अध्याय 4: विचारक, विश्वास और इमारतें
(सांस्कृतिक विकास: ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक)
1. परिचय
ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी का काल विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस काल में ईरान में जरथुस्त्र, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु और भारत में महावीर और बुद्ध जैसे चिंतकों का उद्भव हुआ ।
* उद्देश्य: इन्होंने जीवन के रहस्यों और इंसान व विश्व व्यवस्था के बीच रिश्तों को समझने की कोशिश की।
* स्रोत: बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथों के अलावा इमारतों और अभिलेखों (जैसे साँची का स्तूप) का इस्तेमाल इस काल को समझने के लिए किया जाता है ।
2. साँची की एक झलक (Sanchi Stupa)
साँची (मध्य प्रदेश) का स्तूप बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र है और उस युग की सबसे सुरक्षित बची हुई इमारतों में से एक है।
2.1 साँची का संरक्षण (The Preservation of Sanchi)
उन्नीसवीं सदी में यूरोपियों (फ्रांसीसी और अंग्रेज़) की दिलचस्पी साँची के तोरणद्वारों को अपने देश (पेरिस या लंदन) ले जाने में थी ।
साँची के बचने के कारण:
*प्लास्टर प्रतिकृतियाँ: फ्रांसीसी और अंग्रेज़ दोनों मूल कृति के बजाय प्लास्टर की प्रतिकृतियों (Copies) से संतुष्ट हो गए, जिससे मूल इमारत वहीं रह गई।
* भोपाल की बेगमों का योगदान:
* शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने इसके रखरखाव के लिए धन का अनुदान दिया।
* सुल्तानजहाँ बेगम ने वहां एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनवाई।
* उन्होंने जॉन मार्शल द्वारा साँची पर लिखे गए ग्रंथों के प्रकाशन के लिए भी धन दिया।
* रेल ठेकेदारों से बचाव: यह स्थान रेल ठेकेदारों और निर्माताओं की नज़र से बचा रहा, जिन्होंने अन्य स्थलों को नष्ट कर दिया था।
3. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद (Sacrifices and Debates)
3.1 वैदिक परंपरा
* पूर्व वैदिक काल (1500-1000 ई.पू.): ऋग्वेद में अग्नि, इंद्र और सोम जैसे देवताओं की स्तुति है। यज्ञ सामूहिक रूप से किए जाते थे ।
* उत्तर वैदिक काल (1000-500 ई.पू.):
* कुछ यज्ञ घरों के मालिकों द्वारा किए जाते थे।
* राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे, जिसके लिए वे ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर थे ।
3.2 नए प्रश्न और उपनिषद
छठी सदी ई.पू. से उपनिषदों में नए प्रश्न उभरे:
* जीवन का अर्थ क्या है? मृत्यु के बाद क्या होता है? पुनर्जन्म का कारण कर्म है? ।
* यज्ञों के महत्व पर सवाल उठाए जाने लगे।
3.3 वाद-विवाद और संप्रदाय
* बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
* शिक्षक (जैसे बुद्ध और महावीर) एक जगह से दूसरी जगह घूमकर कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोपड़ी) में चर्चा करते थे ।
* वेदों को चुनौती: महावीर और बुद्ध ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाए और माना कि दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति (जाति/लिंग से परे) कर सकता है।
दो प्रमुख विरोधी विचार:
* नियतिवादी (Fatalists): मक्खलि गोसाल (आजीविक परंपरा) का मानना था कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है, सुख-दुख को बदला नहीं जा सकता ।
* भौतिकवादी (Materialists): अजीत केसकंबलिन् (लोकायत परंपरा) का मानना था कि दान, यज्ञ या दूसरी दुनिया जैसी कोई चीज़ नहीं होती। मृत्यु के बाद सब नष्ट हो जाता है ।
4. जैन धर्म: लौकिक सुखों से आगे
4.1 मूल सिद्धांत
* जैन धर्म वर्धमान महावीर से पहले भी उत्तर भारत में प्रचलित था। महावीर 24वें तीर्थंकर थे ।
* अहिंसा: संपूर्ण विश्व प्राणवान है (पत्थर, जल में भी जीवन है) किसी भी जीव को न मारना इनका केंद्र बिंदु है ।
* कर्म और पुनर्जन्म: जन्म-पुनर्जन्म का चक्र कर्म द्वारा निर्धारित होता है। कर्म से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या आवश्यक है ।
4.2 पाँच व्रत (Five Vows)
जैन साधु/साध्वी ये पांच व्रत लेते थे:
* हत्या न करना (अहिंसा)
* चोरी न करना
* झूठ न बोलना (सत्य)
* ब्रह्मचर्य
* धन संग्रह न करना (अपरिग्रह)
5. बौद्ध धर्म: बुद्ध और ज्ञान की खोज
5.1 बुद्ध का जीवन
* बचपन का नाम सिद्धार्थ था। वे शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे।
* चार दृश्य: महल से बाहर उन्होंने एक वृद्ध, एक बीमार, एक लाश और एक संन्यासी को देखा। इससे उन्हें जीवन के दुखों का एहसास हुआ ।
* ज्ञान प्राप्ति: गृहत्याग (महाभिनिष्क्रमण) के बाद उन्होंने कठोर तपस्या की, फिर ध्यान (Meditation) का मार्ग अपनाया और ज्ञान प्राप्त कर 'बुद्ध' (ज्ञानी) कहलाए ।
5.2 बुद्ध की शिक्षाएँ (Teachings)
ये सुत्त पिटक में दी गई कहानियों पर आधारित हैं:
* अनित्य (Impermanence): विश्व क्षणभंगुर है और लगातार बदल रहा है।
* आत्माविहीन (Anatta): यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत (आत्मा) नहीं है।
* दुख: जीवन में दुख अंतर्निहित है।
* मध्यम मार्ग: घोर तपस्या और भोग-विलास के बीच का रास्ता अपनाकर दुखों से मुक्ति (निर्वाण) मिल सकती है।
* ईश्वर: बौद्ध धर्म में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था। उन्होंने राजाओं को दयावान होने की सलाह दी क्योंकि समाज का निर्माण इंसानों ने किया है, ईश्वर ने नहीं।
5.3 बुद्ध के अनुयायी (The Sangha)
* भिक्षु/भिक्खु: जो दान पर निर्भर रहते थे और सादा जीवन बिताते थे ।
* महिलाएं: शुरू में महिलाओं को अनुमति नहीं थी। प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर बुद्ध ने अनुमति दी। बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी बनीं ।
* थेरीगाथा: यह सुत्त पिटक का हिस्सा है जिसमें भिक्खुनियों द्वारा रचित छंद हैं ।
* सामाजिक समानता: संघ में राजा, धनी, कर्मकार, दास सभी शामिल थे और संघ में आने के बाद सभी बराबर माने जाते थे ।
6. स्तूप (Stupas)
6.1 महत्व और संरचना
* स्तूप वे टीले थे जहाँ बुद्ध के अवशेष (अस्थियाँ या सामान) गाड़े जाते थे। यह परंपरा बुद्ध से पहले की हो सकती है लेकिन बौद्ध धर्म से जुड़ गईं।
* अशोकावदान के अनुसार, असोक ने बुद्ध के अवशेषों को हर महत्वपूर्ण शहर में बांटकर स्तूप बनवाए (जैसे भरहुत, साँची, सारनाथ) ।
स्तूप की संरचना (Structure of Stupa):
* अंड (Anda): अर्द्धगोलाकार मिट्टी का टीला।
* हर्मिका (Harmika): टीले के ऊपर छज्जे जैसा ढांचा (देवताओं के घर का प्रतीक)।
* यष्टि (Yashti): हर्मिका से निकलता मस्तूल।
* छत्री (Chhatri): यष्टि के ऊपर लगी छत्री।
* वेदिका (Railing): पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करने वाली बाड़।
* तोरणद्वार (Gateways): चारों दिशाओं में अलंकृत प्रवेश द्वार।
6.2 अमरावती और साँची की नियति (Amravati vs Sanchi)
* अमरावती: 1796 में खोजा गया। लेकिन 1854 तक गुंटूर के कमिश्नर और अन्य अधिकारी वहाँ की मूर्तियाँ और पत्थर मद्रास, लंदन और कलकत्ता ले गए। इसे 'एलियट संगमरमर' कहा गया । यह स्तूप नष्ट हो गया क्योंकि तब संरक्षण की समझ नहीं थी।
* साँची: 1818 में खोजा गया। पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल ने "यथास्थान संरक्षण" (In-situ preservation) की नीति अपनाई। साँची बच गया क्योंकि इसे संग्रहालयों में नहीं ले जाया गया ।
7. मूर्तिकला और प्रतीक (Sculpture and Symbols)
7.1 पत्थर में गढ़ी कथाएँ
साँची की मूर्तियों में वेसान्तर जातक की कथाएँ उत्कीर्ण हैं (दानी राजकुमार की कहानी)।
7.2 उपासना के प्रतीक
प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से दर्शाया गया :
* रिक्त स्थान: ध्यान की दशा।
* स्तूप: महापरिनिब्बान (मृत्यु)।
* चक्र: सारनाथ में दिया गया प्रथम उपदेश।
* बोधि वृक्ष: ज्ञान प्राप्ति।
7.3 लोक परंपराएँ
बौद्ध धर्म ने स्थानीय परंपराओं को भी अपनाया:
* शालभंजिका: तोरणद्वार पर पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री। लोक परंपरा में इसे शुभ माना जाता था (इसके छूने से वृक्षों में फूल खिलते थे) ।
* जानवर: हाथी (शक्ति और ज्ञान का प्रतीक), सर्प, गजलक्ष्मी (सौभाग्य की देवी) ।
8. नई धार्मिक परंपराएँ (New Religious Traditions)
8.1 महायान बौद्ध मत
ईसा की पहली सदी के बाद बौद्ध धर्म में बदलाव आया:
* हीनयान/थेरवाद: पुरानी परंपरा, जिसमें बुद्ध को महापुरुष माना जाता था और व्यक्तिगत प्रयास से निब्बान मिलता था ।
* महायान: नई परंपरा। इसमें बुद्ध को मुक्तिदाता (ईश्वर) माना गया। बोधिसत्व (करुणामय जीव जो दूसरों की मदद करते हैं) की पूजा शुरू हुई।मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ा ।
8.2 पौराणिक हिंदू धर्म (Puranic Hinduism)
* वैष्णववाद: विष्णु को मुख्य देवता माना गया। इसमें 10 अवतारों की कल्पना है (मत्स्य, वराह, आदि)।
* शैववाद: शिव को परमेश्वर माना गया (लिंग और मानव रूप में पूजा)।
* भक्ति: ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का रिश्ता।
* मंदिर: शुरू में चौकोर कमरे (गर्भगृह) होते थे, बाद में उनके ऊपर शिखर बनने लगे। कैलाशनाथ मंदिर (एलोरा) पूरी पहाड़ी काटकर बनाया गया था ।
9. कला इतिहास की समस्याएँ
* यूरोपीय दृष्टिकोण: 19वीं सदी के यूरोपीय विद्वान भारतीय मूर्तियों (कई सिर/हाथ वाली) को "विकृत" मानते थे। उन्होंने भारतीय कला को यूनानी कला के पैमाने से समझने की कोशिश की (गांधार कला को पसंद किया) ।
* लिखित और दृश्य का मेल: महाबलीपुरम की एक मूर्ति में "गंगा अवतरण" है या "अर्जुन की तपस्या", इस पर विद्वानों में मतभेद है। इसे समझने के लिए पुराणों और महाभारत का सहारा लिया गया।
The End