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Tuesday, 6 January 2026

Class 12 History Chapter 2 Notes in Hindi , 'राजा, किसान और नगर' (Kings, Farmers and Towns) - (complete notes)





 अध्याय 2 : राजा, किसान और नगर                          

आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ: लगभग 600 ई.पू. से 600 ई.


1. पृष्ठभूमि और विकास

 * हड़प्पा के बाद: हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद लगभग 1,500 वर्षों के अंतराल में कई विकास हुए। इसी काल में सिंधु और उसकी उपनदियों के किनारे ऋग्वेद का लेखन हुआ।

 * बस्तियाँ और संस्कार: उत्तर भारत और कर्नाटक में कृषक बस्तियाँ बनीं और दक्कन में चरवाहा बस्तियाँ। महापाषाण (Megaliths) नाम के पत्थर के ढाँचे दक्षिण भारत में शवों के अंतिम संस्कार के लिए प्रयोग होते थे, जिनमें लोहे के उपकरण भी दफनाए जाते थे।

 * छठी शताब्दी ई.पू. का महत्त्व: इसे एक प्रमुख परिवर्तनकारी काल माना जाता है क्योंकि इसमें आरंभिक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों का विकास हुआ। साथ ही बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ।


2. अभिलेखशास्त्र (Epigraphy)

 * परिभाषा: अभिलेखों के अध्ययन को अभिलेखशास्त्र कहते हैं। अभिलेख पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तनों जैसी कठोर सतह पर खुदे होते हैं।

 * जेम्स प्रिंसेप: 1830 के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला।

 * पियदस्सी: अधिकांश अभिलेखों में राजा को 'पियदस्सी' (मनोहर मुखाकृति वाला) कहा गया है। कुछ में 'असोक' नाम भी मिलता है, जो बौद्ध ग्रंथों के अनुसार प्रसिद्ध शासक था।


3. प्रारंभिक राज्य: 16 महाजनपद

 * महाजनपद: बौद्ध और जैन ग्रंथों में 16 महाजनपदों का उल्लेख है। प्रमुख महाजनपद थे- वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति।

 * शासन प्रणाली:

   * अधिकांश पर राजा का शासन था।

   * 'गण' और 'संघ' (जैसे वज्जि) में समूह शासन (ओलीगार्की) होता था, जहाँ हर व्यक्ति राजा कहलाता था। महावीर और बुद्ध इन्हीं गणों से थे।

 * विशेषताएँ: प्रत्येक महाजनपद की एक किलेबंद राजधानी होती थी। स्थायी सेना और नौकरशाही के लिए भारी आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती थी।

 * धर्मशास्त्र: छठी शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने 'धर्मशास्त्र' नामक ग्रंथ लिखे, जिसमें शासकों (मुख्यतः क्षत्रिय) के लिए नियम बनाए गए। उनका काम कर वसूलना था।


4. मगध का उत्थान (सबसे शक्तिशाली महाजनपद)

 * कारण:

   * खेती की उपज बहुत अच्छी थी।

   * झारखंड में लोहे की खदानें थीं (उपकरण/हथियार के लिए)।

   * जंगलों में हाथी उपलब्ध थे (सेना के लिए)।

   * गंगा और उपनदियों से सस्ता आवागमन।

 * शासक: बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे महत्त्वाकांक्षी शासक।

 * राजधानी: पहले राजगाह (पहाड़ियों के बीच किलेबंद शहर) थी, बाद में पाटलिपुत्र (पटना) बनी।


5. मौर्य साम्राज्य (एक आरंभिक साम्राज्य)

* स्थापना: चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) ने की। साम्राज्य पश्चिमोत्तर में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था।

 * स्रोत: पुरातात्विक प्रमाण (मूर्तिकला), मेगस्थनीज़ का विवरण (इंडिका), कौटिल्य का अर्थशास्त्र, और असोक के अभिलेख।

 * असोक और धम्म:

   * असोक ने कलिंग (उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की।

   * अभिलेखों के माध्यम से 'धम्म' का प्रचार किया (बड़ों का आदर, दासों से उदार व्यवहार, धर्मों का सम्मान)।

 * प्रशासन:

   * पाँच प्रमुख केंद्र: पाटलिपुत्र (राजधानी), तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि।

   * तक्षशिला और उज्जयिनी व्यापारिक मार्ग पर थे, सुवर्णगिरि (सोने का पहाड़) कर्नाटक में सोने की खदान के लिए महत्वपूर्ण था।

 * सैन्य व्यवस्था (मेगस्थनीज़ के अनुसार): सेना संचालन के लिए एक समिति और छः उपसमितियां थीं:

   * नौसेना, 2. यातायात/खान-पान, 3. पैदल सैनिक, 4. अश्वारोही, 5. रथारोही, 6. हाथी।

 * महत्त्व: मौर्य साम्राज्य लगभग 150 साल चला। यह साम्राज्य पूरे उपमहाद्वीप में नहीं फैला था, लेकिन असोक को राष्ट्रवादी नेताओं ने प्रेरणा स्रोत माना।


6. राजधर्म के नवीन सिद्धांत (दक्षिण और अन्य क्षेत्र)

 * दक्षिण के सरदार: दक्षिण (तमिलकम) में चोल, चेर और पाण्ड्य सरदारियों का उदय हुआ। ये समृद्ध और स्थायी थे। संगम ग्रंथों में इनका विवरण मिलता है।

 * दैविक राजा (Kushanas):

   * कुषाण शासकों (मध्य एशिया से पश्चिमोत्तर भारत तक) ने राजत्व के लिए दैविक सिद्धांत अपनाया।

   * मथुरा (माट) और अफगानिस्तान में उनकी विशालकाय मूर्तियाँ मिली हैं। वे खुद को 'देवपुत्र' कहते थे।

 * गुप्त साम्राज्य:

   * चौथी शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य सामंतों (Feudal lords) पर निर्भर था।

   * प्रशस्ति: इलाहाबाद स्तंभ पर हरिषेण द्वारा रचित 'प्रयाग प्रशस्ति' में समुद्रगुप्त की तुलना कुबेर, वरुण, इंद्र और यम जैसे देवताओं से की गई है।


7. बदलता हुआ देहात (कृषि और समाज)

 * जनता में राजा की छवि: 'जातक' और 'पंचतंत्र' की कहानियों (जैसे गंदतिन्दु जातक) से पता चलता है कि राजा और प्रजा के संबंध तनावपूर्ण थे। अधिक करों के कारण लोग जंगल में भाग जाते थे।

 * उपज बढ़ाने के तरीके:

   * हल का प्रयोग: लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग (गंगा/कावेरी घाटी)। पंजाब/राजस्थान में यह 20वीं सदी में शुरू हुआ।

   * धान की रोपाई: इससे उपज में भारी वृद्धि हुई।

   * सिंचाई: कुओं, तालाबों और नहरों (जैसे सुदर्शन झील) का निर्माण।

 * ग्रामीण समाज में भेदभाव: भूमिहीन खेतिहर श्रमिक, छोटे किसान और बड़े जमींदार (गहपति) उभरे। बड़े जमींदार शक्तिशाली होते थे।

 * भूमिदान (Land Grants):

   * ताम्र पत्रों पर अभिलेख मिलते हैं। भूमिदान आमतौर पर धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों को (अग्रहार) दिए जाते थे।

   * प्रभावती गुप्त: चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री। वाकाटक रानी के रूप में उसने भूमिदान दिया, जो दर्शाता है कि कुछ महिलाओं के पास संपत्ति का अधिकार था।

   * भूमिदान का उद्देश्य कृषि का विस्तार करना या कमजोर होते राजनीतिक प्रभुत्व को संभालना (सामंतों को खुश करना) हो सकता था।.


8. नगर एवं व्यापार

 * नए नगर: पाटलिपुत्र (नदी मार्ग), उज्जयिनी (भूतल मार्ग), पुहार (समुद्र तट), मथुरा (सांस्कृतिक/व्यावसायिक केंद्र)।

 * शहरी जनसंख्या: अमीर लोग 'उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र' (NBPW) का उपयोग करते थे। विभिन्न शिल्पों और श्रेणियों (Guilds) का उल्लेख मिलता है।

 * व्यापार:

   * उपमहाद्वीप के भीतर और बाहर (मध्य एशिया, रोमन साम्राज्य) व्यापक व्यापार था।

   * समुद्री मार्ग (अरब सागर, बंगाल की खाड़ी) का प्रयोग होता था।

   * काली मिर्च (रोमन साम्राज्य में भारी मांग), मसाले, कपड़े, जड़ी-बूटियों का निर्यात होता था।

 * सिक्के:

   * आहत सिक्के: (Punch-marked) चांदी और तांबे के, सबसे पहले ढाले गए।

   * हिंद-यूनानी: सबसे पहले राजाओं के नाम और चित्र वाले सिक्के जारी किए।

   * कुषाण: प्रथम शताब्दी ई. में बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के जारी किए (रोमन सिक्कों के समान वजन)।

   * गुप्त: इनके सोने के सिक्के अति उत्तम थे। छठी शताब्दी ई. के बाद सोने के सिक्के कम मिलने लगे, जो आर्थिक संकट या व्यापार में कमी का संकेत हो सकता है।


9. लिपियों का अर्थ निकालना (Deciphering Scripts)

 * ब्राह्मी: आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी। 1838 में जेम्स प्रिंसेप ने इसे पढ़ा। उन्होंने 'अ' अक्षर की पहचान की।

 * खरोष्ठी: पश्चिमोत्तर के अभिलेखों में प्रयुक्त। हिंद-यूनानी सिक्कों (द्विभाषी) की मदद से इसे पढ़ा गया।

 * ऐतिहासिक साक्ष्य: असोक के अभिलेखों से युद्ध के प्रति उसकी वेदना (कलिंग युद्ध के बाद) का पता चलता है।

 * अभिलेखों की सीमाएँ:

   * अक्षर हल्के खुदे होना या नष्ट हो जाना।

   * वास्तविक अर्थ समझना मुश्किल होना।

   * अभिलेख केवल "बड़े और विशेष" अवसरों का वर्णन करते हैं, दैनिक जीवन का नहीं।

                                    

                             ....The End....



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