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Class 12 Hindi Chapter 1 Notes (Aaroh) |pdf| आत्मपरिचय (हरिवंश राय बच्चन) ➤ 2026


अध्याय 1: आत्मपरिचय और एक गीत


कवि : हरिवंश राय बच्चन


विस्तृत कवि परिचय (Poet Introduction)


जीवन और शिक्षा

➤  जन्म: सन् 1907, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में।

➤  निधन: सन् 2003, मुंबई में।

➤  शिक्षा/कार्य: 1942-1952 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे। इसके बाद आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों और विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में कार्य किया।


प्रमुख रचनाएँ (Major Works)


➤  काव्य संग्रह: मधुशाला (1935), मधुबाला (1938), मधुकलश (1938), निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल-अंतर, मिलनयामिनी, सतरंगिणी, आरती और अंगारे, नए पुराने झरोखे, टूटी-फूटी कड़ियाँ।

➤  आत्मकथा (4 खंड): क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।

➤  अनुवाद: हैमलेट, जनगीता, मैकबेथ।

➤  संपूर्ण साहित्य: 'बच्चन ग्रंथावली' के नाम से 10 खंडों में प्रकाशित।


साहित्यिक विशेषताएँ और दर्शन (Literary Style & Philosophy)

  हालावाद (Halavad): बच्चन जी पर मध्ययुगीन फ़ारसी कवि उमर खय्याम का गहरा प्रभाव है। इसे 'हालावाद' कहा        जाता है।

➤  जीवन दर्शन: उनका मानना है कि जीवन एक 'मधुकलश' है, दुनिया 'मधुशाला' है, कल्पना 'साकी' (शराब परोसने वाली) है और कविता वह 'प्याला' है जिसमें जीवन को ढालकर पिया जाता है।

➤  भाषा शैली: उन्होंने छायावाद की कठिन शैली (लाक्षणिक वक्रता) को छोड़कर सीधी-सादी जीवंत भाषा और गेय शैली      (गाने योग्य) का प्रयोग किया।

➤  विरोधों का सामंजस्य: उनका जीवन दर्शन "प्रीति-कलह" है। वे दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग हैं। उनका जीवन        "विरोधों का विरोधाभासमूलक सामंजस्य" है।


कविता: आत्मपरिचय (सप्रसंग व्याख्या और विश्लेषण)


पद्यांश 1


मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,

फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;

कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर

मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ।

 

संदर्भ    :  प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह भाग-2' में संकलित कविता 'आत्मपरिचय' से ली गई हैं। इसके रचयिता हरिवंश राय बच्चन हैं।

प्रसंग     :  इसमें कवि ने दुनिया के साथ अपने द्वंद्वात्मक (Contradictory) संबंधों और निजी प्रेम की स्वीकारोक्तका वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहते हैं कि मैं इस सांसारिक जीवन की जिम्मेदारियों और संघर्षों का बोझ (भार) अपने कंधों पर उठाए घूम    रहा हूँ। इसके बावजूद, मेरा जीवन नीरस नहीं है; मैं अपने जीवन में प्यार लेकर घूमता हूँ।

वि अपने जीवन की तुलना एक सितार (वाद्ययंत्र) से करते हैं। वे कहते हैं कि किसी प्रिय (प्रेयसी) ने उनके हृदय रूपी वीणा के तारों को छूकर झंकृत (Vibrate) कर दिया है। अब वे उन्हीं यादों के सहारे साँसों के दो तार (जीवन) लिए जी रहे हैं।


काव्य-सौंदर्य

➤  जग-जीवन: अनुप्रास अलंकार (ज-ज की आवृत्ति)।

➤  साँसों के दो तार: रूपक अलंकार (Metaphor) - साँसों को तार माना गया है।

➤  भाषा: खड़ी बोली हिंदी।


पद्यांश 2


मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,

मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,

जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,

मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!


प्रसंग     : कवि दुनिया की परवाह न करते हुए अपनी मस्ती में लीन रहने की बात कहते हैं।

व्याख्या : कवि कहते हैं कि मैं स्नेह-सुरा (प्रेम रूपी शराब) पीता हूँ, यानी मैं हमेशा प्रेम के नशे में डूबा रहता हूँ। मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं कि दुनिया मेरे बारे में क्या सोचती है (जग का ध्यान नहीं करता)।

यह संसार स्वार्थी है; यह केवल उन्हीं लोगों की प्रशंसा करता है (उनको पूछता है) जो संसार की चापलूसी करते हैं या उसकी हाँ में हाँ मिलाते हैं (जग की गाते)। लेकिन मैं किसी के दबाव में नहीं आता, मैं केवल वही गीत गाता हूँ जो मेरा मन कहता है (मन का गान)।


काव्य-सौंदर्य

➤  स्नेह-सुरा: रूपक अलंकार (प्रेम को मदिरा बताया है)।

➤  स-स वर्ण की आवृत्ति: अनुप्रास अलंकार।

➤  किया करता हूँ: पद की आवृत्ति से गेयता (Lyrical quality) आई है।


पद्यांश 3


मैं निज उर के उद्‌गार लिए फिरता हूँ,

मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;

यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता

मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!

 

प्रसंग     : कवि को यह भौतिक संसार अधूरा लगता है, इसलिए वे अपनी कल्पना की दुनिया में रहते हैं।

व्याख्या : कवि अपने हृदय (उर) के भावों (उद्‌गार) को ही अपनी संपत्ति मानते हैं। वे दुनिया को प्रेम का उपहार देना चाहते हैं। 

कवि को यह वर्तमान संसार अच्छा नहीं लगता (न मुझको भाता) क्योंकि यह प्रेम के बिना अपूर्ण (अधूरा) है। इसलिए, वे यथार्थ (Reality) से दूर अपने सपनों का एक अलग संसार अपने मन में बसाए फिरते हैं, जहाँ सिर्फ़ प्रेम है।


काव्य-सौंदर्य

➤  स्वप्नों का संसार: अनुप्रास अलंकार।

➤  भाव: प्रेम की आदर्शवादी दुनिया की चाहत।


पद्यांश 4


मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,

सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;

जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,

मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ!


 * प्रसंग: कवि सुख और दुःख दोनों स्थितियों में समान (समभाव) रहने का संदेश देते हैं।

 व्याख्या  :  कवि कहते हैं कि मैंने अपने हृदय में (विरह की) आग जला रखी है और मैं उसी में निरंतर जलता (दहा) रहता हूँ। इसके बावजूद, जीवन में चाहे सुख आए या दुःख, मैं दोनों में मग्न (मस्त) रहता हूँ।

दुनिया के लोग इस संसार रूपी सागर (भव-सागर) की मुसीबतों से पार पाने के लिए कर्मकांड या उपाय रूपी नाव बनाते हैं। लेकिन मैं इस संसार की लहरों (भव मौजों) पर ही मस्ती से बहता हूँ, मुझे पार जाने की चिंता नहीं है।


काव्य-सौंदर्य

➤  भव-सागर और भव-मौजों: रूपक अलंकार (संसार को सागर माना है)।

➤  शैली: मस्ती और फक्कड़पन।


पद्यांश 5


मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,

उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,

जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,

मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!


प्रसंग      :  कवि अपनी विरोधाभासी मनःस्थिति का वर्णन करते हैं।

व्याख्या  :  कवि के अंदर जवानी का जोश और पागलपन (उन्माद) है, लेकिन उस पागलपन में गहरा दुःख (अवसाद) भी छिपा है।

कवि के हृदय में किसी प्रिय की ऐसी याद है जो उन्हें दुनिया के सामने तो हँसाती है (दिखावे के लिए), लेकिन अकेले में अंदर ही अंदर रुलाती है। कवि की स्थिति बाहर से खुश लेकिन भीतर से पीड़ित है।


काव्य-सौंदर्य

➤  उन्मादों में अवसाद: विरोधाभास अलंकार (Paradox) - पागलपन (खुशी) में दुःख।

➤  रस: वियोग शृंगार रस।

➤  करुण भाव: 'हाय' शब्द पीड़ा को दर्शाता है।


पद्यांश 6 और 7


कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?

नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना! ...

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,

मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;

 

प्रसंग      :  कवि दुनिया के ज्ञान पर व्यंग्य करते हैं और खुद को दुनिया से अलग बताते हैं।

व्याख्या  :  कवि कहते हैं कि लोगों ने सत्य जानने के बहुत यत्न (प्रयास) किए, लेकिन कोई सत्य नहीं जान पाया। दुनिया बड़ी अजीब है, जहाँ दाना (बुद्धिमान/ज्ञानी/भोग-विलास की सामग्री) होते हैं, वहीं नादान (मूर्ख) भी इकट्ठे हो जाते हैं। लोग वहीं बसते हैं जहाँ धन-दौलत है, जो कि नादानी है।

कवि आगे कहते हैं: "मैं और, और जग और" - यानी मेरा स्वभाव अलग है और दुनिया का स्वभाव बिल्कुल अलग है। हमारा आपस में कोई नाता (संबंध) नहीं हो सकता। मैं तो अपनी कल्पना में रोज न जाने कितने संसार बनाता हूँ और मिटा देता हूँ, जबकि यह दुनिया धरती पर धन-वैभव (वैभव) जोड़ने में लगी है। मैं ऐसी धरती को हर कदम पर ठुकराता हूँ।


काव्य-सौंदर्य

➤  मैं और, और जग और: यहाँ 'और' शब्द तीन बार आया है। पहले और तीसरे 'और' का अर्थ 'भिन्न/अलग' है, दूसरे 'और' का अर्थ 'तथा' है। अतः यहाँ यमक अलंकार है।

➤  बना-बना: पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।


पद्यांश 8


मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,

शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,

हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,

मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।


प्रसंग     :  कवि अपने दुःख और विद्रोह को व्यक्त कर रहे हैं।

व्याख्या  :  कवि कहते हैं कि मेरे रोदन (रोने) में भी एक राग (प्रेम का गीत) छिपा है। मेरी वाणी बहुत शीतल (कोमल) है, लेकिन इसमें विद्रोह और असंतोष की आग धधक रही है।

मेरा हृदय प्रेम की निराशा के कारण खंडहर जैसा हो गया है, लेकिन यह खंडहर इतना कीमती है कि इस पर राजाओं (भूपों) के बड़े-बड़े महल (प्रासाद) भी न्योछावर किए जा सकते हैं। अर्थात्, कवि का प्रेम महलों से भी श्रेष्ठ है।


काव्य-सौंदर्य

➤  रोदन में राग और शीतल वाणी में आग: विरोधाभास अलंकार (Paradox)।

➤  प्रासाद/खंडहर: विपरीतार्थक शब्द शक्ति।


पद्यांश 9


मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,

मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;

क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,

मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

 

प्रसंग      :  कवि अपनी पहचान 'कवि' के रूप में नहीं, बल्कि 'प्रेमी' के रूप में चाहते हैं।

व्याख्या  :  कवि कहते हैं कि जब मैं पीड़ा से रोता हूँ, तो दुनिया उसे 'गाना' समझती है। जब मेरा दुःख बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और मैं फूट पड़ता हूँ, तो लोग कहते हैं कि मैंने छंद (कविता) बना दी।

कवि प्रश्न करते हैं कि संसार मुझे 'कवि' कहकर क्यों सम्मान दे रहा है? मैं तो वास्तव में दुनिया का एक नया दीवाना हूँ जो प्रेम की मस्ती में झूम रहा है।

मैं दुनिया के लिए मस्ती का संदेश लेकर घूमता हूँ, जिसे सुनकर लोग झूमते हैं, झुकते हैं और लहराते हैं। मैं उसी 'निःशेष' (असीम) मस्ती को बांटता फिर रहा हूँ।



कविता: एक गीत (दिन जल्दी-जल्दी ढलता है)


संदर्भ: यह गीत 'निशा निमंत्रण' से लिया गया है।

पद्यांश 1


हो जाए न पथ में रात कहीं,

मंजिल भी तो है दूर नहीं-

यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

 

व्याख्या  :  दिन भर चलकर थका हुआ यात्री (पंथी) यह सोचता है कि मंजिल अब ज्यादा दूर नहीं है। लेकिन उसे डर है कि कहीं रास्ते (पथ) में ही रात न हो जाए। अपनी मंजिल को समीप देखकर और रात होने के डर से वह अपने कदम तेजी से बढ़ाता है (जल्दी-जल्दी चलता है)। उसे लगता है कि समय (दिन) बहुत तेजी से बीत रहा है।


काव्य-सौंदर्य

➤  जल्दी-जल्दी' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

➤  भाषा सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण है।

➤  बिम्ब योजना (Visual Imagery) का सुंदर प्रयोग है।


पद्यांश 2


बच्चे प्रत्याशा में होंगे,

नीड़ों से झाँक रहे होंगे-

यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

 

व्याख्या  :  कवि प्रकृति का उदाहरण देते हैं। शाम होते ही चिड़ियों को ख्याल आता है कि उनके बच्चे भोजन और सुरक्षा की आशा (प्रत्याशा) में घोंसलों (नीड़ों) से बाहर झाँककर उनका इंतजार कर रहे होंगे।

यह ममता भरा विचार आते ही चिड़ियों के पंखों में अद्भुत चंचलता (तेजी) आ जाती है और वे तेजी से अपने बच्चों के पास उड़ चलती हैं।


काव्य-सौंदर्य

➤  चिड़ियों के माध्यम से ममता और वात्सल्य भाव प्रकट हुआ है।

➤  भाषा में तत्सम शब्दों (प्रत्याशा, नीड़) का प्रयोग है।

➤  प्रश्नात्मक शैली का प्रयोग नहीं है, लेकिन दृश्य बिम्ब है।


पद्यांश 3


मुझसे मिलने को कौन विकल?

मैं होऊँ किसके हित चंचल?

यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!


व्याख्या  : अंत में कवि अपनी एकाकी (अकेलेपन) दशा का वर्णन करते हैं। वे खुद से प्रश्न करते हैं: "मुझसे मिलने के लिए कौन व्याकुल (विकल) है?" अर्थात् मेरा इंतज़ार करने वाला कोई नहीं है।

तो फिर मैं किसके लिए (किसके हित) तेजी दिखाऊँ या चंचल बनूँ? जैसे ही यह प्रश्न कवि के मन में आता है, उनके पैर शिथिल (ढीले/सुस्त) पड़ जाते हैं और उनके हृदय (उर) में निराशा और विह्वलता (बेचैनी) भर जाती है। इससे पता चलता है कि प्रेम और प्रतीक्षा ही जीवन में उत्साह भरते हैं।


काव्य-सौंदर्य

➤  'मुझसे मिलने...' और 'मैं होऊँ...' पंक्तियों में प्रश्न अलंकार है।

➤  'मैं' और 'के' वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है।

➤  कवि की एकाकीपन की पीड़ा (वियोग रस) व्यक्त हुई है।


महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर 


प्रश्न 1 "शीतल वाणी में आग" से क्या अभिप्राय है?

उत्तर : यह एक विरोधाभास है। इसका अर्थ है कि यद्यपि कवि के बोलने का ढंग कोमल और शांत (शीतल) है, लेकिन उनके शब्दों के पीछे हृदय की तीव्र पीड़ा, असंतोष और वियोग की आग छिपी हुई है। वे प्रेम के विद्रोह को शालीनता से व्यक्त कर रहे हैं।


प्रश्न 2 "मैं और, और जग और" पंक्ति में 'और' शब्द की विशेषता बताइए।

उत्तर : यहाँ 'और' शब्द का तीन बार प्रयोग हुआ है, जिसे यमक अलंकार कहते हैं:

       ➤  पहला 'और' = कवि स्वयं को 'विशिष्ट/भिन्न' बता रहा है।

       ➤  तीसरा 'और' = दुनिया को 'भिन्न/अलग' बता रहा है।

       ➤  बीच वाला 'और' = योजक (Conjunction 'And') के रूप में प्रयोग हुआ है।


प्रश्न 3 "दिन जल्दी-जल्दी ढलता है" की आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?

उत्तर : इस पंक्ति की आवृत्ति (Repetition) समय की गतिशीलता (Time is fleeting) को दर्शाती है। यह बताता है कि समय किसी के लिए नहीं रुकता और लक्ष्य तक पहुँचने की व्याकुलता (Urgency) को बढ़ाता है।


प्रश्न 4 "बच्चे किस बात की आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे?"

उत्तर : बच्चे इस आशा (प्रत्याशा) में झाँक रहे हैं कि उनके माता-पिता उनके लिए दाना (भोजन) लेकर लौटेंगे और उन्हें स्नेह (प्यार) देंगे।


प्रश्न 5 "नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना" - आशय स्पष्ट करें।

उत्तर : 'दाना' का अर्थ है - समझदार या भोग-विलास की सामग्री। कवि कहते हैं कि लोग सांसारिक सुख-सुविधाओं (दाना) को ही सत्य मानकर उसे पाने में लगे रहते हैं। वे यह नहीं समझते कि यह संसार नश्वर है। सत्य को भूलकर माया के पीछे भागना ही उनकी नादानी है।


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