अध्याय 11: महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन
(सविनय अवज्ञा और उससे आगे)
इस अध्याय में हम 1915 से 1948 तक के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, महात्मा गाँधी की भूमिका, और उनके द्वारा चलाए गए जन-आंदोलनों (असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो) का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
1. एक नेता का आगमन (1915)
1.1 दक्षिण अफ्रीका से वापसी
* वापसी: मोहनदास करमचंद गाँधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। वे 1893 में वहां गए थे।
* परिवर्तन: दक्षिण अफ्रीका ने ही उन्हें 'महात्मा' बनाया। वहां उन्होंने पहली बार सत्याग्रह (अहिंसक विरोध) का प्रयोग किया, धर्मों के बीच सौहार्द बढ़ाया और "उच्च" जाति के भारतीयों को महिलाओं और दलितों के प्रति भेदभाव न करने की चेतावनी दी।
* गोखले की सलाह: उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें सलाह दी कि वे एक साल तक ब्रिटिश भारत की यात्रा करें और यहाँ की भूमि और लोगों को समझें।
1.2 बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) का उद्घाटन (फरवरी 1916)
गाँधीजी की पहली बड़ी सार्वजनिक उपस्थिति BHU के उद्घाटन समारोह में हुई।
* उपस्थित लोग: एनी बेसेंट जैसे कांग्रेस के नेता और कई राजा-महाराजा उपस्थित थे।
* गाँधीजी का भाषण: उन्होंने अभिजात वर्ग (अमीर/शिक्षित) की आलोचना की। उन्होंने कहा कि "स्वराज तब तक नहीं मिल सकता जब तक हम किसानों और मजदूरों को अपने साथ नहीं लेते"।
* महत्त्व: यह भाषण भारत में "भारतीय राष्ट्रवाद" की नई दिशा का संकेत था, जो अब केवल वकीलों और डॉक्टरों तक सीमित नहीं रहने वाला था।
1.3 शुरुआती आंदोलन
* चंपारण (1917): बिहार के चंपारण में किसानों ने नील की खेती (Indigo farming) की कठोर शर्तों के खिलाफ उनसे मदद मांगी। गाँधीजी ने यहाँ सत्याग्रह किया [cite: 349-350]।
* अहमदाबाद (1918): कपड़ा मिल मजदूरों के लिए बेहतर स्थितियों की मांग को लेकर हस्तक्षेप किया।
* खेड़ा (1918): गुजरात के खेड़ा में फसल बर्बाद होने पर किसानों का लगान माफ करवाने के लिए आंदोलन किया।
2. असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement)
2.1 पृष्ठभूमि: रौलट एक्ट और जलियांवाला बाग
* रौलट एक्ट (1919): प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबंध और बिना मुकदमे के जेल में डालने के जो कानून बनाए थे, उन्हें युद्ध के बाद भी जारी रखा। इसे रौलट एक्ट कहा गया।
* विरोध: गाँधीजी ने इसके खिलाफ देशव्यापी अभियान चलाया। पंजाब में विरोध बहुत तेज था।
* जलियांवाला बाग (13 अप्रैल 1919): अमृतसर में एक अंग्रेज ब्रिगेडियर (जनरल डायर) ने एक शांतिपूर्ण सभा पर गोलियां चलवा दीं, जिसमें 400 से ज्यादा लोग मारे गए।
2.2 खिलाफत और असहयोग का गठजोड़
* खिलाफत आंदोलन: तुर्की के सुल्तान (खलीफा) की शक्तियों को बचाने के लिए भारतीय मुसलमानों (मोहम्मद अली और शौकत अली) ने यह आंदोलन चलाया।
* असहयोग (1920): गाँधीजी ने खिलाफत का समर्थन किया और इसे असहयोग आंदोलन के साथ मिला दिया ताकि हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित हो सके।
* कार्यक्रम: छात्रों ने स्कूल-कॉलेज छोड़े, वकीलों ने अदालतें छोड़ीं, और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई।
* जन आंदोलन: 1857 के बाद यह पहली बार था जब अंग्रेजी राज की नींव हिल गई। हजारों लोग जेल गए।
2.3 चौरा-चौरी और वापसी
* फरवरी 1922: उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गए।
* वापसी: हिंसा देखकर गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन तुरंत वापस ले लिया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 6 साल की सजा सुनाई गई (जज ब्रूमफील्ड द्वारा) [cite: 353-354]।
3. लोक नेता और समाज सुधार (1922-1929)
जेल से छूटने के बाद गाँधीजी ने अपना ध्यान रचनात्मक कार्यों पर लगाया।
3.1 गाँधीजी का व्यक्तित्व
* वे आम लोगों की तरह धोती पहनते थे और चरखा चलाते थे। यह अन्य नेताओं से अलग था जो पश्चिमी सूट-बूट पहनते थे।
* उन्होंने भद्रलोक (अभिजात वर्ग) की भाषा के बजाय आम लोगों की भाषा (हिंदी/उर्दू) का प्रयोग किया।
3.2 चरखा और खादी
* चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक बनाया गया।
* इसका उद्देश्य गरीबों को अतिरिक्त आमदनी देना और मशीनों पर निर्भरता कम करना था।
3.3 कांग्रेस का विस्तार
* कांग्रेस की शाखाएं अब केवल शहरों में नहीं, बल्कि गाँवों और कस्बों में भी खुलीं (प्रजामंडल)।
* प्रांतीय समितियां भाषाई आधार पर बनाई गईं, न कि अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कृत्रिम सीमाओं पर।
4. नमक सत्याग्रह (Salt Satyagraha - 1930)
1928 में साइमन कमीशन के विरोध के बाद, 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पास किया गया। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया।
4.1 दांडी मार्च (Dandi March)
* मुद्दा: गाँधीजी ने 'नमक' को चुना क्योंकि यह हर भारतीय (अमीर-गरीब) के भोजन का हिस्सा था और इस पर टैक्स लगाना अमानवीय था [cite: 360-361]।
* यात्रा: 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से दांडी (समुद्र तट) तक की यात्रा शुरू हुई।
* 6 अप्रैल 1930: दांडी पहुंचकर उन्होंने मुट्ठी भर नमक बनाकर कानून तोड़ा।
4.2 आंदोलन का प्रसार
* देश भर में किसानों, महिलाओं और छात्रों ने नमक कानून तोड़ा।
* शराब की दुकानों और विदेशी कपड़ों की पिकेटिंग की गई।
* 60,000 से अधिक लोग जेल गए।
4.3 गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences)
* पहला (1930): कांग्रेस ने बहिष्कार किया, इसलिए यह असफल रहा।
* गाँधी-इरविन समझौता (1931): गाँधीजी ने आंदोलन स्थगित किया और दूसरे सम्मेलन में जाने को तैयार हुए। इसके बदले कैदियों को रिहा किया गया और तटीय इलाकों में नमक बनाने की छूट मिली।
* दूसरा (लंदन, 1931): गाँधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गए। यह वार्ता विफल रही क्योंकि मुस्लिम लीग, राजे-रजवाड़े और डॉ. अंबेडकर (दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग) ने गाँधीजी के इस दावे को चुनौती दी कि कांग्रेस पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है ।
5. भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement - 1942)
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब क्रिप्स मिशन (1942) विफल हो गया, तो गाँधीजी ने अपना तीसरा बड़ा आंदोलन शुरू किया।
* नारा: "करो या मरो" (Do or Die)।
*विशेषता: अंग्रेजों ने तुरंत गाँधीजी और बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया, लेकिन युवा कार्यकर्ताओं (जयप्रकाश नारायण) ने भूमिगत रहकर आंदोलन जारी रखा।
* विद्रोह: सतारा (महाराष्ट्र) और मेदिनीपुर (बंगाल) में "स्वतंत्र सरकारें" (प्रतिसरकार) स्थापित कर दी गईं।
* महत्त्व: यह आंदोलन इतना व्यापक था कि अंग्रेजों को एहसास हो गया कि अब वे भारत पर ज्यादा दिन राज नहीं कर सकते।
6. आखिरी बहादुरी भरे दिन (1946-1948)
जब आजादी नजदीक थी, देश विभाजन की आग में जल रहा था।
* नोआखली और बिहार: गाँधीजी आजादी के जश्न में दिल्ली में नहीं थे। वे बंगाल के नोआखली और बिहार के दंगा प्रभावित गांवों में पैदल घूमकर शांति और भाईचारे का संदेश दे रहे थे ।
* कलकत्ता (15 अगस्त 1947): उन्होंने 24 घंटे का उपवास रखा और दंगों को शांत कराया।
* दिल्ली: वे दिल्ली आए ताकि पंजाब से आए शरणार्थियों और मुसलमानों के बीच हिंसा रोक सकें। उन्होंने पाकिस्तान को उसकी संपत्ति का हिस्सा देने के लिए भी भारत सरकार पर दबाव डाला।
* हत्या (30 जनवरी 1948): एक प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे ने गाँधीजी की गोली मारकर हत्या कर दी। उनकी मृत्यु पर पूरी दुनिया (आइंस्टीन, जॉर्ज ऑरवेल आदि) ने शोक मनाया ।
7. गाँधीजी को समझना: इतिहास के स्रोत
इतिहासकार गाँधीजी के जीवन को समझने के लिए विभिन्न स्रोतों का उपयोग करते हैं:
* निजी पत्र: गाँधीजी द्वारा लिखे गए और उन्हें मिले पत्र (जैसे नेहरू को लिखे पत्र)। ये उनके निजी विचारों को दर्शाते हैं। (गाँधीजी अपने पत्रों को "हरिजन" अखबार में छापते थे) ।
* आत्मकथा: उनकी आत्मकथा "सत्य के प्रयोग" उनके जीवन के अनुभवों को बताती है, लेकिन यह लेखक की अपनी यादों पर आधारित होती है।
* सरकारी रिकॉर्ड (पुलिस रिपोर्ट): औपनिवेशिक सरकार उन्हें "बागी" मानती थी।
* फोर्टनाइटली रिपोर्ट्स (पाक्षिक रिपोर्ट): नमक यात्रा के दौरान पुलिस ने रिपोर्ट दी थी कि गाँधीजी को ज्यादा समर्थन नहीं मिल रहा, जो कि गलत साबित हुआ ।
* अखबार: अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं के अखबार जनमत को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
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