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Sunday, 11 January 2026

Class 12 Geography Chapter 3 Notes in Hindi | भू-संसाधन तथा कृषि (Notes + Important Questions) 2026


अध्याय 3: भूसंसाधन तथा कृषि



1. भू-उपयोग वर्गीकरण (Land Use Classification)

भारत में भू-उपयोग के अभिलेख भूराजस्व विभाग द्वारा रखे जाते हैं।

 * रिपोर्टिंग क्षेत्र बनाम भौगोलिक क्षेत्र: भूराजस्व विभाग 'रिपोर्टिंग क्षेत्र' (प्रतिवेदन क्षेत्र) के आधार पर आँकड़े प्रस्तुत करता है, जबकि भारतीय सर्वेक्षण विभाग 'भौगोलिक क्षेत्र' की जानकारी देता है।

 * वर्गीकरण के 9 प्रमुख प्रकार:

   * वनों के अधीन क्षेत्र: यह सरकार द्वारा वर्गीकृत/अधिसूचित क्षेत्र है। यहाँ वास्तविक वन हो भी सकते हैं और नहीं भी ।

   * बंजर व व्यर्थ भूमि: वह भूमि जो तकनीक की मदद से भी कृषि योग्य नहीं बनाई जा सकती (जैसे- मरुस्थल, पहाड़ी खड्ड)।

   * गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि: बस्तियाँ, सड़कें, नहरें, उद्योग, दुकानें आदि।

   * स्थायी चरागाह क्षेत्र: यह अधिकतर ग्राम पंचायत या सरकार के अधीन होता है (निजी स्वामित्व बहुत कम) ।

   * विविध तरु-फसलों व उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र: इसमें उद्यान और फलदार वृक्ष शामिल हैं (जो निवल बोए क्षेत्र में शामिल नहीं हैं)।

   * कृषि योग्य व्यर्थ भूमि: वह भूमि जो पिछले 5 वर्षों या उससे अधिक समय तक परती या कृषिरहित है। इसे सुधारा जा सकता है।

   * वर्तमान परती भूमि: वह भूमि जो 1 वर्ष या उससे कम समय तक कृषिरहित रहती है। यह भूमि की उर्वरता वापस पाने का एक तरीका है ।

   * पुरातन परती भूमि: वह भूमि जो 1 से 5 वर्षों के बीच कृषिरहित रहती है।

   * निवल बोया क्षेत्र (Net Sown Area): वह भूमि जिस पर फसलें उगाई व काटी जाती हैं।


2. भारत में भू-उपयोग परिवर्तन (Land Use Changes)

भू-उपयोग में बदलाव अर्थव्यवस्था की संरचना पर निर्भर करता है। इसके तीन मुख्य कारक हैं:

 * अर्थव्यवस्था का आकार: जनसंख्या और आय बढ़ने से भूमि पर दबाव बढ़ता है और सीमांत भूमि प्रयोग में लाई जाती है ।

 * अर्थव्यवस्था की संरचना: द्वितीयक (उद्योग) व तृतीयक (सेवा) सेक्टरों के बढ़ने से कृषि भूमि का उपयोग गैर-कृषि कार्यों (इमारतों आदि) के लिए होने लगता है।

 * कृषि भूमि पर दबाव: यद्यपि जीडीपी में कृषि का योगदान घट रहा है, लेकिन कृषि पर निर्भर जनसंख्या कम नहीं हो रही है, जिससे भूमि पर दबाव बना हुआ है ।

1950-51 से 2019-20 के बीच हुए परिवर्तन:

 * वृद्धि वाले संवर्ग: गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि (अधिकतम वृद्धि), वन क्षेत्र (सीमांकन के कारण), वर्तमान परती भूमि और निवल बोया क्षेत्र ।

 * गिरावट वाले संवर्ग: बंजर व व्यर्थ भूमि, कृषि योग्य व्यर्थ भूमि, फसल वृक्षों के अधीन क्षेत्र और पुरानी परती भूमि ।


3. साझा संपत्ति संसाधन (Common Property Resources - CPRs)

भूमि को स्वामित्व के आधार पर दो भागों में बाँटा जाता है:

 * निजी भूसंपत्ति: व्यक्तियों का निजी अधिकार।

 * साझा संपत्ति संसाधन (CPRs):

   * यह सामुदायिक उपयोग हेतु राज्य के स्वामित्व में होती है।

   * उपयोग: पशुओं के लिए चारा, ईंधन, लकड़ी, और वन उत्पाद (फल, रेशे, औषधियाँ)।

   * महत्त्व: भूमिहीन छोटे कृषकों और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए जीवन-यापन का साधन है। महिलाओं के लिए चारा व ईंधन इकट्ठा करने हेतु विशेष महत्त्व है।

   * उदाहरण: सामुदायिक वन, चरागाह, ग्रामीण जलीय क्षेत्र।


4. भारतीय कृषि के प्रकार और ऋतुएँ

A. कृषि ऋतुएँ (Cropping Seasons):

 * खरीफ (जून से सितंबर): दक्षिण-पश्चिमी मानसून के साथ। प्रमुख फसलें: चावल, कपास, बाजरा, मक्का, ज्वार, अरहर।

 * रबी (अक्टूबर से मार्च): शरद ऋतु। कम तापमान वाली फसलें। प्रमुख फसलें: गेहूँ, चना, सरसों, जौ।

 * जायद (अप्रैल से जून): अल्पकालिक ग्रीष्मकालीन फसल। प्रमुख फसलें: सब्जियाँ, फल, चारा, तरबूज, खीरा।

B. कृषि के प्रकार (आर्द्रता के आधार पर):

 * सिंचित कृषि (Irrigated Farming):

   * रक्षित सिंचाई (Protective): इसका उद्देश्य आर्द्रता की कमी से फसलों को नष्ट होने से बचाना है।

   * उत्पादक सिंचाई (Productive): इसका उद्देश्य पर्याप्त पानी देकर अधिकतम उत्पादकता प्राप्त करना है।

 * वर्षा निर्भर (बारानी) कृषि (Rainfed Farming):

   * शुष्क भूमि कृषि (Dryland Farming): जहाँ वार्षिक वर्षा 75 सेमी से कम हो। फसलें: रागी, बाजरा, मूँग, चना, ग्वार।

   * आर्द्र भूमि कृषि (Wetland Farming): जहाँ वर्षा जल आवश्यकता से अधिक हो। फसलें: चावल, जूट, गन्ना, जलकृषि।


5. प्रमुख फसलें (Major Crops)

I. अनाज (Cereals): कुल बोये क्षेत्र के 54% भाग पर। भारत विश्व का 11% अनाज उगाता है (तीसरा स्थान)।

 * चावल (Rice):

   * प्रमुख भोजन, उष्ण आर्द्र फसल। 22.07% वैश्विक उत्पादन (भारत दूसरा स्थान)।

   * क्षेत्र: पश्चिम बंगाल, पंजाब, यूपी। पश्चिम बंगाल में तीन फसलें ली जाती हैं: औस, अमन, बोरो।

   * पंजाब-हरियाणा में हरित क्रांति और सिंचाई के कारण उच्च उत्पादकता है ।

 * गेहूँ (Wheat):

   * दूसरा प्रमुख अनाज। शीतोष्ण (रबी) फसल। विश्व का 12.8% उत्पादन ।

   * क्षेत्र: गंगा का मैदान, मालवा पठार। 85% क्षेत्र उत्तर-मध्य भारत में केंद्रित है।

   * उत्पादक राज्य: यूपी, एमपी, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान।

 * मोटे अनाज (Coarse Cereals): कुल बोये क्षेत्र का 16.5%।

   * ज्वार: दक्षिण व मध्य भारत के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की मुख्य फसल। महाराष्ट्र सबसे बड़ा उत्पादक (आधे से अधिक)।

   * बाजरा: गर्म व शुष्क जलवायु (सूखा सहन करने वाली)। महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी, राजस्थान, हरियाणा प्रमुख उत्पादक।

   * मक्का: खाद्य व चारा फसल। पूर्वी/उत्तर-पूर्वी भारत को छोड़कर पूरे देश में होती है।

II. दालें (Pulses):

 * प्रोटीन का स्रोत, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं। भारत प्रमुख उत्पादक है ।

 * चना (Gram): वर्षा आधारित, रबी फसल। मध्य और पश्चिम भारत में। कुल क्षेत्र का 2.8%।

 * अरहर (Tur/Pigeon Pea): दूसरी प्रमुख दाल। महाराष्ट्र (एक-तिहाई उत्पादन), यूपी, कर्नाटक प्रमुख राज्य।

III. तिलहन (Oilseeds):

 * कुल शस्य क्षेत्र का 14%। मालवा, गुजरात, राजस्थान, तेलंगाना प्रमुख क्षेत्र।

 * मूँगफली: विश्व का 18.8% उत्पादन। गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु प्रमुख राज्य।

 * तोरिया व सरसों: रबी फसलें, पाला सहन नहीं कर सकतीं। राजस्थान (एक-तिहाई उत्पादन), हरियाणा प्रमुख।

 * सोयाबीन: 90% उत्पादन एमपी और महाराष्ट्र से।

IV. रेशेदार फसलें (Fiber Crops):

 * कपास (Cotton):

   * दो किस्में: भारतीय (छोटे रेशे) और अमेरिकन (लंबे रेशे - जिसे उत्तर-पश्चिम में 'नरमा' कहते हैं)।

   * फूल आने के समय आकाश बादलरहित होना चाहिए।

   * भारत का दूसरा स्थान (चीन के बाद)। प्रमुख राज्य: गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना।

 * जूट (Jute):

   * मोटे वस्त्र, बोरे बनाने में उपयोग। पश्चिम बंगाल (तीन-चौथाई उत्पादन) प्रमुख राज्य। भारत विश्व का 60% जूट पैदा करता है।

V. अन्य फसलें:

 * गन्ना (Sugarcane): सिंचित क्षेत्रों में प्रमुख। भारत दूसरा बड़ा उत्पादक (19.76%)। यूपी (40% उत्पादन), महाराष्ट्र, कर्नाटक प्रमुख राज्य।

 * चाय (Tea):

   * रोपण कृषि, पेय पदार्थ। पत्तियों में कैफ़िन और टैनिन होता है।

   * शुरुआत 1840 में असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में हुई।

   * भारत विश्व का 21.22% उत्पादन करता है। असम में देश का आधे से अधिक उत्पादन होता है।

 * कॉफ़ी (Coffee):

   * किस्में: अरेबिका, रोबस्ता, लिबेरिका। भारत उत्तम किस्म की 'अरेबिका' उगाता है।

   * कर्नाटक (दो-तिहाई से अधिक उत्पादन), केरल, तमिलनाडु।


6. भारत में कृषि विकास (Agricultural Development)

 * स्वतंत्रता से पूर्व: जीविकोपार्जी अर्थव्यवस्था। अकाल और सूखे की समस्या। विभाजन से सिंचित भूमि और जूट/कपास क्षेत्र पाकिस्तान चले गए।

 * स्वतंत्रता के बाद:

   * खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने पर जोर। गहन कृषि जिला कार्यक्रम (IADP) और गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP) शुरू किए गए।

 * हरित क्रांति (Green Revolution):

   * 1960 के दशक के मध्य में मेक्सिको (गेहूँ) और फिलीपींस (चावल) की उच्च उत्पादकता वाली किस्मों (HYV) का प्रयोग।

   * पैकेज प्रौद्योगिकी: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी में सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग।

   * परिणाम: खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता, लेकिन प्रादेशिक असमानता बढ़ी।

 * 1980 और 1990 का दशक:

   * 1988 में कृषि जलवायु नियोजन (Agro-climatic planning) शुरू हुआ।

   * 1990 में उदारीकरण नीति और उन्मुक्त बाज़ार का प्रभाव।

 * वर्तमान नीतियाँ:

   * सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSA): जलवायु अनुकूल कृषि और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण।

   * जैविक खेती: परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) द्वारा प्रोत्साहन।

   * तकनीकी विकास: उर्वरकों की खपत 15 गुना बढ़ी। किसान पोर्टल के माध्यम से बीमा, बीज, मंडी भाव आदि की जानकारी दी जाती है ।


7. भारतीय कृषि की समस्याएँ (Problems of Indian Agriculture)

 * अनियमित मानसून पर निर्भरता: केवल एक-तिहाई भाग सिंचित है। शेष वर्षा पर निर्भर है, जो अनिश्चित है। इससे सूखा और बाढ़ दोनों आते हैं (जुड़वाँ संकट) ।

 * निम्न उत्पादकता: भारत में प्रति हेक्टेयर पैदावार अमेरिका, रूस, जापान से कम है। शुष्क क्षेत्रों में मोटे अनाज की उत्पादकता बहुत कम है।

 * वित्तीय संसाधनों की कमी व ऋणग्रस्तता: आधुनिक कृषि महँगी है। छोटे किसान निवेश नहीं कर पाते और कर्ज के जाल में फँस जाते हैं, जिससे आत्महत्याएँ भी होती हैं ।

 * भूमि सुधारों की कमी: राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण भूमि सुधार पूरी तरह लागू नहीं हुए। भूमि का असमान वितरण जारी है ।

 * छोटे खेत तथा विखंडित जोत: 60% किसानों के पास 1 हेक्टेयर से कम भूमि है। जनसंख्या बढ़ने से जोत का आकार और छोटा हो रहा है। चकबंदी की पुनः आवश्यकता है ।

 * वाणिज्यीकरण का अभाव: अधिकतर किसान केवल स्वयं के उपभोग के लिए फसल उगाते हैं।

 * व्यापक अल्प-रोज़गारी: मौसमी रोज़गारी (4-8 महीने)। साल भर काम नहीं मिलता ।

 * कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण: दोषपूर्ण सिंचाई से जलाक्रांतता (Waterlogging), लवणता (Salinity) और मृदा क्षारता (Alkalinity) बढ़ रही है। कीटनाशकों से मिट्टी जहरीली हो रही है ।

 




महत्त्वपूर्ण प्रश्न



1. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

(सही उत्तर पर निशान लगाएँ)

प्रश्न 1: निम्न में से कौन-सा भू-उपयोग संवर्ग नहीं है?

(क) परती भूमि

(ख) सीमांत भूमि

(ग) निवल बोया क्षेत्र

(घ) कृषि योग्य व्यर्थ भूमि

उत्तर: (ख) सीमांत भूमि

प्रश्न 2: निम्न में से कौन-सी फसल 'शुष्क कृषि' (Dryland Farming) में नहीं बोई जाती है?

(क) रागी

(ख) ज्वार

(ग) मूँगफली

(घ) गन्ना

उत्तर: (घ) गन्ना

(नोट: गन्ने को अधिक पानी की आवश्यकता होती है)

प्रश्न 3: भारत में 'हरित क्रांति' के दौरान गेहूँ और चावल की उच्च उत्पादकता वाली किस्में किन देशों से विकसित की गई थीं?

(क) जापान तथा ऑस्ट्रेलिया

(ख) मैक्सिको तथा फिलीपींस

(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जापान

(घ) मैक्सिको तथा सिंगापुर

उत्तर: (ग) मैक्सिको तथा फिलीपींस

प्रश्न 4: भारत का कौन सा राज्य गन्ने का शीर्ष उत्पादक है (कुल उत्पादन का 40%)?

(क) महाराष्ट्र

(ख) उत्तर प्रदेश

(ग) तमिलनाडु

(घ) कर्नाटक

उत्तर: (ख) उत्तर प्रदेश


2. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें (Fill in the Blanks)

 * पश्चिम बंगाल के किसान चावल की तीन फसलें लेते हैं जिन्हें औस, अमन तथा ________ कहा जाता है।

   उत्तर: बोरो

 * देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में अमेरिकन कपास को ________ कहा जाता है।

   उत्तर: नरमा

 * भू-राजस्व विभाग द्वारा प्रस्तुत क्षेत्रफल ________ क्षेत्र पर आधारित है जो कि भौगोलिक क्षेत्र से भिन्न हो सकता है।

   उत्तर: रिपोर्टिंग (प्रतिवेदन)

 * वह भूमि जो एक कृषि वर्ष या उससे कम समय तक कृषिरहित रहती है, ________ भूमि कहलाती है।

   उत्तर: वर्तमान परती


3. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्न (Very Short Answer Questions)

प्रश्न 1: साझा संपत्ति संसाधन (CPRs) क्या हैं?

उत्तर: साझा संपत्ति संसाधन वे भूमि हैं जिन पर ग्राम पंचायत या समुदाय का स्वामित्व होता है और जिसका उपयोग सभी सदस्य पशुओं के चारे, ईंधन और लकड़ी के लिए करते हैं।


प्रश्न 2: भारत में चाय की खेती सबसे पहले कहाँ और कब शुरू हुई?

उत्तर: भारत में चाय की खेती 1840 में असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में प्रारंभ हुई।


प्रश्न 3: फसल गहनता (Cropping Intensity) का सूत्र लिखिए।

उत्तर: फसल गहनता = (सकल बोया गया क्षेत्र / निवल बोया गया क्षेत्र) × 100।


प्रश्न 4: भारत में 'सुनहरा रेशा' (Golden Fibre) किस फसल को कहा जाता है?

उत्तर: जूट (पटसन) ।


4. विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)


प्रश्न 1: भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर:  भारतीय कृषि अनेक समस्याओं का सामना कर रही है, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं:

 * अनियमित मानसून पर निर्भरता: भारत का केवल एक-तिहाई कृषि क्षेत्र सिंचित है, शेष वर्षा पर निर्भर है। अनिश्चित मानसून के कारण सूखा और बाढ़ की समस्या बनी रहती है ।

 * निम्न उत्पादकता: भारत में चावल, गेहूँ और कपास जैसी फसलों की प्रति हेक्टेयर पैदावार अमेरिका और चीन की तुलना में कम है ।

 * वित्तीय संसाधनों की कमी व ऋणग्रस्तता: छोटे किसानों के पास आधुनिक कृषि के लिए बचत नहीं होती। वे महाजनों से कर्ज लेते हैं और फसल खराब होने पर कर्ज के जाल में फँस जाते हैं।

 * छोटे खेत और विखंडित जोत: 60% से अधिक किसानों के पास 1 हेक्टेयर से कम भूमि है। [cite_start]जनसंख्या बढ़ने से खेत छोटे और बिखरे हुए होते जा रहे हैं, जो आर्थिक रूप से अलाभकारी हैं ।

 * भूमि सुधारों की कमी: राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण भूमि सुधार ठीक से लागू नहीं हो पाए, जिससे भूमि का वितरण असमान है।


प्रश्न 2: भारत में भू-उपयोग परिवर्तन को प्रभावित करने वाले अर्थव्यवस्था के तीन मुख्य कारकों की व्याख्या करें।

उत्तर:  भारत में भू-उपयोग में बदलाव मुख्य रूप से अर्थव्यवस्था में आए परिवर्तनों के कारण हुआ है:

 * अर्थव्यवस्था का आकार: बढ़ती जनसंख्या और आय के स्तर में वृद्धि के कारण भूमि पर दबाव बढ़ता है। इससे सीमांत भूमि (Marginal land) को भी उपयोग में लाया जाने लगता है ।

 * अर्थव्यवस्था की संरचना: समय के साथ प्राथमिक सेक्टर (कृषि) की बजाय द्वितीयक (उद्योग) और तृतीयक (सेवा) सेक्टरों का महत्व बढ़ता है।इससे कृषि भूमि धीरे-धीरे इमारतों, उद्योगों और सड़कों (गैर-कृषि कार्यों) में बदल जाती है ।

 * कृषि भूमि पर दबाव: यद्यपि जीडीपी में कृषि का योगदान कम हो रहा है, लेकिन अभी भी एक बड़ी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। इसलिए भूमि पर कृषि क्रियाकलापों का दबाव कम नहीं होता ।

   * परिणाम: इन बदलावों के कारण 'गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि' में वृद्धि हुई है और 'बंजर व व्यर्थ भूमि' में कमी आई है ।


प्रश्न 3: शुष्क भूमि कृषि (Dryland Farming) और आर्द्र भूमि कृषि (Wetland Farming) में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:  वर्षा निर्भर (बारानी) कृषि को आर्द्रता की उपलब्धता के आधार पर दो भागों में बाँटा जाता है:

 * शुष्क भूमि कृषि:

   * यह उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ वार्षिक वर्षा 75 सेंटीमीटर से कम होती है।

   * यहाँ पानी की कमी होती है, इसलिए आर्द्रता संरक्षण की विधियाँ अपनाई जाती हैं।

   * फसलें: रागी, बाजरा, मूँग, चना और ग्वार (ऐसी फसलें जो सूखा सहन कर सकें)।

 * आर्द्र भूमि कृषि:

   * यह उन क्षेत्रों में होती है जहाँ वर्षा ऋतु में पानी पौधों की ज़रूरत से अधिक होता है।

   * ये क्षेत्र अक्सर बाढ़ और मृदा अपरदन का सामना करते हैं।

   * फसलें: चावल, जूट, गन्ना (ऐसी फसलें जिन्हें अधिक पानी चाहिए) और जलकृषि (Aquaculture)।


प्रश्न 4: भारत में चावल की कृषि के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं और वितरण का वर्णन करें।

उत्तर:

 * भौगोलिक दशाएँ: चावल एक उष्ण आर्द्र कटिबंधीय फसल है। इसे समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊँचाई तक उगाया जा सकता है। पंजाब-हरियाणा जैसे कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसे सिंचाई की मदद से उगाया जाता है ।

 * उत्पादन: भारत विश्व का 22.07% चावल उत्पादन करता है और चीन के बाद दूसरे स्थान पर है।

 * वितरण (प्रमुख राज्य):

   * पश्चिम बंगाल: यहाँ जलवायु अनुकूलता के कारण एक साल में तीन फसलें (औस, अमन, बोरो) ली जाती हैं।

   * उत्तर प्रदेश और पंजाब: पंजाब और हरियाणा में हरित क्रांति, उत्तम बीज और सिंचाई के कारण चावल की उत्पादकता बहुत अधिक है ।

   * अन्य राज्य: तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल।

 * (नोट: पाठ्यपुस्तक के चित्र 3.3 का संदर्भ लें)





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