Class 12 History Chapter 3 Notes in Hindi | बंधुत्व, जाति तथा वर्ग (कुंती और निषादी)

अध्याय 3: बंधुत्व, जाति तथा वर्ग (आरंभिक समाज)


कालखंड: लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी


यह अध्याय 600 ई.पू. से 600 ईसवी के मध्य हुए सामाजिक परिवर्तनों, वर्ण व्यवस्था की जटिलताओं, और महाभारत जैसे ग्रंथों के माध्यम से समाज के विश्लेषण पर केंद्रित है।


1. महाभारत: एक परिचय और इसका समालोचनात्मक संस्करण 

महाभारत भारत का सबसे विशाल महाकाव्य है। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक श्रेणियों और परिस्थितियों का विस्तृत लेखा-जोखा है।


1.1 परियोजना की शुरुआत और प्रक्रिया

आरंभ: 1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में ।

उद्देश्य: संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप (कश्मीर से नेपाल और दक्षिण में केरल से तमिलनाडु तक) से महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियों को एकत्रित करना।

विधि: विद्वानों ने उन श्लोकों का चयन किया जो सभी पांडुलिपियों में समान (Common) पाए गए।

परिणाम:

यह प्रकाशन 13,000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रंथ खंडों में हुआ।

इस विशाल कार्य को पूरा करने में 47 वर्ष लगे।


1.2 इस संस्करण से उभरे दो मुख्य तथ्य

समानता (Commonality): उत्तर और दक्षिण भारत की पांडुलिपियों में संस्कृत के कई पाठों में अद्भुत समानता थी।

क्षेत्रीय प्रभेद (Regional Variations): शताब्दियों के दौरान हुए महाभारत के प्रेषण में कई क्षेत्रीय अंतर भी उभरे। इन अंतरों को मुख्य पाठ की पादटिप्पणियों (Footnotes) और परिशिष्टों में संकलित किया गया। मजे की बात यह है कि 13,000 पृष्ठों में से आधे से अधिक पृष्ठ इन्हीं प्रभेदों का ब्योरा देते हैं ।

इतिहासकारों का निष्कर्ष: ये प्रभेद उन गूढ़ प्रक्रियाओं के द्योतक हैं जिन्होंने प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय विचार/आचरण के बीच संवाद और द्वंद्व को जन्म दिया ।


2. बंधुता (Kinship) और विवाह: परिवार की संरचना


2.1 पारिवारिक शब्दावली (महत्वपूर्ण)

संस्कृत ग्रंथों में विशिष्ट शब्दों का प्रयोग होता है:

कुल (Kula): इसका प्रयोग परिवार के लिए होता है।

जाति (Jati): इसका प्रयोग बांधवों (रिश्तेदारों) के बड़े समूह के लिए होता है।

वंश (Vamsha): इसका प्रयोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूर्वजों की सूची के लिए होता है।


2.2 पितृवंशिकता (Patriliny) का आदर्श

परिभाषा: वह परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र और प्रपौत्र तक चलती है।

महाभारत का साक्ष्य: महाभारत मूलतः बांधवों के दो दलों—कौरव और पांडव—के बीच भूमि और सत्ता के संघर्ष की कथा है। दोनों कुरु वंश से संबंधित थे ।

परिवर्तन: युद्ध में पांडवों की विजय के बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार को कड़ाई से लागू किया गया। [cite_start]पिता की मृत्यु के बाद संसाधनों (और राजाओं के मामले में सिंहासन) पर पुत्रों का अधिकार माना गया [cite: 77-79]।

पुत्र न होने की स्थिति में:

भाई उत्तराधिकारी हो सकता था।

कभी-कभी अन्य बंधु-बांधव सिंहासन पर दावा करते थे।

अपवाद: बहुत कम परिस्थितियों में स्त्रियाँ (जैसे प्रभावती गुप्त) सत्ता का उपभोग करती थीं।

ऋग्वेद का साक्ष्य: ऋग्वेद के विवाह मंत्रों में भी "उत्तम पुत्रों" के प्रजनन की कामना की गई है, जिससे पता चलता है कि यह आदर्श केवल राज परिवारों तक सीमित नहीं था, बल्कि धनी और ब्राह्मण वर्ग में भी प्रचलित था।


2.3 विवाह के नियम (Rules of Marriage)

बहिर्विवाह (Exogamy): गोत्र से बाहर विवाह करना। इसे उच्च प्रतिष्ठा वाले परिवारों में सही माना जाता था।

कन्यादान: पिता द्वारा पुत्री का विवाह में दान करना एक महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना जाता था।

धर्मशास्त्रों के 8 विवाह प्रकार:

धर्मसूत्रों (लगभग 500 ई.पू.) और मनुस्मृति (200 ई.पू.-200 ई.) में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं।

प्रथम चार: इन्हें 'उत्तम' माना गया (जिनमें कन्यादान और पिता की सहमति हो)।

अंतिम चार: इन्हें 'निंदित' माना गया (संभवतः ये उन लोगों में प्रचलित थे जो ब्राह्मणीय नियमों को नहीं मानते थे)।


2.4 स्त्री का गोत्र (The Gotra of Women)

लगभग 1000 ई.पू. के बाद गोत्र व्यवस्था को संहिताबद्ध किया गया।

वर्गीकरण: गोत्र प्राचीन वैदिक ऋषियों (जैसे वसिष्ठ, गौतम) के नाम पर होते थे।

दो प्रमुख नियम:

विवाह के बाद स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति का गोत्र अपनाना होता था।

एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे।

अपवाद: सातवाहन शासक (The Satavahana Exception)

सातवाहन (पश्चिमी भारत और दक्कन, 200 ई.पू. - 200 ई.) के अभिलेखों से ब्राह्मणीय नियमों के विपरीत प्रथाओं का पता चलता है :

पिता का गोत्र रखना: सातवाहन रानियों ने विवाह के बाद पति का गोत्र नहीं अपनाया, बल्कि अपने पिता का गोत्र (जैसे गौतम और वसिष्ठ) ही लगाए रखा ।

अंतर्विवाह (Endogamy): कई रानियां और राजा एक ही गोत्र के थे (जैसे गौतम)। यह 'बहिर्विवाह' नियम का उल्लंघन था ।

विश्लेषण: यह दक्षिण भारत में प्रचलित ममेरे-चचेरे भाई-बहन (Cross-Cousin Marriage) के साथ विवाह की प्रथा को दर्शाता है, जिससे समुदाय सुगठित रहता था ।

मातृनाम (Metronymics): राजाओं के नाम उनकी माताओं के नाम पर होते थे।

उदाहरण: राजा गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि (गौतमी का पुत्र), राजा वसिथि-पुत्त (सामि) सिरि-पुलुमायि।

सावधानी: मातृनाम होने के बावजूद, सातवाहनों में उत्तराधिकार पितृवंशिक (पिता से पुत्र) ही था।


3. सामाजिक विषमताएँ: वर्ण और जाति व्यवस्था


3.1 वर्ण व्यवस्था: आदर्श जीविका

धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में चार वर्णों के लिए "आदर्श जीविका" तय की गई थी :

ब्राह्मण: वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना/करवाना, दान देना/लेना।

क्षत्रिय: युद्ध करना, सुरक्षा देना, न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना, दान देना।

वैश्य: कृषि, गौ-पालन, व्यापार, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना, दान देना।

शूद्र: तीनों उच्च वर्णों की सेवा करना (एकमात्र जीविका)।


3.2 इस व्यवस्था को लागू करने की 3 नीतियाँ

ब्राह्मणों ने इन नियमों का पालन करवाने के लिए तीन रणनीतियाँ अपनाईं :

दैवीय उत्पत्ति: उन्होंने बताया कि वर्ण व्यवस्था पुरुषसूक्त (ऋग्वेद) के अनुसार आदि मानव (ब्रह्मा) के शरीर से उत्पन्न हुई है (ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य जंघा से, शूद्र पैरों से)।

शासकों को सलाह: वे राजाओं को उपदेश देते थे कि वे अपने राज्य में इस व्यवस्था को लागू करें।

जन्म आधारित प्रतिष्ठा: उन्होंने लोगों को विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि उनकी प्रतिष्ठा जन्म से निर्धारित है।


3.3 क्या केवल क्षत्रिय ही राजा हो सकते थे? (Non-Kshatriya Kings)

शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा होने चाहिए, लेकिन इतिहास में कई महत्वपूर्ण राजवंश अन्य वर्णों से थे:

मौर्य वंश: बौद्ध ग्रंथ इन्हें क्षत्रिय बताते हैं, लेकिन ब्राह्मणीय ग्रंथ इन्हें 'निम्न' कुल का मानते हैं।

शुंग और कण्व: मौर्यों के बाद शासन करने वाले ये वंश ब्राह्मण थे।

शक (Shakas): मध्य एशिया से आए शक शासकों को ब्राह्मण 'मलेच्छ', 'बर्बर' या अन्यदेशीय मानते थे।

उदाहरण: सुदर्शन सरोवर का जीर्णोद्धार कराने वाला प्रसिद्ध शक राजा रुद्रदामन संस्कृत परंपरा से परिचित था ।

सातवाहन: सबसे प्रसिद्ध राजा गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने एक अभिलेख में दावा किया कि वह:

'अनूठा ब्राह्मण' (Eka Bamhana) है।

साथ ही वह 'क्षत्रियों के दर्प (घमंड) का हनन करने वाला' है।

उसने चार वर्णों के बीच संकर (मिश्रण) को रोकने का दावा किया, लेकिन फिर भी रुद्रदामन (शक) के परिवार से वैवाहिक संबंध स्थापित किए ।


3.4 जाति और सामाजिक गतिशीलता

वर्ण vs जाति: वर्ण संख्या में 4 थे, लेकिन जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी।

नए समुदायों का वर्गीकरण: निषाद (शिकारी) या सुवर्णकार (सोनार) जैसे समूहों को, जिन्हें वर्ण व्यवस्था में फिट नहीं किया जा सका, उन्हें 'जाति' में डाल दिया गया।

श्रेणी (Guilds): समान व्यवसाय वाले लोगों की जातियाँ कभी-कभी 'श्रेणी' में संगठित होती थीं।

मंदसौर अभिलेख (मध्य प्रदेश, 5वीं सदी): यह एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है।

यह रेशम बुनकरों की श्रेणी का वर्णन करता है जो मूलतः लाट (गुजरात) के निवासी थे।

वे वहां के राजा की महानता सुनकर, बच्चों और बांधवों के साथ कठिन यात्रा करके मंदसौर (दशपुर) आए थे।

बहुमुखी प्रतिभा: अभिलेख बताता है कि बुनकर केवल कपड़ा नहीं बुनते थे; कुछ संगीत प्रेमी थे, कुछ कथा वाचक, कुछ धार्मिक अनुष्ठान करते थे, और कुछ ज्योतिष या युद्ध कला में निपुण थे।

उन्होंने कमाई से सूर्य देवता का मंदिर बनवाया।


3.5 चार वर्णों के परे: एकीकरण और संघर्ष

ब्राह्मणीय व्यवस्था से बाहर के लोगों को अलग दृष्टि से देखा जाता था:

 * निषाद: वन में रहने वाले शिकारी (उदा. एकलव्य)। इन्हें विचित्र और पशुवत चित्रित किया गया।

 * यायावर पशुपालक: इन्हें भी शंका की दृष्टि से देखा जाता था क्योंकि ये एक जगह नहीं बसते थे।

 * मलेच्छ: जो संस्कृत नहीं बोलते थे या विदेशी थे। महाभारत में पाण्डव भीम का विवाह हिडिम्बा (एक राक्षसी) से होना यह दिखाता है कि ब्राह्मणीय मानदंडों से बाहर के लोगों के साथ भी संबंध बनते थे (उनका पुत्र घटोत्कच बना)।


3.6 अस्पृश्यता (Untouchability)

ब्राह्मणों ने कुछ कर्मों को 'पवित्र' और कुछ को 'दूषित' माना। शवों की अंत्येष्टि और मृत पशुओं को छूने वालों को चाण्डाल कहा गया।

मनुस्मृति में चाण्डालों के कर्तव्य :

गाँव के बाहर रहना।

फेंके हुए बर्तनों का उपयोग करना।

मरे हुए लोगों के वस्त्र और लोहे के आभूषण पहनना।

रात में गाँव/नगर में चलने की मनाही।

लावारिस शवों की अंत्येष्टि करना और वधिक (Executioner) का काम करना।

चीनी यात्रियों की आँखों देखी:

फा-शिएन (5वीं सदी): अस्पृश्यों को सड़क पर चलते समय करताल बजानी पड़ती थी ताकि अन्य लोग उन्हें देखने के 'दोष' से बच सकें।

श्वैन-त्सांग (7वीं सदी): सफाई करने वालों और वधिकों को नगर से बाहर रहना पड़ता था।

मातंग जातक (बौद्ध ग्रंथ): 

इसमें एक बोधिसत्व (बुद्ध) को चाण्डाल के रूप में दिखाया गया है, जो दिथ्थ मांगलिक नामक व्यापारी पुत्री से विवाह करता है और ब्राह्मणों के गर्व को चुनौती देता है । यह दिखाता है कि 'अस्पृश्यों' ने हमेशा हीनता स्वीकार नहीं की।


4. जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा

सामाजिक प्रतिष्ठा काफी हद तक संपत्ति और संसाधनों पर नियंत्रण से तय होती थी।


4.1 संपत्ति पर लैंगिक अधिकार (Gendered Access)

मनुस्मृति के नियम:

माता-पिता की मृत्यु के बाद जायदाद सभी पुत्रों में समान बँटेगी, लेकिन ज्येष्ठ पुत्र को विशेष हिस्सा मिलेगा।

स्त्रियाँ पैतृक संपत्ति की मांग नहीं कर सकती थीं।

स्त्रीधन (Stridhana):

विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व होता था।

इसे उसकी संतान विरासत में ले सकती थी, पति का इस पर अधिकार नहीं था ।

फिर भी, मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के बिना धन संचय करने के विरुद्ध चेतावनी देती है।

धन अर्जन के तरीके :

पुरुष (7 तरीके) : विरासत, खोज, खरीद, विजय, निवेश, कार्य, और सज्जनों से मिली भेंट।

स्त्री (6 तरीके) : वैवाहिक अग्नि के सामने, वधूगमन के समय, स्नेह के प्रतीक, भाई/माता/पिता से उपहार, और पति से प्राप्त।


4.2 वर्ण और संपत्ति

ब्राह्मण और क्षत्रिय सबसे धनी होते थे। शूद्रों का कार्य सेवा था, इसलिए वे निर्धन थे।

बौद्ध आलोचना: बौद्ध धर्म ने वर्ण-आधारित प्रतिष्ठा को खारिज किया। मज्झिमनिकाय (बौद्ध ग्रंथ) में अवन्तिपुत्र (राजा) और कच्चन (बुद्ध के शिष्य) के संवाद में यह तर्क दिया गया है:

यदि शूद्र के पास धन हो, तो वह भी क्षत्रिय या ब्राह्मण को अपना सेवक बना सकता है। इसलिए वर्ण श्रेष्ठता का आधार नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति महत्वपूर्ण है ।


4.3 एक वैकल्पिक सामाजिक रूपरेखा: दानशील सरदार (Tamilakam)

प्राचीन तमिलकम् (संगम साहित्य क्षेत्र) में एक अलग सामाजिक मूल्य था।

यहाँ संपत्ति का संग्रह करने वाले की निंदा होती थी, और दान देने वाले सरदार (Chiefs) की प्रशंसा।

सरदार अपने चारणों (Bards) और कवियों के आश्रयदाता होते थे। पुरुनारुरू (तमिल रचना) में एक चारण अपने सरदार को "चारणों की क्षुधा का शत्रु" बताता है ।


5. सामाजिक विषमता की व्याख्या: सामाजिक अनुबंध (Social Contract)


बौद्धों ने समाज में विषमता को नैसर्गिक (Natural) या दैवीय (Divine) नहीं माना।

सुत्तपिटक का मिथक : प्रारंभ में मानव और वनस्पति जगत शुद्ध थे। जीव शांति से रहते थे।

पतन : धीरे-धीरे मनुष्यों में लालच और कपट आया।

समाधान : लोगों ने विचार किया कि एक ऐसे व्यक्ति को चुना जाए जो सही बात पर क्रोधित हो और न्याय करे। उसे 'महासम्मत्त' (बड़ा चुना हुआ) की उपाधि दी गई।

कर (Tax) : राजा की सेवा के बदले लोग उसे चावल का अंश देते थे।

महत्व : यह सिद्धांत बताता है कि राजा का पद मानवीय चुनाव और सहमति पर आधारित है, न कि किसी देवता की इच्छा पर।


6. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल: इतिहासकार और महाभारत


6.1 भाषा और विषयवस्तु

  •   भाषा : महाभारत की संस्कृत वेदों की जटिल संस्कृत से कहीं अधिक सरल है, इसलिए इसे व्यापक रूप से समझा जाता था ।
  •   विषयवस्तु का विभाजन :
  •   आख्यान (Narrative) : कहानियों का संग्रह।
  •   उपदेशात्मक (Didactic) : सामाजिक आचार-विचार और शिक्षा (जैसे भगवद्गीता, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं)।
  •    नोट: यह विभाजन पूर्णत : अलग नहीं है; उपदेशात्मक हिस्सों में भी कहानियाँ हैं। इतिहासकार मानते हैं कि मूलतः यह एक नाटकीय कथानक था, जिसमें बाद में उपदेश जोड़े गए।




6.2 लेखक और रचनाकाल (एक गतिशील प्रक्रिया)

महाभारत किसी एक लेखक की रचना नहीं है, इसका विकास 1000 वर्षों में हुआ:

  •   सारथी/सूत (Sutas) : मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे। वे युद्धक्षेत्र में जाते थे और मौखिक रूप से कविताएं रचते थे ।
  •   ब्राह्मण (5वीं सदी ई.पू. से) : जब कुरु-पांचाल रजवाड़े बन रहे थे, तब ब्राह्मणों ने इसे लिखना शुरू किया और पुराने मूल्यों की जगह नवीन मानदंड स्थापित किए।
  •   वैष्णव प्रभाव (200 ई.पू. - 200 ई.) : विष्णु आराधना प्रभावी हुई। श्रीकृष्ण (जो महाकाव्य के नायक हैं) को विष्णु का अवतार माना जाने लगा।
  •   मनुस्मृति काल (200 - 400 ई.) : मनुस्मृति से मिलते-जुलते बड़े-बड़े उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए।
  •   विस्तार : इन चरणों में यह ग्रंथ 10,000 श्लोकों से बढ़कर 1 लाख श्लोकों वाला हो गया। साहित्यिक परंपरा इसका श्रेय ऋषि व्यास को देती है ।


6.3 सादृश्यता की खोज: हस्तिनापुर का उत्खनन

  •  उत्खनन : 1951-52 में पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने मेरठ (उ.प्र.) के हस्तिनापुर में खुदाई की।
  •  साक्ष्य :
  •  दूसरा स्तर (12वीं-7वीं सदी ई.पू.) : यहाँ मिट्टी की दीवारें और कच्ची ईंटें मिलीं। सरकंडे की छाप वाले मिट्टी के पलस्तर मिले। यह महाभारत के भव्य महलों के वर्णन से मेल नहीं खाता।
  •  तीसरा स्तर (6वीं-3वीं सदी ई.पू.) : यहाँ पक्की ईंटें, शोषक घट (Soakage jars) और ईंटों के नाले मिले।
  •  निष्कर्ष : महाकाव्य में नगरों का भव्य चित्रण या तो बाद (6वीं सदी ई.पू. के बाद) में जोड़ा गया या यह कवियों की कल्पना थी ।


6.4 द्रौपदी का विवाह (बहुपति प्रथा - Polyandry)

द्रौपदी का पाँच पांडवों से विवाह महाभारत का सबसे चुनौतीपूर्ण प्रसंग है।

  •   लेखकों के स्पष्टीकरण (व्यास द्वारा):
  •   पांडव वास्तव में इंद्र के अवतार थे और द्रौपदी उनकी पत्नी (शची) का रूप थी।
  •   पूर्व जन्म में द्रौपदी ने शिव से 5 बार पति प्राप्ति का वर माँगा था, जो इस जन्म में पूरा हुआ ।
  •   ऐतिहासिक वास्तविकता: इतिहासकार मानते हैं कि बहुपति प्रथा हिमालय क्षेत्र में प्रचलित थी (जो आज भी है) या युद्ध के समय स्त्रियों की कमी के कारण इसे अपनाया गया होगा। ब्राह्मणों को यह प्रथा पसंद नहीं थी, इसलिए उन्होंने इसे वैध ठहराने के लिए 'चमत्कारिक' कारण जोड़े।

6.5 एक गतिशील ग्रंथ (Dynamic Text)

महाभारत केवल संस्कृत तक सीमित नहीं रहा।

  •   शताब्दियों तक इसके अनेक पाठान्तर (Versions) अलग-अलग भाषाओं में लिखे गए।
  •   महाश्वेता देवी की "कुंती ओ निषादी": यह एक आधुनिक बंगाली लघुकथा है। इसमें महाश्वेता देवी ने लाक्षागृह की घटना (जहाँ कुंती ने एक निषादी और उसके 5 पुत्रों को जलाकर पांडवों को बचाया था) को उस निषादी के दृष्टिकोण से लिखा है। कहानी के अंत में निषादी की आत्मा कुंती से पूछती है: "क्या तुम्हें उन छह निर्दोष लोगों की याद नहीं आई?" । यह शोषितों की आवाज़ उठाती है।


📝 स्मरणीय बिंदु और महत्वपूर्ण शब्द (Glossary)

  •   अंतर्विवाह.   : वैवाहिक संबंध समूह के मध्य ही होते हैं (गोत्र, कुल या जाति के अंदर)।
  •   बहिर्विवाह : गोत्र से बाहर विवाह करना।
  •   पितृवंशिकता : वह परंपरा जो पिता से पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है।
  •   स्त्रीधन : वह संपत्ति जो स्त्री को विवाह के समय भेंट के रूप में मिलती है, जिस पर उसका पूर्ण अधिकार होता है।
  •   महासम्मत्त : बौद्ध दर्शन में 'जनता द्वारा चुना गया राजा'।
  •   वणिक : व्यापारियों के लिए प्रयुक्त शब्द (संस्कृत अभिलेखों में)।
  •   चाण्डाल : वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोग, जिन्हें स्पर्श करना भी दूषित माना जाता था।

4 comments:

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  2. Improvement ki jarurat hai

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  3. Anonymous1/12/2026

    Ok improvement kiya jayega apko kay improve kerna hai

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