अध्याय 3: बंधुत्व, जाति तथा वर्ग
(आरंभिक समाज: लगभग 600 ई.पू. से 600 ई.)
1. परिचय
लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी के मध्य आर्थिक और राजनीतिक जीवन में आए परिवर्तनों ने सामाजिक संरचना को प्रभावित किया।
* वन क्षेत्रों में कृषि का विस्तार हुआ जिससे जीवनशैली बदली।
* शिल्प विशेषज्ञों के सामाजिक समूहों का उदय हुआ।
* संपत्ति के असमान वितरण ने सामाजिक विषमताओं को बढ़ाया।
* इतिहासकार इन प्रक्रियाओं को समझने के लिए 'महाभारत' जैसे ग्रंथों का विश्लेषण करते हैं।
2. महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण (The Critical Edition of Mahabharata)
यह आधुनिक इतिहास लेखन की एक प्रमुख घटना थी।
* शुरुआत: 1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में यह परियोजना शुरू हुई।
* उद्देश्य: देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी गई संस्कृत पांडुलिपियों को एकत्रित करना और उनका विश्लेषण करना।
* प्रक्रिया: विद्वानों ने उन श्लोकों का चयन किया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में समान रूप से पाए गए थे।
* परिणाम:
* इस संस्करण का प्रकाशन 13,000 पृष्ठों में हुआ।
* परियोजना को पूरा करने में 47 वर्ष लगे।
* मुख्य निष्कर्ष:
* समानता: कश्मीर से लेकर केरल तक की पांडुलिपियों में कई अंशों में समानता पाई गई।
* क्षेत्रीय प्रभेद: शताब्दियों के दौरान हुए प्रेषण में कई क्षेत्रीय अंतर भी उभरे, जिन्हें पादटिप्पणियों (Footnotes) में दर्ज किया गया।
3. बंधुता एवं विवाह (Kinship and Marriage)
2.1 परिवारों की संरचना
* संस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए 'कुल' और बांधवों (रिश्तेदारों) के बड़े समूह के लिए 'जाति' शब्द का प्रयोग होता है।
* पितृवंशिकता (Patriliny): वह वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र और प्रपौत्र तक चलती है।
* मातृवंशिकता (Matriliny): जहाँ वंश परंपरा माँ से जुड़ी होती है।
2.2 पितृवंशिक व्यवस्था के आदर्श
* महाभारत दो दलों (कौरव और पांडव) के बीच भूमि और सत्ता को लेकर हुए संघर्ष की कहानी है, जो कुरु वंश से संबंधित थे।
* पांडवों की जीत के बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार को आदर्श माना गया।
* पुत्रों का महत्त्व: पिता की मृत्यु के बाद संसाधनों और सिंहासन पर पुत्रों का अधिकार होता था।
* अपवाद: कभी-कभी पुत्र न होने पर भाई या बंधु उत्तराधिकारी बनते थे। प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ (विशिष्ट परिस्थितियों में) सत्ता का उपभोग करती थीं।
2.3 विवाह के नियम
* बहिर्विवाह (Exogamy): गोत्र से बाहर विवाह करना। इसे ही अपेक्षित और 'सही' माना जाता था।
* अंतर्विवाह (Endogamy): अपने ही गोत्र, कुल या जाति में विवाह करना।
* कन्यादान: विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना जाता था।
* विवाह के प्रकार: धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में विवाह के आठ प्रकार माने गए हैं। इनमें से पहले चार 'उत्तम' और शेष चार 'निंदित' माने गए।
2.4 स्त्री का गोत्र (Rules of Gotra)
लगभग 1000 ई.पू. के बाद गोत्र व्यवस्था प्रचलित हुई। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था।
दो महत्वपूर्ण नियम:
* विवाह के बाद स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति का गोत्र अपनाना होता था।
* एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे।
सातवाहन राजाओं का अपवाद (Exceptions):
* सातवाहन राजाओं (दक्कन, 200 ई.पू. - 200 ई.) के अभिलेखों से पता चलता है कि कई रानियों ने विवाह के बाद भी अपने पिता का गोत्र (जैसे गौतम, वसिष्ठ) कायम रखा।
* यह अंतर्विवाह (बंधुओं में विवाह) का उदाहरण है, जो दक्षिण भारत में प्रचलित था।
2.5 क्या माताएँ महत्वपूर्ण थीं?
* सातवाहन राजाओं को उनके मातृनाम (माता के नाम) से चिह्नित किया जाता था (जैसे: गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि)।
* हालाँकि, सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक (पिता से पुत्र) ही होता था।
4. सामाजिक विषमताएँ: वर्ण व्यवस्था (Social Differences: Varna System)
3.1 आदर्श जीविका (Ideal Occupations)
धर्मशास्त्रों के अनुसार चार वर्णों के कार्य [cite: 618-621]:
* ब्राह्मण: वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना/करवाना, दान लेना/देना।
* क्षत्रिय: युद्ध करना, सुरक्षा देना, न्याय करना, वेद पढ़ना।
* वैश्य: कृषि, गौ-पालन, व्यापार, वेद पढ़ना।
* शूद्र: तीनों उच्च वर्णों की सेवा करना।
नियमों को लागू करने की रणनीतियाँ:
* [cite_start]इसे दैवीय व्यवस्था बताया गया (पुरुषसूक्त मंत्र के अनुसार, आदि मानव के शरीर से वर्णों की उत्पत्ति)।
* शासकों को इस व्यवस्था का पालन करवाने का उपदेश दिया गया।
3.2 अक्षत्रिय राजा (Kings who were not Kshatriyas)
शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय ही राजा हो सकते थे, लेकिन इतिहास में कई अपवाद हैं:
* मौर्य: बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं, लेकिन ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें 'निम्न' कुल का मानते हैं।
* शुंग और कण्व: ये मौर्यों के उत्तराधिकारी थे और ब्राह्मण थे।
* शक (Shakas): मध्य एशिया से आए थे, जिन्हें ब्राह्मण 'मलेच्छ' या बर्बर मानते थे। (प्रसिद्ध शक राजा रुद्रदामन ने सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार करवाया था)।
* सातवाहन: राजा गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को 'अनूठा ब्राह्मण' कहा और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया।
3.3 जाति और सामाजिक गतिशीलता
* जाति: यह भी जन्म पर आधारित थी, लेकिन वर्ण केवल चार थे जबकि जातियों की संख्या निश्चित नहीं थी।
* जब ब्राह्मणीय व्यवस्था का सामना नए समुदायों (जैसे निषाद या स्वर्णकार) से हुआ, तो उन्हें 'जाति' में वर्गीकृत किया गया।
* श्रेणी (Guilds): एक ही व्यवसाय वाले लोगों की जातियाँ कभी-कभी श्रेणियों में संगठित होती थीं।
* उदाहरण: मंदसौर (मध्य प्रदेश) के अभिलेख में रेशम बुनकरों की श्रेणी का वर्णन है जो लाट (गुजरात) से आए थे। इन्होंने सूर्य देवता का मंदिर बनवाया था।
3.4 चार वर्णों के परे: एकीकरण और बहिष्कार
* निषाद: वन में रहने वाले समुदाय (जैसे एकलव्य) जिन्हें ब्राह्मणीय व्यवस्था में जगह नहीं मिली।
* यायावर पशुपालक: इन्हें भी शंका की दृष्टि से देखा जाता था।
* मलेच्छ: जो लोग संस्कृत नहीं बोलते थे या बाहरी थे।
अस्पृश्य (Untouchables/Chandalas):
* कुछ कर्मों को 'दूषित' माना गया, जैसे शवों की अंत्येष्टि। इन्हें 'चाण्डाल' कहा गया।
* मनुस्मृति के अनुसार कर्तव्य: गाँव के बाहर रहना, फेंके हुए बर्तन इस्तेमाल करना, मरे हुए लोगों के वस्त्र पहनना।
* चीनी यात्रियों का विवरण:
* फा-शिएन (5वीं सदी): अस्पृश्यों को सड़क पर चलते समय करताल बजानी पड़ती थी ताकि लोग उन्हें देखने से बच सकें।
* श्वैन-त्सांग (7वीं सदी): सफाई करने वालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था।
5. जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा
4.1 संपत्ति पर स्त्री-पुरुष के अधिकार
* मनुस्मृति के अनुसार: पैतृक जायदाद पुत्रों में समान रूप से बँटनी चाहिए (ज्येष्ठ पुत्र को विशेष भाग)। स्त्रियाँ इसमें हिस्सेदारी नहीं मांग सकती थीं।
* स्त्रीधन: विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व होता था, जिसे उसकी संतान विरासत में ले सकती थी (पति का अधिकार नहीं)।
* वास्तविकता: भूमि, पशु और धन पर सामान्यतः पुरुषों का ही नियंत्रण था।
4.2 वर्ण और संपत्ति
* ब्राह्मण और क्षत्रिय सबसे धनी माने जाते थे, जबकि शूद्रों को निर्धन।
* बौद्ध दृष्टिकोण: बौद्ध धर्म ने वर्ण-आधारित प्रतिष्ठा को खारिज किया। उन्होंने माना कि सामाजिक विषमता मौजूद है लेकिन यह नैसर्गिक या स्थायी नहीं है।
4.3 एक वैकल्पिक सामाजिक रूपरेखा
* प्राचीन तमिलकम् (संगम साहित्य) में दानी सरदार का सम्मान होता था और कृपण (कंजूस) की निंदा की जाती थी। सरदार अपने चारणों और कवियों के आश्रयदाता होते थे।
6. सामाजिक अनुबंध (Social Contract - बौद्ध सिद्धांत)
बौद्ध ग्रंथ 'सुत्तपिटक' में एक मिथक है:
* प्रारंभ में मानव और वनस्पति जगत अविकसित थे और शांति थी।
* धीरे-धीरे बुराइयां (लालच, हिंसा) आईं।
* लोगों ने विचार किया कि एक ऐसे व्यक्ति (महासम्मत्त - महा चुना हुआ) को चुना जाए जो व्यवस्था बनाए रखे।
* बदले में लोग उसे चावल का अंश (कर/Tax) देंगे।
* यह सिद्धांत बताता है कि राजा का पद दैवीय नहीं बल्कि मानवीय चुनाव पर आधारित था।
7. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल: इतिहासकार और महाभारत
6.1 भाषा और विषयवस्तु
* भाषा: महाभारत की संस्कृत वेदों की संस्कृत से सरल है।
* विषयवस्तु (दो भाग):
* आख्यान (Narrative): कहानियों का संग्रह।
* उपदेशात्मक (Didactic): सामाजिक आचार-विचार के मानदंड (जैसे भगवद्गीता)।
6.2 लेखक और रचनाकाल (Who wrote it?)
ग्रंथ की रचना लगभग 1000 वर्षों (500 ई.पू. - 500 ई.) तक होती रही:
* सारथी/भाट (सूत): मूल कथा के रचयिता, जो मौखिक रूप से युद्धों का वर्णन करते थे।
* ब्राह्मण: 5वीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इसे लिखित रूप देना शुरू किया।
* विष्णु आराधना: 200 ई.पू. से 200 ई. के बीच श्रीकृष्ण (विष्णु रूप) का महत्व बढ़ा।
* मनुस्मृति का प्रभाव: 200-400 ई. के बीच उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए, जिससे ग्रंथ 1 लाख श्लोकों का हो गया। पारंपरिक रूप से रचयिता ऋषि व्यास माने जाते हैं।
6.3 पुरातत्व और महाभारत (Archaeology)
* हस्तिनापुर उत्खनन: 1951-52 में बी.बी. लाल ने मेरठ के पास हस्तिनापुर में खुदाई की।
* साक्ष्य: दूसरे स्तर (12वीं-7वीं सदी ई.पू.) पर कच्ची मिट्टी की ईंटें और सरकंडे की दीवारें मिलीं, जो महाभारत के भव्य महलों के वर्णन से मेल नहीं खातीं।
6.4 द्रौपदी का विवाह (बहुपति प्रथा - Polyandry)
* द्रौपदी का पाँच पांडवों से विवाह बहुपति प्रथा का उदाहरण है।
* स्पष्टीकरण: लेखक इसे जायज ठहराने के लिए कई तर्क देते हैं (जैसे पांडव इंद्र के अवतार थे, या पिछले जन्म का वरदान)।
* इतिहासकारों का मत: यह प्रथा हिमालय क्षेत्र में प्रचलित थी या युद्ध के समय स्त्रियों की कमी के कारण अपनाई गई होगी। ब्राह्मणों के लिए यह प्रथा अमान्य थी, इसलिए इसे 'चमत्कार' से जोड़ा गया।
8. एक गतिशील ग्रंथ (A Dynamic Text)
महाभारत केवल संस्कृत तक सीमित नहीं रहा।
* शताब्दियों तक इसके अनेक रूपांतरण (Versions) अलग-अलग भाषाओं में लिखे गए।
* इसकी कहानियों को मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्य और नाटकों में दर्शाया गया।
* आधुनिक व्याख्या: महाश्वेता देवी ने अपनी लघु कथा "कुंती ओ निषादी" में शोषित वर्ग (निषाद) की आवाज़ उठाई है, जिसका मूल महाभारत में उल्लेख नहीं है।
The END
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