अध्याय 8: किसान, ज़मींदार और राज्य
(कृषि समाज और मुग़ल साम्राज्य: लगभग 16वीं और 17वीं सदी)
1. परिचय
सोलहवीं और सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान की लगभग 85 प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती थी। मुग़ल साम्राज्य की आमदनी का मुख्य जरिया कृषि उत्पादन था। इसलिए राज्य (बादशाह) का हमेशा यह प्रयास रहता था कि खेती का विस्तार हो और राजस्व (Tax) समय पर मिले।
2. किसान और कृषि उत्पादन
2.1 जानकारी के स्रोत
किसानों ने अपने बारे में खुद बहुत कम लिखा है, इसलिए इतिहासकार मुग़ल दरबार के दस्तावेजों पर निर्भर हैं:
* आइन-ए-अकबरी: यह सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है जिसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल ने लिखा था। इसमें खेतों की जुताई, करों की उगाही और ज़मींदारों के रिश्तों का लेखा-जोखा है।
* अन्य स्रोत: गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के राजस्व दस्तावेज़ और ईस्ट इंडिया कंपनी के रिकॉर्ड्स से भी पूर्वी भारत के कृषि संबंधों की जानकारी मिलती है।
2.2 किसानों के प्रकार
मुग़ल काल में किसानों के लिए 'रैयत' (बहुवचन: रिआया) या 'मुजारियान' शब्द का प्रयोग होता था। किसान दो प्रकार के होते थे:
* खुद-काश्त: ये वे किसान थे जो उसी गाँव में रहते थे जहाँ उनकी ज़मीन थी।
* पाहि-काश्त: ये वे खेतिहर थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे (स्वेच्छा से या मजबूरी में)।
2.3 संपत्ति और तकनीक
* ज़मीन: खेती 'व्यक्तिगत मिल्कियत' के सिद्धांत पर आधारित थी। किसान अपनी ज़मीन खरीद और बेच सकते थे।
* सिंचाई: भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर थी, लेकिन कृत्रिम सिंचाई भी होती थी।
* उत्तर भारत में राज्य ने नहरें खुदवाईं (जैसे शाहजहाँ के समय पंजाब में शाह नहर)।
* सिंचाई के लिए 'रहट' (Persian Wheel) और ढेकुली का प्रयोग होता था।
* तकनीक: पशुबल का प्रयोग होता था। लकड़ी के हल में लोहे की फाल लगाई जाती थी। बीज बोने के लिए बरमे का इस्तेमाल होता था।
2.4 फ़सलों की भरमार
* साल में कम से कम दो फसलें उगाई जाती थीं: खरीफ़ (पतझड़) और रबी (वसंत)।
* सिंचाई वाले इलाकों में तीन फसलें भी होती थीं।
* जिन्स-ए-कामिल (सर्वोत्तम फ़सलें): मुग़ल राज्य 'नक़दी फ़सलों' (Cash Crops) को बढ़ावा देता था क्योंकि इससे ज़्यादा टैक्स मिलता था। जैसे—कपास (मध्य भारत/दक्कन), गन्ना (बंगाल), तिलहन और दलहन।
* नयी फ़सलें: 17वीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से नई चीजें भारत आईं, जैसे—मक्का (अफ्रीका/स्पेन से), टमाटर, आलू, मिर्च, अनानास और पपीता (नई दुनिया/अमेरिका से)।
3. ग्रामीण समुदाय (The Village Community)
ग्रामीण समुदाय के तीन मुख्य घटक थे: खेतिहर किसान, पंचायत और गाँव का मुखिया।
3.1 जाति और ग्रामीण माहौल
* जाति व्यवस्था के कारण किसानों में भेदभाव था। 'हलालखोरान' (गंदगी साफ़ करने वाले) और 'मल्लाहज़ादा' (नाविकों के पुत्र) जैसे समूहों की स्थिति दासों जैसी थी।
* राजपूत और जाट जैसे मध्यवर्ती समूह भी खेती करते थे।
* अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ मुनाफे के कारण सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं।
3.2 पंचायत और मुखिया
* पंचायत: यह गाँव के बुजुर्गों का समूह होता था, जिनके पास पुश्तैनी संपत्ति होती थी। यह एक अल्पतंत्र (Oligarchy) था।
* मुखिया (मुक़द्दम या मंडल): पंचायत का सरदार। इसका चुनाव बुजुर्गों की सहमति से होता था और ज़मींदार इसे मंज़ूरी देता था।
* कार्य: गाँव की आमदनी-खर्च का हिसाब रखना (पटवारी की मदद से), जाति की हदों का पालन करवाना, और प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़/सूखा) से निपटना।
* जाति पंचायत: हर जाति की अपनी पंचायत भी होती थी जो शादियों, आपसी झगड़ों और रीतियों का फैसला करती थी।
3.3 ग्रामीण दस्तकार और जजमानी प्रथा
* गाँवों में लोहार, बढ़ई, कुम्हार, नाई आदि दस्तकार होते थे।
* जजमानी व्यवस्था: बंगाल में ज़मींदार दस्तकारों (जैसे लोहार/बढ़ई) को उनकी सेवा के बदले रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकद देते थे।
* महाराष्ट्र में दस्तकारों को गाँव की ज़मीन का टुकड़ा दिया जाता था जिसे 'वतन' या 'मीरास' कहते थे।
4. कृषि समाज में महिलाएँ
* श्रम में भागीदारी: महिलाएँ और पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर काम करते थे। पुरुष खेत जोतते थे, जबकि महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं। सूत कातना, बर्तन बनाना और कढ़ाई करना महिलाओं का काम था।
* जैविक पूर्वाग्रह: पश्चिमी भारत में माहवारी के दौरान महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की मनाही थी।
* महत्व: शादीशुदा महिलाओं की कमी थी (कुपोषण और प्रसव में मौत के कारण)। इसलिए विधवा विवाह और तलाकशुदा महिलाओं का विवाह मान्य था।
* संपत्ति का अधिकार: महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ मिलता था। राजस्थान, पंजाब और बंगाल में महिला ज़मींदारों के सबूत मिले हैं।
5. जंगल और कबीले
5.1 जंगलों का विस्तार
उस समय भारत का लगभग 40% हिस्सा जंगलों से ढका था (झारखंड, मध्य भारत, पश्चिमी घाट आदि)।
5.2 'जंगली' लोग
* समकालीन ग्रंथों में जंगल में रहने वालों को 'जंगली' कहा गया है, जिसका अर्थ "असभ्य" नहीं बल्कि वे लोग थे जो जंगल के उत्पादों, शिकार और झूम खेती (स्थानांतरीय कृषि) पर निर्भर थे।
* कबीले (जैसे भील) मौसम के अनुसार शिकार और खेती करते थे।
5.3 बाहरी घुसपैठ
* हाथी: राज्य को सेना के लिए हाथियों की ज़रूरत थी, जो जंगलवासी 'पेशकश' (भेंट) के रूप में देते थे।
* व्यापार: जंगल से शहद, मोम और लाख (Lac) का निर्यात होता था।
* सामाजिक बदलाव: कई कबीलाई सरदार ज़मींदार और राजा बन गए (जैसे असम के अहोम राजा)। उन्होंने अपनी सेनाएँ बनाईं। सिंध के कबीलों के पास घुड़सवार सेना थी।
6. ज़मींदार
ज़मींदार वे लोग थे जो अपनी ज़मीन के मालिक थे और गाँव में उनकी हैसियत ऊँची थी। वे खेती नहीं करते थे बल्कि करवाते थे।
* मिल्कियत: ज़मींदारों की निजी ज़मीन को 'मिल्कियत' कहा जाता था। वे इसे बेच सकते थे या गिरवी रख सकते थे।
* ताकत: इनके पास अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ (घुड़सवार, तोपखाने) होती थीं।
* कार्य: राज्य की ओर से कर (Tax) वसूलना। इसके बदले उन्हें मुआवजा मिलता था।
* संबंध: यद्यपि वे शोषण करते थे, फिर भी किसानों के साथ उनके रिश्ते पारस्परिकता और संरक्षण (Paternalism) पर आधारित थे। किसान विद्रोहों में अक्सर किसानों ने ज़मींदारों का साथ दिया।
7. भू-राजस्व प्रणाली (Land Revenue System)
मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक रीढ़ ज़मीन का टैक्स था। इसे संभालने के लिए 'दीवान' का दफ्तर होता था।
राजस्व व्यवस्था के दो चरण थे:
* कर निर्धारण (Jama): वह रकम जो तय की गई है।
* वसूली (Hasil): वह रकम जो सचमुच वसूल की गई।
ज़मीन का वर्गीकरण (अकबर के समय):
अकबर ने ज़मीनों को उनकी उत्पादकता के आधार पर 4 भागों में बाँटा:
* पोलज: जिस पर हर साल खेती होती थी (सबसे अच्छी)।
* परौती: जिसे ताकत वापस पाने के लिए कुछ दिन खाली छोड़ा जाता था।
* चचर: जो 3-4 साल खाली रहती थी।
* बंजर: 5 साल या उससे ज़्यादा समय से खेती न हुई हो।
* अमील-गुज़ार: यह राजस्व वसूलने वाला अधिकारी था। अकबर ने आदेश दिया था कि जहाँ तक हो सके भुगतान नकद (Cash) में लिया जाए।
8. चाँदी का बहाव
16वीं-17वीं सदी में मुग़ल साम्राज्य का व्यापार चीन (मिंग), ईरान (सफ़ावी) और तुर्की (ऑटोमन) के साथ फैला।
* भारत से मसाले और कपड़ा निर्यात होता था।
* इसके बदले में दुनिया भर से चाँदी (Silver) भारत आती थी (क्योंकि भारत में चाँदी की खदानें नहीं थीं)।
* इटली के यात्री जोवान्नी कारेरी (1690) ने लिखा है कि दुनिया भर का सोना-चाँदी घूम-फिरकर हिंदुस्तान में ही जमा हो जाता है।
9. आइन-ए-अकबरी
यह एक ऐतिहासिक और प्रशासनिक ग्रंथ है।
* लेखक: अबुल फ़ज़्ल (अकबर का दरबारी कवि)।
* संकलन: यह अकबरनामा की तीसरी जिल्द है। इसे 1598 ई. में पूरा किया गया।
* उद्देश्य: अकबर के साम्राज्य का एक ऐसा खाका पेश करना जहाँ एक मज़बूत सत्ताधारी वर्ग हो।
* संरचना: यह 5 भागों (दफ़्तरों) में बँटा है:
* मंज़िल आबादी: शाही घर-परिवार के बारे में।
* सिपह आबादी: सैनिक व नागरिक प्रशासन के बारे में।
* मुल्क आबादी: प्रांतों (सूबों) के वित्तीय पहलुओं और राजस्व का विवरण। इसमें "12 प्रांतों का बयान" है।
* चौथा व पाँचवा भाग: भारत के लोगों के मज़हब, साहित्य और रिवाज़ों के बारे में।
* महत्त्व: यह उस समय का एक अनोखा दस्तावेज़ है जो साम्राज्य के हर कोने के बारीक आँकड़े (Statistics) पेश करता है।
* सीमाएँ (Limitations): इसमें जोड़-घटाव की कुछ मामूली गलतियाँ हैं। इसके आँकड़े मुख्य रूप से आगरा और उसके आसपास के इलाकों के हैं, पूरे देश के नहीं।
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