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Thursday, 8 January 2026

Class 12 History Chapter 10 Notes in Hindi | विद्रोही और राज | Rebels and the Raj

 


अध्याय 10: विद्रोही और राज

(1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान)


इस अध्याय में हम 1857 के विद्रोह के कारणों, उसके प्रसार, नेतृत्व, विद्रोहियों की सोच और अंग्रेजों द्वारा किए गए दमन के बारे में विस्तार से जानेंगे।


1. विद्रोह की शुरुआत (10 मई, 1857)

 * घटनाक्रम: 10 मई 1857 की दोपहर बाद मेरठ छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। शुरुआत पैदल सेना ने की, फिर घुड़सवार सेना और शहर के आम लोग भी शामिल हो गए।

 * कार्रवाई: सिपाहियों ने शस्त्रागार (Bell of arms) पर कब्जा किया, हथियार लूटे और फिरंगी (अंग्रेजों) के बंगलों को जला दिया।

 * दिल्ली कूच: 11 मई की सुबह मेरठ के सिपाहियों का जत्था दिल्ली पहुंचा और लाल किले के फाटक पर जमा हो गया। उन्होंने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर से नेतृत्व स्वीकार करने की मांग की। अनिच्छा के बावजूद, बादशाह को विद्रोहियों का नेता बनना पड़ा। इससे विद्रोह को एक वैधता (Legitimacy) मिल गई।


2. विद्रोह का ढर्रा (Pattern of Rebellion)

जहाँ-जहाँ विद्रोह हुआ, वहाँ एक समान पैटर्न देखा गया:

 * संकेत: विद्रोह की शुरुआत अक्सर बिगुल बजाकर या शाम को तोप का गोला दागकर होती थी।

 * निशाना: सबसे पहले शस्त्रागार लूटे जाते थे, फिर सरकारी खजाने और जेलों को तोड़ा जाता था। सरकारी इमारतों (रिकॉर्ड रूम, बंगले, पोस्ट ऑफिस) को जलाया जाता था।

 * समानता: विद्रोहियों के बयानों में "सब कुछ खत्म करने" की बात की जाती थी जो फिरंगी राज से जुड़ा था।

 * संचार (Communication): विद्रोह के समरूप ढर्रे से पता चलता है कि विभिन्न छावनियों के बीच योजना और संचार था।

   * उदाहरण: अवध मिलिट्री पुलिस के कैप्टन हियरसे की सुरक्षा के लिए कानपुर की सिपाही लाइनों में पंचायतें होती थीं।

   * चपातियाँ और कमल के फूल गाँव-गाँव घूमने की खबरें भी इस बात का संकेत थीं कि कोई बड़ी उथल-पुथल होने वाली है।


3. नेता और अनुयायी

अंग्रेजों से लड़ने के लिए विद्रोहियों को नेतृत्व की ज़रूरत थी। उन्होंने पुराने शासकों और सरदारों की ओर देखा:

 * दिल्ली: बहादुर शाह जफर (अंतिम मुगल बादशाह)।

 * कानपुर: नाना साहेब (पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी)।

 * झांसी: रानी लक्ष्मीबाई (जिन्होंने अपने दत्तक पुत्र के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी)।

 * बिहार (आरा): कुंवर सिंह (एक स्थानीय ज़मींदार)।

 * अवध: बिरजिस कद्र (वाजिद अली शाह का बेटा) और बेगम हज़रत महल।

आम नेता (Common Leaders):

विद्रोह केवल राजाओं तक सीमित नहीं था। आम लोगों ने भी नेतृत्व किया:

 * शाह मल: उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगना (जाट बहुल) के किसानों को संगठित किया और एक 'अंग्रेजी मुक्त क्षेत्र' बनाया।

 * मौलवी अहमदुल्लाह शाह: फैजाबाद के मौलवी। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि अंग्रेजों का राज खत्म होने वाला है। वे लखनऊ में विद्रोहियों के साथ डटकर लड़े।


4. अफवाहें और भविष्यवाणियां

विद्रोह को भड़काने में अफवाहों ने बड़ी भूमिका निभाई:

 * चर्बी वाले कारतूस: यह अफवाह फैली कि नई एनफील्ड राइफलों (Enfield Rifles) के कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी लगी है, जिसे मुँह से खींचना पड़ता था। इससे हिंदू और मुस्लिम दोनों का धर्म भ्रष्ट होता था।

 * हड्डी का चूरा: यह अफवाह थी कि अंग्रेजों ने बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और सूअर की हड्डियों का चूरा मिला दिया है ताकि लोगों का धर्म और जाति नष्ट हो जाए और वे ईसाई बन जाएं।

 * 100 साल की भविष्यवाणी: यह भविष्यवाणी की गई थी कि प्लासी की जंग (1757) के 100 साल बाद, यानी 23 जून 1857 को अंग्रेजी राज खत्म हो जाएगा।

लोग विश्वास क्यों करते थे?

अफवाहें इसलिए सच लगीं क्योंकि 1820 के दशक से अंग्रेज भारतीय समाज में "सुधार" कर रहे थे जो लोगों को अपने धर्म/संस्कृति पर हमला लगा:

 * सती प्रथा का अंत (1829)।

 * विधवा विवाह को मान्यता।

 * पश्चिमी शिक्षा और ईसाई मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव।

 * गोद लेने की प्रथा पर रोक (झांसी, सतारा)।


5. अवध: "यह वह चेरी है जो एक दिन हमारे मुँह में गिरेगी"

लॉर्ड डलहौजी ने 1851 में अवध के बारे में यह कहा था। 1856 में अवध को औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।

5.1 नवाब का निष्कासन

 * नवाब वाजिद अली शाह को "कुशासन" का आरोप लगाकर गद्दी से हटा दिया गया और कलकत्ता निर्वासित कर दिया गया।

 * नवाब के जाने से जनता में गहरा शोक था। लोगों ने कहा, "देह से जान जा चुकी है"।

5.2 तालुकदारों की बेदखली

अवध के देहातों में तालुकदार (बड़े ज़मींदार) बहुत शक्तिशाली थे।

 * अंग्रेजों ने 1856 का एकमुश्त बंदोबस्त (Summary Settlement) लागू किया। यह इस धारणा पर आधारित था कि तालुकदार ज़मीन के मालिक नहीं हैं।

 * परिणाम: तालुकदारों के पास पहले 67% गाँव थे, जो घटकर 38% रह गए। इससे वे अंग्रेजों के कट्टर दुश्मन बन गए और विद्रोह में बेगम हज़रत महल का साथ दिया।

5.3 किसान और सिपाही का रिश्ता

अवध को "बंगाल आर्मी की पौधशाला" (Nursery of Bengal Army) कहा जाता था। हर घर से कोई न कोई फौज में था।

 * जब सिपाही को नया कारतूस दिया जाता था या उसकी छुट्टियां रद्द की जाती थीं, तो इसका गुस्सा उसके गाँव तक पहुँचता था।

 * सिपाहियों की शिकायतें (कम वेतन, भत्ता बंद होना) और किसानों की शिकायतें (बढ़ा हुआ लगान) आपस में जुड़ी हुई थीं।


6. विद्रोही क्या चाहते थे?

विद्रोहियों के पास अपनी बात रखने के लिए घोषणापत्र (Proclamations) थे:

 * एकता: सभी घोषणाओं में (जैसे आजमगढ़ घोषणा) हिंदुओं और मुसलमानों से एक साथ मिलकर लड़ने की अपील की गई। गाय और सूअर का नाम नहीं लिया जाता था।

 * फिरंगी राज का खात्मा: विद्रोहियों ने अंग्रेजों को भरोसे के लायक नहीं माना। उन्होंने रेलवे, तार और पश्चिमी शिक्षा जैसी चीजों को खारिज किया।

 * वैकल्पिक सत्ता: दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में विद्रोहियों ने पुरानी दरबारी संस्कृति को फिर से स्थापित करने की कोशिश की। सिक्के जारी किए और आदेश दिए।


7. दमन (Repression)

अंग्रेजों ने विद्रोह को कुचलने के लिए पूरी ताकत लगा दी:

 * मार्शल लॉ: मई और जून 1857 में कानून पास करके सैन्य अधिकारियों और आम अंग्रेजों को भी विद्रोहियों को सजा देने (सीधे फाँसी) का अधिकार दे दिया गया।

 * दोतरफा हमला: दिल्ली को जीतने के लिए एक तरफ कलकत्ता से और दूसरी तरफ पंजाब से सेनाएँ भेजी गईं।

 * दिल्ली पर कब्जा: सितंबर 1857 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर दोबारा कब्जा कर लिया। बहादुर शाह जफर को रंगून (बर्मा) भेज दिया गया और उनके बेटों को गोली मार दी गई।

 * गाँवों में आतंक: अंग्रेजों ने केवल सैनिकों से नहीं, बल्कि पूरी आबादी से बदला लिया। "बागी" गांवों को जला दिया गया।

 * जमींदारों का लालच: विद्रोह तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने वफादार जमींदारों को ईनाम और जागीरें देने का वादा किया।


8. विद्रोह की छवियां (Representations)

इतिहास केवल फाइलों में नहीं, बल्कि तस्वीरों और चित्रों में भी दर्ज होता है।

8.1 अंग्रेजों का नज़रिया

अंग्रेज चित्रकारों ने विद्रोह को "बर्बरता बनाम सभ्यता" की लड़ाई के रूप में दिखाया:

 * रक्षा (Relief of Lucknow): थॉमस जोन्स बार्कर की पेंटिंग 'रिलीफ ऑफ लखनऊ' में अंग्रेज जनरलों को नायकों के रूप में दिखाया गया है।

 * असहाय महिलाएं: 'इन मेमोरियम' (जोसेफ नोएल पैटन) जैसी पेंटिंग में अंग्रेज महिलाओं और बच्चों को लाचार दिखाया गया, ताकि देखने वाले के मन में बदला लेने की भावना जागे।

 * प्रतिशोध: 'पंच' (Punch) पत्रिका के कार्टूनों में "बंगाल टाइगर" (विद्रोही) को मारते हुए ब्रिटिश शेर को दिखाया गया। कैनिंग द्वारा दया (Clemency) की बात करने पर उसका मजाक उड़ाया गया।

8.2 राष्ट्रवादियों का नज़रिया

बीसवीं सदी में भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने 1857 से प्रेरणा ली:

 * इसे "प्रथम स्वतंत्रता संग्राम" कहा गया।

 * रानी लक्ष्मीबाई: उन्हें एक वीर योद्धा के रूप में चित्रित किया गया जो अन्याय के खिलाफ लड़ीं।

 * सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी" ने उन्हें जन-जन की नायिका बना दिया।

 * इन चित्रों में रानी को हमेशा घोड़े पर सवार, एक हाथ में तलवार और पीठ पर बच्चे को बांधे हुए दिखाया जाता है, जो प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।


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