्ग (Citadel) और निचला शहर (Lower Town)।

 * दुर्ग: यह ऊँचाई पर बना था क्योंकि यहाँ की संरचनाएँ कच्ची ईंटों के चबूतरे पर बनी थीं। इसे दीवारों से घेरा गया था, जो इसे निचले शहर से अलग करता था।

 * निचला शहर: यह आवासीय भवनों के लिए था और इसे भी दीवार से घेरा गया था। भवनों का निर्माण चबूतरों पर किया गया था जो नींव का कार्य करते थे।

 * ईंटें: सभी हड़प्पा बस्तियों में ईंटों का एक निश्चित अनुपात (लंबाई और चौड़ाई, ऊँचाई की क्रमशः चार गुनी और दोगुनी) होता था।

 * जल निकास प्रणाली: यहाँ की सड़कों और गलियों को एक 'ग्रिड' पद्धति में बनाया गया था जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। ऐसा लगता है कि पहले नालियों के साथ गलियाँ बनीं और फिर उनके बगल में घर बनाए गए। हर घर का गंदा पानी गली की नालियों में जाता था।


4. गृह स्थापत्य (घरों की बनावट)

मोहनजोदड़ो के आवासों में एक आँगन होता था जिसके चारों ओर कमरे बने होते थे।

 * निजता (Privacy): भूमि तल की दीवारों में खिड़कियाँ नहीं होती थीं और मुख्य द्वार से आंतरिक भाग या आँगन सीधा नहीं दिखता था।

 * सुविधाएँ: हर घर का अपना स्नानघर होता था जिसकी नालियाँ सड़क की नालियों से जुड़ी थीं। कई घरों में कुएँ थे जो ऐसे कमरे में बनाए जाते थे जहाँ बाहर से भी पहुँचा जा सके। मोहनजोदड़ो में कुल कुओं की संख्या लगभग 700 थी।


5. दुर्ग की विशेष संरचनाएँ

दुर्ग पर सार्वजनिक और विशिष्ट संरचनाएँ मिली हैं:

 * मालगोदाम: यह एक विशाल संरचना थी जिसका निचला हिस्सा ईंटों का था और ऊपरी हिस्सा (संभवतः लकड़ी का) नष्ट हो गया था।

 * विशाल स्नानागार: यह आँगन में बना एक आयताकार जलाशय था जो चारों ओर से गलियारे से घिरा था। जलाशय तक जाने के लिए उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियाँ थीं। इसे ईंटों और जिप्सम के गारे से जलबद्ध किया गया था। विद्वानों का मानना है कि इसका प्रयोग 'विशिष्ट अनुष्ठानिक स्नान' के लिए होता था।


6. सामाजिक भिन्नताओं का अवलोकन

पुरातत्वविद सामाजिक और आर्थिक भिन्नताओं को समझने के लिए दो मुख्य विधियों का प्रयोग करते हैं:

 * शवाधान (Burials): हड़प्पा में मृतकों को गर्तों (गड्डों) में दफनाया जाता था। कुछ कब्रों में मृदभाण्ड और आभूषण मिले हैं, जिससे पता चलता है कि वे मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास रखते थे। पुरुषों और महिलाओं दोनों के कंकालों के पास आभूषण मिले हैं। कहीं-कहीं ताँबे के दर्पण भी मिले हैं, लेकिन सामान्यतः हड़प्पावासी मृतकों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ दफनाने में विश्वास नहीं करते थे।

 * विलासिता की वस्तुएँ: वस्तुओं को 'उपयोगी' (पत्थर/मिट्टी की बनी रोज़मर्रा की वस्तुएँ जैसे चक्कियाँ) और 'विलास' (महंगी और दुर्लभ वस्तुएँ जैसे फयॉन्स के पात्र) में बाँटा गया है। महंगी वस्तुएँ मुख्यतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी बड़ी बस्तियों में मिली हैं, छोटी बस्तियों में नहीं।


7. शिल्प उत्पादन

चन्हुदड़ो (जो मोहनजोदड़ो की तुलना में बहुत छोटी बस्ती थी) लगभग पूरी तरह से शिल्प उत्पादन में संलग्न थी।

 * शिल्प कार्य: इसमें मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर निर्माण और बाट बनाना शामिल था।

 * सामग्री: मनके बनाने के लिए कार्नीलियन (लाल पत्थर), जैस्पर, स्फटिक, सेलखड़ी, ताँबा, काँसा, सोना, शंख और फयॉन्स का प्रयोग होता था।

 * तकनीक: सेलखड़ी (मुलायम पत्थर) से मनके बनाना आसान था, जबकि कठोर पत्थरों के लिए जटिल तकनीकें अपनाई जाती थीं। चन्हुदड़ो, लोथल और धोलावीरा में छेद करने के विशेष उपकरण मिले हैं।

 * शंख उद्योग: नागेश्वर और बालाकोट समुद्र तट के पास स्थित थे, इसलिए ये शंख की वस्तुएँ (जैसे चूड़ियाँ) बनाने के विशिष्ट केंद्र थे।


8. माल प्राप्त करने की नीतियाँ (व्यापार)

हड़प्पावासी कच्चा माल प्राप्त करने के लिए कई तरीके अपनाते थे:

 * बस्तियाँ स्थापित करना: जैसे शंख के लिए नागेश्वर और बालाकोट, और लाजवर्द मणि (Lapis Lazuli) के लिए अफगानिस्तान में 'शोर्तुघई'। लोथल से कार्नीलियन, सेलखड़ी और धातु प्राप्त की जाती थी।

 * अभियान भेजना: राजस्थान के खेतड़ी अंचल (ताँबे के लिए) और दक्षिण भारत (सोने के लिए) अभियान भेजे जाते थे। खेतड़ी क्षेत्र की संस्कृति को 'गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति' कहा गया है।

 * सुदूर क्षेत्रों से संपर्क: ताँबा संभवतः ओमान (अरब प्रायद्वीप) से भी मंगाया जाता था, क्योंकि हड़प्पाई पुरावस्तुओं और ओमानी ताँबे दोनों में 'निकल' के अंश मिले हैं। ओमान में एक हड़प्पाई मर्तबान भी मिला है।

 * मेसोपोटामिया से व्यापार: मेसोपोटामिया के लेखों में 'दिलमुन' (बहरीन), 'मगान' (ओमान) और 'मेलुहा' (हड़प्पा क्षेत्र) का जिक्र मिलता है। मेलुहा को 'नाविकों का देश' कहा गया है। यहाँ से कार्नीलियन, लाजवर्द मणि, ताँबा, सोना और लकड़ियाँ निर्यात होती थीं।


9. मुहरें, लिपि और बाट

 * मुहरें: मुहरों का प्रयोग लंबी दूरी के संपर्कों को सुविधाजनक बनाने के लिए होता था। सामान की सुरक्षा के लिए गाँठ पर गीली मिट्टी लगाकर मुहर की छाप (मुद्रांकन) लगाई जाती थी।

 * लिपि: हड़प्पाई लिपि एक 'रहस्यमय लिपि' है क्योंकि इसे आज तक पढ़ा नहीं जा सका है। यह वर्णमालीय नहीं थी और इसमें चिह्नों की संख्या बहुत अधिक (375 से 400) थी। यह दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।

 * बाट: विनिमय के लिए बाटों की एक सूक्ष्म प्रणाली थी। बाट सामान्यतः 'चर्ट' नामक पत्थर से बनाए जाते थे और घनाकार होते थे (बिना किसी निशान के)। निचले मानदंड द्विआधारी (1, 2, 4, 8, 16, 32...) और ऊपरी मानदंड दशमलव प्रणाली का अनुसरण करते थे।


10. प्राचीन सत्ता (शासक और प्रशासन)

हड़प्पाई समाज में जटिल फैसले लेने और उन्हें लागू करने के संकेत मिलते हैं (जैसे ईंटों का समान आकार)।

 * प्रसाद तथा शासक: मोहनजोदड़ो में एक विशाल भवन मिला है जिसे 'प्रासाद' कहा गया, लेकिन भव्य वस्तुएँ नहीं मिलीं। एक पत्थर की मूर्ति को 'पुरोहित-राजा' की संज्ञा दी गई।

 * सिद्धांत: कुछ पुरातत्वविद मानते हैं कि हड़प्पा समाज में सभी समान थे (कोई शासक नहीं)। कुछ मानते हैं कि कई शासक थे (मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के अलग-अलग राजा)। सबसे अधिक मान्य तर्क यह है कि यह एक ही राज्य था, क्योंकि पुरावस्तुओं, ईंटों और बस्तियों के नियोजन में अद्भुत समानता है।


11. सभ्यता का अंत

लगभग 1800 ईसा पूर्व तक चोलिस्तान जैसे क्षेत्रों में विकसित हड़प्पा स्थलों को त्याग दिया गया था। गुजरात और हरियाणा में नई बस्तियों में आबादी बढ़ी।

 * बदलाव: उत्तर हड़प्पा काल में विशिष्ट पुरावस्तुएँ (बाट, मुहरें, मनके) समाप्त हो गईं और लेखन व लंबी दूरी का व्यापार बंद हो गया।

 * कारण: इसके लिए जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अत्यधिक बाढ़, नदियों का सूख जाना या मार्ग बदल लेना जैसे कारण जिम्मेदार माने जाते हैं।


12. हड़प्पा सभ्यता की खोज का इतिहास

 * कनिंघम का भ्रम: भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) के पहले डायरेक्टर जनरल कनिंघम ने हड़प्पा की खोज की, लेकिन वे इसके महत्व को समझ नहीं पाए क्योंकि वे लिखित स्रोतों (चीनी तीर्थयात्रियों के वृतांत) पर निर्भर थे। उन्हें एक हड़प्पाई मुहर मिली थी, लेकिन वे इसे उस कालखंड में फिट करने की कोशिश कर रहे थे जिससे वे परिचित थे।

 * नई खोज: 1920 के दशक में दयाराम साहनी और राखाल दास बनर्जी ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में मुहरें खोज निकालीं। इसके आधार पर 1924 में ASI के डायरेक्टर जनरल जॉन मार्शल ने पूरे विश्व के सामने एक नई सभ्यता (सिंधु घाटी सभ्यता) की खोज की घोषणा की। मार्शल ने क्षैतिज खुदाई करवाई थी।

 * आर.ई.एम. व्हीलर: 1944 में ASI के डायरेक्टर जनरल बने व्हीलर ने खुदाई में 'स्तर-विन्यास' (Stratigraphy) की तकनीक अपनाई, जिससे पुरातात्विक खोजों को सही संदर्भ मिला।


                                 ........End......

 

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