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Wednesday, 7 January 2026

Class 12 इतिहास अध्याय 4: विचारक, विश्वास और इमारतें (Thinkers, Beliefs and Buildings) के सम्पूर्ण नोट्स हिंदी में। बौद्ध और जैन धर्म, सांची स्तूप और सांस्कृतिक विकास (600 ई.पू. से 600 ई.) के महत्वपूर्ण प्रश्न और सारांश बोर्ड परीक्षा 2026 के लिए।


       


           अध्याय 4: विचारक, विश्वास और इमारतें

  (सांस्कृतिक विकास: ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक)

                                                                                     


1. परिचय

ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी का काल विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस काल में ईरान में जरथुस्त्र, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु और भारत में महावीर और बुद्ध जैसे चिंतकों का उद्भव हुआ ।

 * उद्देश्य: इन्होंने जीवन के रहस्यों और इंसान व विश्व व्यवस्था के बीच रिश्तों को समझने की कोशिश की।

 * स्रोत: बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथों के अलावा इमारतों और अभिलेखों (जैसे साँची का स्तूप) का इस्तेमाल इस काल को समझने के लिए किया जाता है ।


2. साँची की एक झलक (Sanchi Stupa)

साँची (मध्य प्रदेश) का स्तूप बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र है और उस युग की सबसे सुरक्षित बची हुई इमारतों में से एक है।

2.1 साँची का संरक्षण (The Preservation of Sanchi)

उन्नीसवीं सदी में यूरोपियों (फ्रांसीसी और अंग्रेज़) की दिलचस्पी साँची के तोरणद्वारों को अपने देश (पेरिस या लंदन) ले जाने में थी ।

साँची के बचने के कारण:

 *प्लास्टर प्रतिकृतियाँ: फ्रांसीसी और अंग्रेज़ दोनों मूल कृति के बजाय प्लास्टर की प्रतिकृतियों (Copies) से संतुष्ट हो गए, जिससे मूल इमारत वहीं रह गई।

 * भोपाल की बेगमों का योगदान:

   * शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने इसके रखरखाव के लिए धन का अनुदान दिया।

   * सुल्तानजहाँ बेगम ने वहां एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनवाई।

   * उन्होंने जॉन मार्शल द्वारा साँची पर लिखे गए ग्रंथों के प्रकाशन के लिए भी धन दिया।

 * रेल ठेकेदारों से बचाव: यह स्थान रेल ठेकेदारों और निर्माताओं की नज़र से बचा रहा, जिन्होंने अन्य स्थलों को नष्ट कर दिया था।


3. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद (Sacrifices and Debates)

3.1 वैदिक परंपरा

 * पूर्व वैदिक काल (1500-1000 ई.पू.): ऋग्वेद में अग्नि, इंद्र और सोम जैसे देवताओं की स्तुति है। यज्ञ सामूहिक रूप से किए जाते थे ।

 * उत्तर वैदिक काल (1000-500 ई.पू.):

   * कुछ यज्ञ घरों के मालिकों द्वारा किए जाते थे।

   * राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे, जिसके लिए वे ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर थे ।

3.2 नए प्रश्न और उपनिषद

छठी सदी ई.पू. से उपनिषदों में नए प्रश्न उभरे:

 * जीवन का अर्थ क्या है? मृत्यु के बाद क्या होता है? पुनर्जन्म का कारण कर्म है? ।

 * यज्ञों के महत्व पर सवाल उठाए जाने लगे।

3.3 वाद-विवाद और संप्रदाय

 * बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख मिलता है।

 * शिक्षक (जैसे बुद्ध और महावीर) एक जगह से दूसरी जगह घूमकर कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोपड़ी) में चर्चा करते थे ।

 * वेदों को चुनौती: महावीर और बुद्ध ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाए और माना कि दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति (जाति/लिंग से परे) कर सकता है।

दो प्रमुख विरोधी विचार:

 * नियतिवादी (Fatalists): मक्खलि गोसाल (आजीविक परंपरा) का मानना था कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है, सुख-दुख को बदला नहीं जा सकता ।

 * भौतिकवादी (Materialists): अजीत केसकंबलिन् (लोकायत परंपरा) का मानना था कि दान, यज्ञ या दूसरी दुनिया जैसी कोई चीज़ नहीं होती। मृत्यु के बाद सब नष्ट हो जाता है ।


4. जैन धर्म: लौकिक सुखों से आगे

4.1 मूल सिद्धांत

 * जैन धर्म वर्धमान महावीर से पहले भी उत्तर भारत में प्रचलित था। महावीर 24वें तीर्थंकर थे ।

 * अहिंसा: संपूर्ण विश्व प्राणवान है (पत्थर, जल में भी जीवन है) किसी भी जीव को न मारना इनका केंद्र बिंदु है ।

 * कर्म और पुनर्जन्म: जन्म-पुनर्जन्म का चक्र कर्म द्वारा निर्धारित होता है। कर्म से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या आवश्यक है ।

4.2 पाँच व्रत (Five Vows)

जैन साधु/साध्वी ये पांच व्रत लेते थे:

 * हत्या न करना (अहिंसा)

 * चोरी न करना

 * झूठ न बोलना (सत्य)

 * ब्रह्मचर्य

 * धन संग्रह न करना (अपरिग्रह)


5. बौद्ध धर्म: बुद्ध और ज्ञान की खोज

5.1 बुद्ध का जीवन

 * बचपन का नाम सिद्धार्थ था। वे शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे।

 * चार दृश्य: महल से बाहर उन्होंने एक वृद्ध, एक बीमार, एक लाश और एक संन्यासी को देखा। इससे उन्हें जीवन के दुखों का एहसास हुआ ।

 * ज्ञान प्राप्ति: गृहत्याग (महाभिनिष्क्रमण) के बाद उन्होंने कठोर तपस्या की, फिर ध्यान (Meditation) का मार्ग अपनाया और ज्ञान प्राप्त कर 'बुद्ध' (ज्ञानी) कहलाए ।

5.2 बुद्ध की शिक्षाएँ (Teachings)

ये सुत्त पिटक में दी गई कहानियों पर आधारित हैं:

 * अनित्य (Impermanence): विश्व क्षणभंगुर है और लगातार बदल रहा है।

 * आत्माविहीन (Anatta): यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत (आत्मा) नहीं है।

 * दुख: जीवन में दुख अंतर्निहित है।

 * मध्यम मार्ग: घोर तपस्या और भोग-विलास के बीच का रास्ता अपनाकर दुखों से मुक्ति (निर्वाण) मिल सकती है।

 * ईश्वर: बौद्ध धर्म में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था। उन्होंने राजाओं को दयावान होने की सलाह दी क्योंकि समाज का निर्माण इंसानों ने किया है, ईश्वर ने नहीं।

5.3 बुद्ध के अनुयायी (The Sangha)

 * भिक्षु/भिक्खु: जो दान पर निर्भर रहते थे और सादा जीवन बिताते थे ।

 * महिलाएं: शुरू में महिलाओं को अनुमति नहीं थी। प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर बुद्ध ने अनुमति दी। बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी बनीं ।

 * थेरीगाथा: यह सुत्त पिटक का हिस्सा है जिसमें भिक्खुनियों द्वारा रचित छंद हैं ।

 * सामाजिक समानता: संघ में राजा, धनी, कर्मकार, दास सभी शामिल थे और संघ में आने के बाद सभी बराबर माने जाते थे ।


6. स्तूप (Stupas)

6.1 महत्व और संरचना

 * स्तूप वे टीले थे जहाँ बुद्ध के अवशेष (अस्थियाँ या सामान) गाड़े जाते थे। यह परंपरा बुद्ध से पहले की हो सकती है लेकिन बौद्ध धर्म से जुड़ गईं।

 * अशोकावदान के अनुसार, असोक ने बुद्ध के अवशेषों को हर महत्वपूर्ण शहर में बांटकर स्तूप बनवाए (जैसे भरहुत, साँची, सारनाथ) ।

स्तूप की संरचना (Structure of Stupa):

 * अंड (Anda): अर्द्धगोलाकार मिट्टी का टीला।

 * हर्मिका (Harmika): टीले के ऊपर छज्जे जैसा ढांचा (देवताओं के घर का प्रतीक)।

 * यष्टि (Yashti): हर्मिका से निकलता मस्तूल।

 * छत्री (Chhatri): यष्टि के ऊपर लगी छत्री।

 * वेदिका (Railing): पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करने वाली बाड़।

 * तोरणद्वार (Gateways): चारों दिशाओं में अलंकृत प्रवेश द्वार।

6.2 अमरावती और साँची की नियति (Amravati vs Sanchi)

 * अमरावती: 1796 में खोजा गया। लेकिन 1854 तक गुंटूर के कमिश्नर और अन्य अधिकारी वहाँ की मूर्तियाँ और पत्थर मद्रास, लंदन और कलकत्ता ले गए। इसे 'एलियट संगमरमर' कहा गया । यह स्तूप नष्ट हो गया क्योंकि तब संरक्षण की समझ नहीं थी।

 * साँची: 1818 में खोजा गया। पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल ने "यथास्थान संरक्षण" (In-situ preservation) की नीति अपनाई। साँची बच गया क्योंकि इसे संग्रहालयों में नहीं ले जाया गया ।


7. मूर्तिकला और प्रतीक (Sculpture and Symbols)

7.1 पत्थर में गढ़ी कथाएँ

साँची की मूर्तियों में वेसान्तर जातक की कथाएँ उत्कीर्ण हैं (दानी राजकुमार की कहानी)।

7.2 उपासना के प्रतीक

प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से दर्शाया गया :

 * रिक्त स्थान: ध्यान की दशा।

 * स्तूप: महापरिनिब्बान (मृत्यु)।

 * चक्र: सारनाथ में दिया गया प्रथम उपदेश।

 * बोधि वृक्ष: ज्ञान प्राप्ति।

7.3 लोक परंपराएँ

बौद्ध धर्म ने स्थानीय परंपराओं को भी अपनाया:

 * शालभंजिका: तोरणद्वार पर पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री। लोक परंपरा में इसे शुभ माना जाता था (इसके छूने से वृक्षों में फूल खिलते थे) ।

 * जानवर: हाथी (शक्ति और ज्ञान का प्रतीक), सर्प, गजलक्ष्मी (सौभाग्य की देवी) ।


8. नई धार्मिक परंपराएँ (New Religious Traditions)

8.1 महायान बौद्ध मत

ईसा की पहली सदी के बाद बौद्ध धर्म में बदलाव आया:

 * हीनयान/थेरवाद: पुरानी परंपरा, जिसमें बुद्ध को महापुरुष माना जाता था और व्यक्तिगत प्रयास से निब्बान मिलता था ।

 * महायान: नई परंपरा। इसमें बुद्ध को मुक्तिदाता (ईश्वर) माना गया। बोधिसत्व (करुणामय जीव जो दूसरों की मदद करते हैं) की पूजा शुरू हुई।मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ा ।

8.2 पौराणिक हिंदू धर्म (Puranic Hinduism)

 * वैष्णववाद: विष्णु को मुख्य देवता माना गया। इसमें 10 अवतारों की कल्पना है (मत्स्य, वराह, आदि)।

 * शैववाद: शिव को परमेश्वर माना गया (लिंग और मानव रूप में पूजा)।

 * भक्ति: ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का रिश्ता।

 * मंदिर: शुरू में चौकोर कमरे (गर्भगृह) होते थे, बाद में उनके ऊपर शिखर बनने लगे। कैलाशनाथ मंदिर (एलोरा) पूरी पहाड़ी काटकर बनाया गया था ।


9. कला इतिहास की समस्याएँ

 * यूरोपीय दृष्टिकोण: 19वीं सदी के यूरोपीय विद्वान भारतीय मूर्तियों (कई सिर/हाथ वाली) को "विकृत" मानते थे। उन्होंने भारतीय कला को यूनानी कला के पैमाने से समझने की कोशिश की (गांधार कला को पसंद किया) ।

 * लिखित और दृश्य का मेल: महाबलीपुरम की एक मूर्ति में "गंगा अवतरण" है या "अर्जुन की तपस्या", इस पर विद्वानों में मतभेद है। इसे समझने के लिए पुराणों और महाभारत का सहारा लिया गया।


                                   The End

Class 12 History Chapter 3 Notes in Hindi | बंधुत्व, जाति तथा वर्ग | NCERT & RBSE


                     



   अध्याय 3: बंधुत्व, जाति तथा वर्ग

      (आरंभिक समाज: लगभग 600 ई.पू. से 600 ई.)

                                                                                



1. परिचय

लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी के मध्य आर्थिक और राजनीतिक जीवन में आए परिवर्तनों ने सामाजिक संरचना को प्रभावित किया।

 * वन क्षेत्रों में कृषि का विस्तार हुआ जिससे जीवनशैली बदली।

 * शिल्प विशेषज्ञों के सामाजिक समूहों का उदय हुआ।

 * संपत्ति के असमान वितरण ने सामाजिक विषमताओं को बढ़ाया।

 * इतिहासकार इन प्रक्रियाओं को समझने के लिए 'महाभारत' जैसे ग्रंथों का विश्लेषण करते हैं।


2. महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण (The Critical Edition of Mahabharata)

यह आधुनिक इतिहास लेखन की एक प्रमुख घटना थी।

 * शुरुआत: 1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में यह परियोजना शुरू हुई।

 * उद्देश्य: देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी गई संस्कृत पांडुलिपियों को एकत्रित करना और उनका विश्लेषण करना।

 * प्रक्रिया: विद्वानों ने उन श्लोकों का चयन किया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में समान रूप से पाए गए थे।

 * परिणाम:

   * इस संस्करण का प्रकाशन 13,000 पृष्ठों में हुआ।

   * परियोजना को पूरा करने में 47 वर्ष लगे।

 * मुख्य निष्कर्ष:

   * समानता: कश्मीर से लेकर केरल तक की पांडुलिपियों में कई अंशों में समानता पाई गई।

   * क्षेत्रीय प्रभेद: शताब्दियों के दौरान हुए प्रेषण में कई क्षेत्रीय अंतर भी उभरे, जिन्हें पादटिप्पणियों (Footnotes) में दर्ज किया गया।


3. बंधुता एवं विवाह (Kinship and Marriage)

2.1 परिवारों की संरचना

 * संस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए 'कुल' और बांधवों (रिश्तेदारों) के बड़े समूह के लिए 'जाति' शब्द का प्रयोग होता है।

 * पितृवंशिकता (Patriliny): वह वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र और प्रपौत्र तक चलती है।

 * मातृवंशिकता (Matriliny): जहाँ वंश परंपरा माँ से जुड़ी होती है।

2.2 पितृवंशिक व्यवस्था के आदर्श

 * महाभारत दो दलों (कौरव और पांडव) के बीच भूमि और सत्ता को लेकर हुए संघर्ष की कहानी है, जो कुरु वंश से संबंधित थे।

 * पांडवों की जीत के बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार को आदर्श माना गया।

 * पुत्रों का महत्त्व: पिता की मृत्यु के बाद संसाधनों और सिंहासन पर पुत्रों का अधिकार होता था।

 * अपवाद: कभी-कभी पुत्र न होने पर भाई या बंधु उत्तराधिकारी बनते थे। प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ (विशिष्ट परिस्थितियों में) सत्ता का उपभोग करती थीं।

2.3 विवाह के नियम

 * बहिर्विवाह (Exogamy): गोत्र से बाहर विवाह करना। इसे ही अपेक्षित और 'सही' माना जाता था।

 * अंतर्विवाह (Endogamy): अपने ही गोत्र, कुल या जाति में विवाह करना।

 * कन्यादान: विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना जाता था।

 * विवाह के प्रकार: धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में विवाह के आठ प्रकार माने गए हैं। इनमें से पहले चार 'उत्तम' और शेष चार 'निंदित' माने गए।

2.4 स्त्री का गोत्र (Rules of Gotra)

लगभग 1000 ई.पू. के बाद गोत्र व्यवस्था प्रचलित हुई। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था।

दो महत्वपूर्ण नियम:

 * विवाह के बाद स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति का गोत्र अपनाना होता था।

 * एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे।

सातवाहन राजाओं का अपवाद (Exceptions):

 * सातवाहन राजाओं (दक्कन, 200 ई.पू. - 200 ई.) के अभिलेखों से पता चलता है कि कई रानियों ने विवाह के बाद भी अपने पिता का गोत्र (जैसे गौतम, वसिष्ठ) कायम रखा।

 * यह अंतर्विवाह (बंधुओं में विवाह) का उदाहरण है, जो दक्षिण भारत में प्रचलित था।

2.5 क्या माताएँ महत्वपूर्ण थीं?

 * सातवाहन राजाओं को उनके मातृनाम (माता के नाम) से चिह्नित किया जाता था (जैसे: गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि)।

 * हालाँकि, सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक (पिता से पुत्र) ही होता था।


4. सामाजिक विषमताएँ: वर्ण व्यवस्था (Social Differences: Varna System)

3.1 आदर्श जीविका (Ideal Occupations)

धर्मशास्त्रों के अनुसार चार वर्णों के कार्य [cite: 618-621]:

 * ब्राह्मण: वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना/करवाना, दान लेना/देना।

 * क्षत्रिय: युद्ध करना, सुरक्षा देना, न्याय करना, वेद पढ़ना।

 * वैश्य: कृषि, गौ-पालन, व्यापार, वेद पढ़ना।

 * शूद्र: तीनों उच्च वर्णों की सेवा करना।

नियमों को लागू करने की रणनीतियाँ:

 * [cite_start]इसे दैवीय व्यवस्था बताया गया (पुरुषसूक्त मंत्र के अनुसार, आदि मानव के शरीर से वर्णों की उत्पत्ति)।

 * शासकों को इस व्यवस्था का पालन करवाने का उपदेश दिया गया।

3.2 अक्षत्रिय राजा (Kings who were not Kshatriyas)

शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय ही राजा हो सकते थे, लेकिन इतिहास में कई अपवाद हैं:

 * मौर्य: बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं, लेकिन ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें 'निम्न' कुल का मानते हैं।

 * शुंग और कण्व: ये मौर्यों के उत्तराधिकारी थे और ब्राह्मण थे।

 * शक (Shakas): मध्य एशिया से आए थे, जिन्हें ब्राह्मण 'मलेच्छ' या बर्बर मानते थे। (प्रसिद्ध शक राजा रुद्रदामन ने सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार करवाया था)।

 * सातवाहन: राजा गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को 'अनूठा ब्राह्मण' कहा और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया।

3.3 जाति और सामाजिक गतिशीलता

 * जाति: यह भी जन्म पर आधारित थी, लेकिन वर्ण केवल चार थे जबकि जातियों की संख्या निश्चित नहीं थी।

 * जब ब्राह्मणीय व्यवस्था का सामना नए समुदायों (जैसे निषाद या स्वर्णकार) से हुआ, तो उन्हें 'जाति' में वर्गीकृत किया गया।

 * श्रेणी (Guilds): एक ही व्यवसाय वाले लोगों की जातियाँ कभी-कभी श्रेणियों में संगठित होती थीं।

   * उदाहरण: मंदसौर (मध्य प्रदेश) के अभिलेख में रेशम बुनकरों की श्रेणी का वर्णन है जो लाट (गुजरात) से आए थे। इन्होंने सूर्य देवता का मंदिर बनवाया था।

3.4 चार वर्णों के परे: एकीकरण और बहिष्कार

 * निषाद: वन में रहने वाले समुदाय (जैसे एकलव्य) जिन्हें ब्राह्मणीय व्यवस्था में जगह नहीं मिली।

 * यायावर पशुपालक: इन्हें भी शंका की दृष्टि से देखा जाता था।

 * मलेच्छ: जो लोग संस्कृत नहीं बोलते थे या बाहरी थे।

अस्पृश्य (Untouchables/Chandalas):

 * कुछ कर्मों को 'दूषित' माना गया, जैसे शवों की अंत्येष्टि। इन्हें 'चाण्डाल' कहा गया।

 * मनुस्मृति के अनुसार कर्तव्य: गाँव के बाहर रहना, फेंके हुए बर्तन इस्तेमाल करना, मरे हुए लोगों के वस्त्र पहनना।

 * चीनी यात्रियों का विवरण:

   * फा-शिएन (5वीं सदी): अस्पृश्यों को सड़क पर चलते समय करताल बजानी पड़ती थी ताकि लोग उन्हें देखने से बच सकें।

   * श्वैन-त्सांग (7वीं सदी): सफाई करने वालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था।


5. जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा

4.1 संपत्ति पर स्त्री-पुरुष के अधिकार

 * मनुस्मृति के अनुसार: पैतृक जायदाद पुत्रों में समान रूप से बँटनी चाहिए (ज्येष्ठ पुत्र को विशेष भाग)। स्त्रियाँ इसमें हिस्सेदारी नहीं मांग सकती थीं।

 * स्त्रीधन: विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व होता था, जिसे उसकी संतान विरासत में ले सकती थी (पति का अधिकार नहीं)।

 * वास्तविकता: भूमि, पशु और धन पर सामान्यतः पुरुषों का ही नियंत्रण था।

4.2 वर्ण और संपत्ति

 * ब्राह्मण और क्षत्रिय सबसे धनी माने जाते थे, जबकि शूद्रों को निर्धन।

 * बौद्ध दृष्टिकोण: बौद्ध धर्म ने वर्ण-आधारित प्रतिष्ठा को खारिज किया। उन्होंने माना कि सामाजिक विषमता मौजूद है लेकिन यह नैसर्गिक या स्थायी नहीं है।

4.3 एक वैकल्पिक सामाजिक रूपरेखा

 * प्राचीन तमिलकम् (संगम साहित्य) में दानी सरदार का सम्मान होता था और कृपण (कंजूस) की निंदा की जाती थी। सरदार अपने चारणों और कवियों के आश्रयदाता होते थे।


6. सामाजिक अनुबंध (Social Contract - बौद्ध सिद्धांत)

बौद्ध ग्रंथ 'सुत्तपिटक' में एक मिथक है:

 * प्रारंभ में मानव और वनस्पति जगत अविकसित थे और शांति थी।

 * धीरे-धीरे बुराइयां (लालच, हिंसा) आईं।

 * लोगों ने विचार किया कि एक ऐसे व्यक्ति (महासम्मत्त - महा चुना हुआ) को चुना जाए जो व्यवस्था बनाए रखे।

 * बदले में लोग उसे चावल का अंश (कर/Tax) देंगे।

 * यह सिद्धांत बताता है कि राजा का पद दैवीय नहीं बल्कि मानवीय चुनाव पर आधारित था।


7. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल: इतिहासकार और महाभारत

6.1 भाषा और विषयवस्तु

 * भाषा: महाभारत की संस्कृत वेदों की संस्कृत से सरल है।

 * विषयवस्तु (दो भाग):

   * आख्यान (Narrative): कहानियों का संग्रह।

   * उपदेशात्मक (Didactic): सामाजिक आचार-विचार के मानदंड (जैसे भगवद्‌गीता)।

6.2 लेखक और रचनाकाल (Who wrote it?)

ग्रंथ की रचना लगभग 1000 वर्षों (500 ई.पू. - 500 ई.) तक होती रही:

 * सारथी/भाट (सूत): मूल कथा के रचयिता, जो मौखिक रूप से युद्धों का वर्णन करते थे।

 * ब्राह्मण: 5वीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इसे लिखित रूप देना शुरू किया।

 * विष्णु आराधना: 200 ई.पू. से 200 ई. के बीच श्रीकृष्ण (विष्णु रूप) का महत्व बढ़ा।

 * मनुस्मृति का प्रभाव: 200-400 ई. के बीच उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए, जिससे ग्रंथ 1 लाख श्लोकों का हो गया। पारंपरिक रूप से रचयिता ऋषि व्यास माने जाते हैं।

6.3 पुरातत्व और महाभारत (Archaeology)

 * हस्तिनापुर उत्खनन: 1951-52 में बी.बी. लाल ने मेरठ के पास हस्तिनापुर में खुदाई की।

 * साक्ष्य: दूसरे स्तर (12वीं-7वीं सदी ई.पू.) पर कच्ची मिट्टी की ईंटें और सरकंडे की दीवारें मिलीं, जो महाभारत के भव्य महलों के वर्णन से मेल नहीं खातीं।

6.4 द्रौपदी का विवाह (बहुपति प्रथा - Polyandry)

 * द्रौपदी का पाँच पांडवों से विवाह बहुपति प्रथा का उदाहरण है।

 * स्पष्टीकरण: लेखक इसे जायज ठहराने के लिए कई तर्क देते हैं (जैसे पांडव इंद्र के अवतार थे, या पिछले जन्म का वरदान)।

 * इतिहासकारों का मत: यह प्रथा हिमालय क्षेत्र में प्रचलित थी या युद्ध के समय स्त्रियों की कमी के कारण अपनाई गई होगी। ब्राह्मणों के लिए यह प्रथा अमान्य थी, इसलिए इसे 'चमत्कार' से जोड़ा गया।


8. एक गतिशील ग्रंथ (A Dynamic Text)

महाभारत केवल संस्कृत तक सीमित नहीं रहा।

 * शताब्दियों तक इसके अनेक रूपांतरण (Versions) अलग-अलग भाषाओं में लिखे गए।

 * इसकी कहानियों को मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्य और नाटकों में दर्शाया गया।

 * आधुनिक व्याख्या: महाश्वेता देवी ने अपनी लघु कथा "कुंती ओ निषादी" में शोषित वर्ग (निषाद) की आवाज़ उठाई है, जिसका मूल महाभारत में उल्लेख नहीं है।


                                    The END                                 


Tuesday, 6 January 2026

Class 12 History Chapter 2 Notes in Hindi , 'राजा, किसान और नगर' (Kings, Farmers and Towns) - (complete notes)





 अध्याय 2 : राजा, किसान और नगर                          

आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ: लगभग 600 ई.पू. से 600 ई.


1. पृष्ठभूमि और विकास

 * हड़प्पा के बाद: हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद लगभग 1,500 वर्षों के अंतराल में कई विकास हुए। इसी काल में सिंधु और उसकी उपनदियों के किनारे ऋग्वेद का लेखन हुआ।

 * बस्तियाँ और संस्कार: उत्तर भारत और कर्नाटक में कृषक बस्तियाँ बनीं और दक्कन में चरवाहा बस्तियाँ। महापाषाण (Megaliths) नाम के पत्थर के ढाँचे दक्षिण भारत में शवों के अंतिम संस्कार के लिए प्रयोग होते थे, जिनमें लोहे के उपकरण भी दफनाए जाते थे।

 * छठी शताब्दी ई.पू. का महत्त्व: इसे एक प्रमुख परिवर्तनकारी काल माना जाता है क्योंकि इसमें आरंभिक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों का विकास हुआ। साथ ही बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ।


2. अभिलेखशास्त्र (Epigraphy)

 * परिभाषा: अभिलेखों के अध्ययन को अभिलेखशास्त्र कहते हैं। अभिलेख पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तनों जैसी कठोर सतह पर खुदे होते हैं।

 * जेम्स प्रिंसेप: 1830 के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला।

 * पियदस्सी: अधिकांश अभिलेखों में राजा को 'पियदस्सी' (मनोहर मुखाकृति वाला) कहा गया है। कुछ में 'असोक' नाम भी मिलता है, जो बौद्ध ग्रंथों के अनुसार प्रसिद्ध शासक था।


3. प्रारंभिक राज्य: 16 महाजनपद

 * महाजनपद: बौद्ध और जैन ग्रंथों में 16 महाजनपदों का उल्लेख है। प्रमुख महाजनपद थे- वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति।

 * शासन प्रणाली:

   * अधिकांश पर राजा का शासन था।

   * 'गण' और 'संघ' (जैसे वज्जि) में समूह शासन (ओलीगार्की) होता था, जहाँ हर व्यक्ति राजा कहलाता था। महावीर और बुद्ध इन्हीं गणों से थे।

 * विशेषताएँ: प्रत्येक महाजनपद की एक किलेबंद राजधानी होती थी। स्थायी सेना और नौकरशाही के लिए भारी आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती थी।

 * धर्मशास्त्र: छठी शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने 'धर्मशास्त्र' नामक ग्रंथ लिखे, जिसमें शासकों (मुख्यतः क्षत्रिय) के लिए नियम बनाए गए। उनका काम कर वसूलना था।


4. मगध का उत्थान (सबसे शक्तिशाली महाजनपद)

 * कारण:

   * खेती की उपज बहुत अच्छी थी।

   * झारखंड में लोहे की खदानें थीं (उपकरण/हथियार के लिए)।

   * जंगलों में हाथी उपलब्ध थे (सेना के लिए)।

   * गंगा और उपनदियों से सस्ता आवागमन।

 * शासक: बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे महत्त्वाकांक्षी शासक।

 * राजधानी: पहले राजगाह (पहाड़ियों के बीच किलेबंद शहर) थी, बाद में पाटलिपुत्र (पटना) बनी।


5. मौर्य साम्राज्य (एक आरंभिक साम्राज्य)

* स्थापना: चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) ने की। साम्राज्य पश्चिमोत्तर में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था।

 * स्रोत: पुरातात्विक प्रमाण (मूर्तिकला), मेगस्थनीज़ का विवरण (इंडिका), कौटिल्य का अर्थशास्त्र, और असोक के अभिलेख।

 * असोक और धम्म:

   * असोक ने कलिंग (उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की।

   * अभिलेखों के माध्यम से 'धम्म' का प्रचार किया (बड़ों का आदर, दासों से उदार व्यवहार, धर्मों का सम्मान)।

 * प्रशासन:

   * पाँच प्रमुख केंद्र: पाटलिपुत्र (राजधानी), तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि।

   * तक्षशिला और उज्जयिनी व्यापारिक मार्ग पर थे, सुवर्णगिरि (सोने का पहाड़) कर्नाटक में सोने की खदान के लिए महत्वपूर्ण था।

 * सैन्य व्यवस्था (मेगस्थनीज़ के अनुसार): सेना संचालन के लिए एक समिति और छः उपसमितियां थीं:

   * नौसेना, 2. यातायात/खान-पान, 3. पैदल सैनिक, 4. अश्वारोही, 5. रथारोही, 6. हाथी।

 * महत्त्व: मौर्य साम्राज्य लगभग 150 साल चला। यह साम्राज्य पूरे उपमहाद्वीप में नहीं फैला था, लेकिन असोक को राष्ट्रवादी नेताओं ने प्रेरणा स्रोत माना।


6. राजधर्म के नवीन सिद्धांत (दक्षिण और अन्य क्षेत्र)

 * दक्षिण के सरदार: दक्षिण (तमिलकम) में चोल, चेर और पाण्ड्य सरदारियों का उदय हुआ। ये समृद्ध और स्थायी थे। संगम ग्रंथों में इनका विवरण मिलता है।

 * दैविक राजा (Kushanas):

   * कुषाण शासकों (मध्य एशिया से पश्चिमोत्तर भारत तक) ने राजत्व के लिए दैविक सिद्धांत अपनाया।

   * मथुरा (माट) और अफगानिस्तान में उनकी विशालकाय मूर्तियाँ मिली हैं। वे खुद को 'देवपुत्र' कहते थे।

 * गुप्त साम्राज्य:

   * चौथी शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य सामंतों (Feudal lords) पर निर्भर था।

   * प्रशस्ति: इलाहाबाद स्तंभ पर हरिषेण द्वारा रचित 'प्रयाग प्रशस्ति' में समुद्रगुप्त की तुलना कुबेर, वरुण, इंद्र और यम जैसे देवताओं से की गई है।


7. बदलता हुआ देहात (कृषि और समाज)

 * जनता में राजा की छवि: 'जातक' और 'पंचतंत्र' की कहानियों (जैसे गंदतिन्दु जातक) से पता चलता है कि राजा और प्रजा के संबंध तनावपूर्ण थे। अधिक करों के कारण लोग जंगल में भाग जाते थे।

 * उपज बढ़ाने के तरीके:

   * हल का प्रयोग: लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग (गंगा/कावेरी घाटी)। पंजाब/राजस्थान में यह 20वीं सदी में शुरू हुआ।

   * धान की रोपाई: इससे उपज में भारी वृद्धि हुई।

   * सिंचाई: कुओं, तालाबों और नहरों (जैसे सुदर्शन झील) का निर्माण।

 * ग्रामीण समाज में भेदभाव: भूमिहीन खेतिहर श्रमिक, छोटे किसान और बड़े जमींदार (गहपति) उभरे। बड़े जमींदार शक्तिशाली होते थे।

 * भूमिदान (Land Grants):

   * ताम्र पत्रों पर अभिलेख मिलते हैं। भूमिदान आमतौर पर धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों को (अग्रहार) दिए जाते थे।

   * प्रभावती गुप्त: चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री। वाकाटक रानी के रूप में उसने भूमिदान दिया, जो दर्शाता है कि कुछ महिलाओं के पास संपत्ति का अधिकार था।

   * भूमिदान का उद्देश्य कृषि का विस्तार करना या कमजोर होते राजनीतिक प्रभुत्व को संभालना (सामंतों को खुश करना) हो सकता था।.


8. नगर एवं व्यापार

 * नए नगर: पाटलिपुत्र (नदी मार्ग), उज्जयिनी (भूतल मार्ग), पुहार (समुद्र तट), मथुरा (सांस्कृतिक/व्यावसायिक केंद्र)।

 * शहरी जनसंख्या: अमीर लोग 'उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र' (NBPW) का उपयोग करते थे। विभिन्न शिल्पों और श्रेणियों (Guilds) का उल्लेख मिलता है।

 * व्यापार:

   * उपमहाद्वीप के भीतर और बाहर (मध्य एशिया, रोमन साम्राज्य) व्यापक व्यापार था।

   * समुद्री मार्ग (अरब सागर, बंगाल की खाड़ी) का प्रयोग होता था।

   * काली मिर्च (रोमन साम्राज्य में भारी मांग), मसाले, कपड़े, जड़ी-बूटियों का निर्यात होता था।

 * सिक्के:

   * आहत सिक्के: (Punch-marked) चांदी और तांबे के, सबसे पहले ढाले गए।

   * हिंद-यूनानी: सबसे पहले राजाओं के नाम और चित्र वाले सिक्के जारी किए।

   * कुषाण: प्रथम शताब्दी ई. में बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के जारी किए (रोमन सिक्कों के समान वजन)।

   * गुप्त: इनके सोने के सिक्के अति उत्तम थे। छठी शताब्दी ई. के बाद सोने के सिक्के कम मिलने लगे, जो आर्थिक संकट या व्यापार में कमी का संकेत हो सकता है।


9. लिपियों का अर्थ निकालना (Deciphering Scripts)

 * ब्राह्मी: आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी। 1838 में जेम्स प्रिंसेप ने इसे पढ़ा। उन्होंने 'अ' अक्षर की पहचान की।

 * खरोष्ठी: पश्चिमोत्तर के अभिलेखों में प्रयुक्त। हिंद-यूनानी सिक्कों (द्विभाषी) की मदद से इसे पढ़ा गया।

 * ऐतिहासिक साक्ष्य: असोक के अभिलेखों से युद्ध के प्रति उसकी वेदना (कलिंग युद्ध के बाद) का पता चलता है।

 * अभिलेखों की सीमाएँ:

   * अक्षर हल्के खुदे होना या नष्ट हो जाना।

   * वास्तविक अर्थ समझना मुश्किल होना।

   * अभिलेख केवल "बड़े और विशेष" अवसरों का वर्णन करते हैं, दैनिक जीवन का नहीं।

                                    

                             ....The End....



Class 12 History Chapter 1 Notes in Hindi | ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ (Complete Notes)



     12th History Notes Hindi                           


    Class 12 History Chapter 1: ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ 

                                                                                            


1. परिचय और काल-निर्धारण

हड़प्पा सभ्यता, जिसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है, की सबसे विशिष्ट पुरावस्तु 'हड़प्पाई मुहर' है, जो सेलखड़ी नामक पत्थर से बनाई जाती थी। इन मुहरों पर जानवरों के चित्र और एक ऐसी लिपि के चिह्न हैं जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। इस सभ्यता के बारे में जानकारी हमें पुरातात्विक साक्ष्यों जैसे आवासों, मृदभाण्डों, आभूषणों, औजारों और मुहरों से मिलती है।

 * नामकरण: इस सभ्यता का नाम 'हड़प्पा' नामक स्थान पर पड़ा जहाँ यह पहली बार खोजी गई थी।

 * काल: सभ्यता का विकसित चरण (परिपक्व हड़प्पा) 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। इससे पहले की बस्तियों को 'आरंभिक हड़प्पा' और बाद की बस्तियों को 'उत्तर हड़प्पा' कहा जाता है।

 * विस्तार: इसका विस्तार अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, जम्मू, पाकिस्तान और भारत (गुजरात, राजस्थान, हरियाणा) तक था।


2. निर्वाह के तरीके (भोजन और कृषि)

हड़प्पा के निवासी पेड़-पौधों और जानवरों (मछली सहित) से भोजन प्राप्त करते थे।

 * आहार: जले हुए अनाज के दानों से पता चलता है कि वे गेहूँ, जौ, दाल, सफेद चना और तिल का उपयोग करते थे। गुजरात में बाजरे के दाने मिले हैं, जबकि चावल के साक्ष्य कम मिले हैं।

 * पशुपालन: जानवरों की हड्डियों (मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस, सूअर) से संकेत मिलता है कि ये जानवर पालतू थे। जंगली जानवरों जैसे वराह (सूअर), हिरण और घड़ियाल की हड्डियाँ भी मिली हैं।

 * कृषि प्रौद्योगिकी: मुहरों और मृण्मूर्तियों पर वृषभ (बैल) के चित्र मिले हैं, जिससे पता चलता है कि खेत जोतने के लिए बैलों का प्रयोग होता था। चोलिस्तान और बनावली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के प्रतिरूप मिले हैं।

 * जुते हुए खेत: कालीबंगन (राजस्थान) में जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं, जहाँ हल रेखाएँ समकोण पर काटती थीं, जो यह दर्शाता है कि एक साथ दो फसलें उगाई जाती थीं।

 * सिंचाई: अफगानिस्तान के 'शोर्तुघई' में नहरों के अवशेष मिले हैं, लेकिन पंजाब और सिंध में नहीं। धोलावीरा (गुजरात) में मिले जलाशयों का प्रयोग संभवतः कृषि के लिए जल संचयन हेतु किया जाता था। अनाज पीसने के लिए 'अवतल चक्कियों' का प्रयोग होता था।


3. मोहनजोदड़ो: एक नियोजित शहरी केंद्र

मोहनजोदड़ो एक विशाल और नियोजित शहर था जो दो भागों में विभाजित था: दुर्ग (Citadel) और निचला शहर (Lower Town)।

 * दुर्ग: यह ऊँचाई पर बना था क्योंकि यहाँ की संरचनाएँ कच्ची ईंटों के चबूतरे पर बनी थीं। इसे दीवारों से घेरा गया था, जो इसे निचले शहर से अलग करता था।

 * निचला शहर: यह आवासीय भवनों के लिए था और इसे भी दीवार से घेरा गया था। भवनों का निर्माण चबूतरों पर किया गया था जो नींव का कार्य करते थे।

 * ईंटें: सभी हड़प्पा बस्तियों में ईंटों का एक निश्चित अनुपात (लंबाई और चौड़ाई, ऊँचाई की क्रमशः चार गुनी और दोगुनी) होता था।

 * जल निकास प्रणाली: यहाँ की सड़कों और गलियों को एक 'ग्रिड' पद्धति में बनाया गया था जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। ऐसा लगता है कि पहले नालियों के साथ गलियाँ बनीं और फिर उनके बगल में घर बनाए गए। हर घर का गंदा पानी गली की नालियों में जाता था।


4. गृह स्थापत्य (घरों की बनावट)

मोहनजोदड़ो के आवासों में एक आँगन होता था जिसके चारों ओर कमरे बने होते थे।

 * निजता (Privacy): भूमि तल की दीवारों में खिड़कियाँ नहीं होती थीं और मुख्य द्वार से आंतरिक भाग या आँगन सीधा नहीं दिखता था।

 * सुविधाएँ: हर घर का अपना स्नानघर होता था जिसकी नालियाँ सड़क की नालियों से जुड़ी थीं। कई घरों में कुएँ थे जो ऐसे कमरे में बनाए जाते थे जहाँ बाहर से भी पहुँचा जा सके। मोहनजोदड़ो में कुल कुओं की संख्या लगभग 700 थी।


5. दुर्ग की विशेष संरचनाएँ

दुर्ग पर सार्वजनिक और विशिष्ट संरचनाएँ मिली हैं:

 * मालगोदाम: यह एक विशाल संरचना थी जिसका निचला हिस्सा ईंटों का था और ऊपरी हिस्सा (संभवतः लकड़ी का) नष्ट हो गया था।

 * विशाल स्नानागार: यह आँगन में बना एक आयताकार जलाशय था जो चारों ओर से गलियारे से घिरा था। जलाशय तक जाने के लिए उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियाँ थीं। इसे ईंटों और जिप्सम के गारे से जलबद्ध किया गया था। विद्वानों का मानना है कि इसका प्रयोग 'विशिष्ट अनुष्ठानिक स्नान' के लिए होता था।


6. सामाजिक भिन्नताओं का अवलोकन

पुरातत्वविद सामाजिक और आर्थिक भिन्नताओं को समझने के लिए दो मुख्य विधियों का प्रयोग करते हैं:

 * शवाधान (Burials): हड़प्पा में मृतकों को गर्तों (गड्डों) में दफनाया जाता था। कुछ कब्रों में मृदभाण्ड और आभूषण मिले हैं, जिससे पता चलता है कि वे मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास रखते थे। पुरुषों और महिलाओं दोनों के कंकालों के पास आभूषण मिले हैं। कहीं-कहीं ताँबे के दर्पण भी मिले हैं, लेकिन सामान्यतः हड़प्पावासी मृतकों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ दफनाने में विश्वास नहीं करते थे।

 * विलासिता की वस्तुएँ: वस्तुओं को 'उपयोगी' (पत्थर/मिट्टी की बनी रोज़मर्रा की वस्तुएँ जैसे चक्कियाँ) और 'विलास' (महंगी और दुर्लभ वस्तुएँ जैसे फयॉन्स के पात्र) में बाँटा गया है। महंगी वस्तुएँ मुख्यतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी बड़ी बस्तियों में मिली हैं, छोटी बस्तियों में नहीं।


7. शिल्प उत्पादन

चन्हुदड़ो (जो मोहनजोदड़ो की तुलना में बहुत छोटी बस्ती थी) लगभग पूरी तरह से शिल्प उत्पादन में संलग्न थी।

 * शिल्प कार्य: इसमें मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर निर्माण और बाट बनाना शामिल था।

 * सामग्री: मनके बनाने के लिए कार्नीलियन (लाल पत्थर), जैस्पर, स्फटिक, सेलखड़ी, ताँबा, काँसा, सोना, शंख और फयॉन्स का प्रयोग होता था।

 * तकनीक: सेलखड़ी (मुलायम पत्थर) से मनके बनाना आसान था, जबकि कठोर पत्थरों के लिए जटिल तकनीकें अपनाई जाती थीं। चन्हुदड़ो, लोथल और धोलावीरा में छेद करने के विशेष उपकरण मिले हैं।

 * शंख उद्योग: नागेश्वर और बालाकोट समुद्र तट के पास स्थित थे, इसलिए ये शंख की वस्तुएँ (जैसे चूड़ियाँ) बनाने के विशिष्ट केंद्र थे।


8. माल प्राप्त करने की नीतियाँ (व्यापार)

हड़प्पावासी कच्चा माल प्राप्त करने के लिए कई तरीके अपनाते थे:

 * बस्तियाँ स्थापित करना: जैसे शंख के लिए नागेश्वर और बालाकोट, और लाजवर्द मणि (Lapis Lazuli) के लिए अफगानिस्तान में 'शोर्तुघई'। लोथल से कार्नीलियन, सेलखड़ी और धातु प्राप्त की जाती थी।

 * अभियान भेजना: राजस्थान के खेतड़ी अंचल (ताँबे के लिए) और दक्षिण भारत (सोने के लिए) अभियान भेजे जाते थे। खेतड़ी क्षेत्र की संस्कृति को 'गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति' कहा गया है।

 * सुदूर क्षेत्रों से संपर्क: ताँबा संभवतः ओमान (अरब प्रायद्वीप) से भी मंगाया जाता था, क्योंकि हड़प्पाई पुरावस्तुओं और ओमानी ताँबे दोनों में 'निकल' के अंश मिले हैं। ओमान में एक हड़प्पाई मर्तबान भी मिला है।

 * मेसोपोटामिया से व्यापार: मेसोपोटामिया के लेखों में 'दिलमुन' (बहरीन), 'मगान' (ओमान) और 'मेलुहा' (हड़प्पा क्षेत्र) का जिक्र मिलता है। मेलुहा को 'नाविकों का देश' कहा गया है। यहाँ से कार्नीलियन, लाजवर्द मणि, ताँबा, सोना और लकड़ियाँ निर्यात होती थीं।


9. मुहरें, लिपि और बाट

 * मुहरें: मुहरों का प्रयोग लंबी दूरी के संपर्कों को सुविधाजनक बनाने के लिए होता था। सामान की सुरक्षा के लिए गाँठ पर गीली मिट्टी लगाकर मुहर की छाप (मुद्रांकन) लगाई जाती थी।

 * लिपि: हड़प्पाई लिपि एक 'रहस्यमय लिपि' है क्योंकि इसे आज तक पढ़ा नहीं जा सका है। यह वर्णमालीय नहीं थी और इसमें चिह्नों की संख्या बहुत अधिक (375 से 400) थी। यह दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।

 * बाट: विनिमय के लिए बाटों की एक सूक्ष्म प्रणाली थी। बाट सामान्यतः 'चर्ट' नामक पत्थर से बनाए जाते थे और घनाकार होते थे (बिना किसी निशान के)। निचले मानदंड द्विआधारी (1, 2, 4, 8, 16, 32...) और ऊपरी मानदंड दशमलव प्रणाली का अनुसरण करते थे।


10. प्राचीन सत्ता (शासक और प्रशासन)

हड़प्पाई समाज में जटिल फैसले लेने और उन्हें लागू करने के संकेत मिलते हैं (जैसे ईंटों का समान आकार)।

 * प्रसाद तथा शासक: मोहनजोदड़ो में एक विशाल भवन मिला है जिसे 'प्रासाद' कहा गया, लेकिन भव्य वस्तुएँ नहीं मिलीं। एक पत्थर की मूर्ति को 'पुरोहित-राजा' की संज्ञा दी गई।

 * सिद्धांत: कुछ पुरातत्वविद मानते हैं कि हड़प्पा समाज में सभी समान थे (कोई शासक नहीं)। कुछ मानते हैं कि कई शासक थे (मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के अलग-अलग राजा)। सबसे अधिक मान्य तर्क यह है कि यह एक ही राज्य था, क्योंकि पुरावस्तुओं, ईंटों और बस्तियों के नियोजन में अद्भुत समानता है।


11. सभ्यता का अंत

लगभग 1800 ईसा पूर्व तक चोलिस्तान जैसे क्षेत्रों में विकसित हड़प्पा स्थलों को त्याग दिया गया था। गुजरात और हरियाणा में नई बस्तियों में आबादी बढ़ी।

 * बदलाव: उत्तर हड़प्पा काल में विशिष्ट पुरावस्तुएँ (बाट, मुहरें, मनके) समाप्त हो गईं और लेखन व लंबी दूरी का व्यापार बंद हो गया।

 * कारण: इसके लिए जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अत्यधिक बाढ़, नदियों का सूख जाना या मार्ग बदल लेना जैसे कारण जिम्मेदार माने जाते हैं।


12. हड़प्पा सभ्यता की खोज का इतिहास

 * कनिंघम का भ्रम: भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) के पहले डायरेक्टर जनरल कनिंघम ने हड़प्पा की खोज की, लेकिन वे इसके महत्व को समझ नहीं पाए क्योंकि वे लिखित स्रोतों (चीनी तीर्थयात्रियों के वृतांत) पर निर्भर थे। उन्हें एक हड़प्पाई मुहर मिली थी, लेकिन वे इसे उस कालखंड में फिट करने की कोशिश कर रहे थे जिससे वे परिचित थे।

 * नई खोज: 1920 के दशक में दयाराम साहनी और राखाल दास बनर्जी ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में मुहरें खोज निकालीं। इसके आधार पर 1924 में ASI के डायरेक्टर जनरल जॉन मार्शल ने पूरे विश्व के सामने एक नई सभ्यता (सिंधु घाटी सभ्यता) की खोज की घोषणा की। मार्शल ने क्षैतिज खुदाई करवाई थी।

 * आर.ई.एम. व्हीलर: 1944 में ASI के डायरेक्टर जनरल बने व्हीलर ने खुदाई में 'स्तर-विन्यास' (Stratigraphy) की तकनीक अपनाई, जिससे पुरातात्विक खोजों को सही संदर्भ मिला।


                                 ........End......