अध्याय 9: उपनिवेशवाद और देहात
(सरकारी अभिलेखों का अध्ययन)
इस अध्याय में हम भारत में औपनिवेशिक शासन (अंग्रेजी राज) के दौरान ग्रामीण समाज में आए बदलावों का अध्ययन करेंगे। इसमें मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों की चर्चा है: बंगाल के ज़मींदार, राजमहल की पहाड़ियों के आदिवासी (पहाड़िया और संथाल), और दक्कन (महाराष्ट्र) के किसान।
1. बंगाल और वहाँ के ज़मींदार
अंग्रेजों ने अपना औपनिवेशिक शासन सबसे पहले बंगाल में स्थापित किया। यहीं उन्होंने ग्रामीण समाज को व्यवस्थित करने और भूमि राजस्व (Land Revenue) वसूलने की नई प्रणालियाँ लागू करने का प्रयास किया।
1.1 इस्तमरारी बंदोबस्त (Permanent Settlement - 1793)
* किसने लागू किया: बंगाल के गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस ने 1793 में।
* क्या था: इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी ने ज़मींदारों को ज़मीन का मालिक नहीं, बल्कि राजस्व समाहर्ता (Revenue Collector) माना।
* उद्देश्य: कंपनी राजस्व की एक निश्चित राशि चाहती थी ताकि वह अपना बजट बना सके। उन्हें उम्मीद थी कि राजस्व निश्चित होने पर ज़मींदार खेती सुधारने में पैसा (निवेश) लगाएंगे, क्योंकि मुनाफ़ा उनका ही होगा।
* सूर्यास्त कानून (Sunset Law): यह एक सख्त नियम था। यदि निश्चित तारीख को सूरज डूबने तक ज़मींदार ने राजस्व जमा नहीं किया, तो उसकी ज़मींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
1.2 ज़मींदारों की असफलता और नीलामी
इस्तमरारी बंदोबस्त लागू होने के बाद, बहुत से बड़े-बड़े ज़मींदार अपनी ज़मीनें बचाने में असफल रहे। 18वीं सदी के अंत तक 75% से अधिक ज़मींदारियां हस्तांतरित हो चुकी थीं।
* बर्दवान की घटना (1797): बर्दवान के राजा की ज़मींदारी नीलाम की गई क्योंकि वे राजस्व नहीं चुका पाए थे। लेकिन नीलामी में एक अजीब खेल हुआ। बोली लगाने वाले ज़्यादातर लोग राजा के ही नौकर और एजेंट थे। उन्होंने ज़मीन खरीदी और फिर पैसा देने से मना कर दिया। अंततः कंपनी को कम दाम में ज़मीन राजा को ही वापस देनी पड़ी।
ज़मींदार राजस्व क्यों नहीं चुका पाते थे? (4 मुख्य कारण):
* माँग बहुत ऊँची थी: कंपनी ने भविष्य में खेती बढ़ने की उम्मीद में शुरुआती राजस्व बहुत ज़्यादा तय कर दिया था।
* कम कीमतें: 1790 के दशक में फसलों की कीमतें बहुत कम थीं, जिससे किसान ज़मींदार को लगान नहीं दे पाते थे और ज़मींदार कंपनी को।
* कठोर नियम: फसल अच्छी हो या खराब, राजस्व ठीक समय पर देना अनिवार्य था।
* ज़मींदारों की शक्ति कम करना: कंपनी ने ज़मींदारों की सैन्य टुकड़ियाँ भंग कर दी थीं। उनकी कचहरियों को कंपनी के कलेक्टर की देखरेख में रख दिया गया था। अब वे किसानों से जबरदस्ती पैसा वसूल नहीं कर सकते थे।
1.3 जोतदारों का उदय (The Rise of Jotedars)
जहाँ एक तरफ ज़मींदार कमजोर हो रहे थे, वहीं गाँवों में धनी किसानों का एक वर्ग मजबूत हो रहा था, जिन्हें 'जोतदार' कहा जाता था। उत्तरी बंगाल में ये बहुत शक्तिशाली थे।
* कौन थे: ये धनी किसान थे जो बड़े-बड़े रकबे (ज़मीन) रखते थे। वे स्थानीय व्यापार और साहूकारी (Money lending) का काम भी करते थे।
* शक्ति का कारण: ज़मींदार अक्सर शहरों में रहते थे, जबकि जोतदार गाँवों में रहते थे। इसलिए गरीब किसानों पर उनका सीधा नियंत्रण था।
* बटाईदार: जोतदारों की ज़मीन पर 'अधियार' या 'बरगादार' (बटाईदार) खेती करते थे। वे अपनी मेहनत और हल लाते थे और फसल का आधा हिस्सा जोतदार को देते थे।
* ज़मींदारों का विरोध: जोतदार जानबूझकर किसानों को ज़मींदार को लगान न देने के लिए भड़काते थे। जब ज़मींदारी नीलाम होती थी, तो अक्सर जोतदार ही उसे खरीद लेते थे।
1.4 ज़मींदारों का प्रतिरोध (ज़मींदारी बचाने के तरीके)
ज़मींदारों ने अपनी ज़मीन बचाने के लिए कई रणनीतियाँ अपनाईं:
* फर्जी बिक्री (बेनामी हस्तांतरण): राजा अपनी ज़मीन का कुछ हिस्सा अपनी माता या घर की स्त्रियों के नाम कर देते थे, क्योंकि कंपनी स्त्रियों की संपत्ति नहीं छीनती थी।
* नीलामी में हेराफेरी: ज़मींदार के आदमी ही नीलामी में ऊँची बोली लगाकर ज़मीन खरीदते और पैसा नहीं देते। बार-बार नीलामी रद्द होने पर कंपनी थककर पुराने ज़मींदार को ही कम दाम पर ज़मीन दे देती थी।
* लठियाल: अगर कोई बाहरी व्यक्ति नीलामी में ज़मीन खरीद भी लेता, तो ज़मींदार के लठैत (लठियाल) उसे गाँव में घुसने नहीं देते थे।
1.5 पाँचवीं रिपोर्ट (The Fifth Report - 1813)
* यह रिपोर्ट ब्रिटिश संसद में पेश की गई थी। यह 1002 पृष्ठों की थी, जिसमें 800 से ज्यादा पन्नों में ज़मींदारों और कलेक्टरों की अर्जियाँ थीं।
* उद्देश्य: ब्रिटेन में कई समूह ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार के खिलाफ थे। वे कंपनी के कुशासन को उजागर करना चाहते थे।
* सच्चाई: आधुनिक शोध बताते हैं कि इस रिपोर्ट में ज़मींदारों के पतन को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था ताकि कंपनी की आलोचना की जा सके। वास्तव में ज़मींदारी व्यवस्था इतनी आसानी से खत्म नहीं हुई थी।
2. कुदाल और हल (राजमहल की पहाड़ियाँ)
यह अध्याय का दूसरा भाग है जो पहाड़िया लोगों (प्रतीक: कुदाल) और संथालों (प्रतीक: हल) के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।
2.1 पहाड़िया लोग (Paharias)
* निवास: ये राजमहल की पहाड़ियों (झारखंड) के इर्द-गिर्द रहते थे।
* जीवन शैली: ये झूम खेती (स्थानांतरीय कृषि) करते थे। झाड़ियों को काटकर और जलाकर ज़मीन साफ करते थे और कुदाल से ज़मीन खुरचकर दालें और ज्वार-बाजरा उगाते थे। ये जंगल से महुआ, रेशम के कोया और काठकोयला इकट्ठा करते थे।
* मैदानों से संबंध: अकाल के समय ये मैदानी इलाकों पर धावा बोलते थे। ज़मींदारों को इनसे शांति बनाए रखने के लिए 'खिराज' (Bribe/Tax) देना पड़ता था।
* अंग्रेजों की नीति:
* 1770 के दशक में अंग्रेजों ने इनका "संहार" करने की क्रूर नीति अपनाई।
* 1780 के दशक में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने "शांति स्थापना" की नीति अपनाई। पहाड़िया मुखियाओं को भत्ता दिया गया, लेकिन कई लोगों ने इसे ठुकरा दिया।
2.2 संथाल: अगुआ बाशिंदे (Santhals)
अंग्रेजों को लगा कि पहाड़िया लोग जंगल नहीं काट रहे और हल से खेती नहीं कर रहे, इसलिए उन्होंने संथालों को बुलाया।
* आगमन: संथाल 1800 के आसपास यहाँ आए। वे मेहनती थे और जंगलों को साफ करके स्थायी खेती करते थे।
* दामिन-इ-कोह (Damin-i-Koh): 1832 में अंग्रेजों ने राजमहल के निचले इलाके की एक बड़ी भूमि को सीमांकित करके संथालों को दे दिया। इसे 'दामिन-इ-कोह' कहा गया। शर्त यह थी कि उन्हें हर साल जंगल का एक हिस्सा साफ करके खेती करनी होगी।
* परिणाम: पहाड़िया लोगों को पहाड़ों के ऊपरी, सूखे और बंजर हिस्सों में पीछे धकेल दिया गया, जिससे उनका जीवन बहुत कठिन हो गया। दूसरी ओर, संथालों की आबादी और गाँव तेजी से बढ़े।
2.3 संथाल विद्रोह (1855-56)
जल्दी ही संथालों को एहसास हुआ कि अंग्रेजों और ज़मींदारों ने उन्हें ठगा है।
* विद्रोह के कारण:
* अंग्रेज उनकी नई साफ की गई ज़मीन पर भारी टैक्स लगा रहे थे।
* साहूकार (जिन्हें वे 'दिकू' कहते थे) बहुत ऊँची ब्याज दर वसूलते थे और कर्ज़ न चुकाने पर ज़मीन हड़प लेते थे।
* ज़मींदार दामिन इलाके पर अपना दावा कर रहे थे।
* विद्रोह: सिधू और कान्हू (मांझी) के नेतृत्व में संथालों ने 1855 में अंग्रेजों, साहूकारों और ज़मींदारों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह कर दिया।
* परिणाम: विद्रोह को कुचल दिया गया, लेकिन इसके बाद अंग्रेजों को 'संथाल परगना' बनाना पड़ा और संथालों की ज़मीन की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाने पड़े।
3. दक्कन के देहात में विद्रोह (कपास और ऋण)
तीसरा भाग पश्चिमी भारत (दक्कन/महाराष्ट्र) के बारे में है।
3.1 रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari System)
बंगाल की इस्तमरारी व्यवस्था के विपरीत, बम्बई दक्कन में 'रैयतवाड़ी' व्यवस्था लागू की गई।
* क्यों: बंगाल में राजस्व तय होने के कारण सरकार को भविष्य में कोई फायदा नहीं हो रहा था। साथ ही, रिकार्डो (अर्थशास्त्री) के सिद्धांतों के अनुसार, अंग्रेज ज़मींदार को 'औसत दर्जे का' मानते थे।
* क्या थी: इसमें सरकार ने ज़मींदारों को हटाकर सीधे रैयत (किसान) के साथ बंदोबस्त किया। राजस्व की राशि 30 साल के लिए तय की जाती थी, जिसे बाद में बढ़ाया जा सकता था।
3.2 ऋणग्रस्तता (Debt)
* उच्च राजस्व: 1820 के दशक में पहला बंदोबस्त हुआ। राजस्व इतना ज्यादा था कि किसान अपनी फसल बेचने के बाद भी उसे चुका नहीं पाते थे।
* साहूकार का जाल: लगान चुकाने के लिए किसान साहूकार से कर्ज़ लेते थे। एक बार कर्ज़ लेने के बाद ब्याज इतना बढ़ जाता था कि किसान हमेशा के लिए कर्ज़दार बन जाता था। साहूकार अनपढ़ किसानों से जाली बॉण्ड पर अंगूठा लगवा लेते थे।
3.3 कपास में तेज़ी (Cotton Boom - 1860s)
* अमेरिकी गृहयुद्ध (1861): जब अमेरिका में गृहयुद्ध शुरू हुआ, तो ब्रिटेन (मैनचेस्टर) की कपास मिलों को कच्चा माल मिलना बंद हो गया। ब्रिटेन भारत की ओर मुड़ा।
* भारत पर प्रभाव: दक्कन के किसानों को कपास उगाने के लिए साहूकारों ने आसानी से और भारी मात्रा में कर्ज़ (Advance) देना शुरू किया। किसानों को लगा कि वे अमीर हो जाएंगे।
* अंत: 1865 में अमेरिका में युद्ध खत्म हुआ और वहाँ से कपास फिर आने लगा। भारतीय कपास की माँग गिर गई और कीमतें टूट गईं। साहूकारों ने कर्ज़ देना बंद कर दिया और पुराना पैसा वापस माँगने लगे।
3.4 दक्कन दंगा (Deccan Riots - 1875)
* कारण: गिरती कीमतें, सरकार द्वारा बढ़ाया गया 50% लगान, और साहूकारों की संवेदनहीनता।
* घटना: विद्रोह सूपा (पूना जिला) से शुरू हुआ। यह विद्रोह अलग था - इसमें किसानों ने साहूकारों की जान लेने के बजाय उनके बही-खाते (Account books) और ऋण-पत्र (Bonds) छीनकर जला दिए।
* परिणाम: सरकार ने सेना बुलाई। बाद में 'दक्कन दंगा आयोग' बिठाया गया। 1878 में आयोग ने रिपोर्ट दी जिसमें दंगे का कारण 'साहूकारों की लालच' बताया गया (ताकि सरकारी राजस्व नीति पर सवाल न उठे)।
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