अध्याय 2 : पतंग
कवि: आलोक धन्वा (Alok Dhanwa)
विस्तृत कवि परिचय (Poet Introduction)
जीवन और पृष्ठभूमि :
➤ जन्म : सन् 1948 ई., मुंगेर (बिहार) में।
➤ प्रसिद्धि : सातवें-आठवें दशक में कवि ने बहुत छोटी अवस्था में अपनी गिनी-चुनी कविताओं से अपार लोकप्रियता अर्जित की।
➤ सक्रियता : वे पिछले दो दशकों से देश के विभिन्न हिस्सों में सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हैं। उन्होंने जमशेदपुर में अध्ययन-मंडलियों का संचालन किया और रंगकर्म तथा साहित्य पर कई विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता रहे।
प्रमुख रचनाएँ (Major Works) :
➤ पहली कविता : 'जनता का आदमी' (1972 में प्रकाशित)।
➤ प्रसिद्ध कविताएँ : 'भागी हुई लड़कियाँ', 'ब्रूनो की बेटियाँ'।
➤ काव्य संग्रह : इनका एकमात्र काव्य संग्रह 'दुनिया रोज़ बनती है' (1998 में प्रकाशित) है।
➤ लेखन शैली : इन्होंने कभी थोक के भाव (Bulk) में लेखन नहीं किया, बल्कि गुणवत्ता पर ध्यान दिया।
प्रमुख सम्मान :
➤ राहुल सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का साहित्य सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, पहल सम्मान।
कविता परिचय : पतंग (Poem Introduction)
➤ स्रोत : यह कविता आलोक धन्वा के एकमात्र संग्रह ('दुनिया रोज़ बनती है') का हिस्सा है।
➤ स्वरूप : यह एक लंबी कविता है, जिसके तीसरे भाग को पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया है।
➤ मूल विषय : इस कविता में बालसुलभ इच्छाओं (Children's Desires) और उमंगों का सुंदर चित्रण है। इसमें 'पतंग' को बच्चों की उमंगों का रंग-बिरंगा सपना माना गया है।
➤ ऋतु वर्णन : कविता में भादो (वर्षा ऋतु) के जाने और शरद ऋतु (उजाला/Autumn) के आने का वर्णन है।
कविता : पतंग (सप्रसंग व्याख्या और विश्लेषण)
पद्यांश 1 : प्रकृति में परिवर्तन
सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को..."
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्तियाँ पाठ्यपुस्तक 'आरोह भाग-2' की कविता 'पतंग' से ली गई हैं। इसके रचयिता आलोक धन्वा हैं।
प्रसंग : यहाँ कवि ने वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन का मानवीकरण (Personification) करते हुए प्रकृति के सुंदर बदलावों का वर्णन किया है।
व्याख्या : कवि कहते हैं कि सबसे तेज़ बौछारें (मूसलाधार बारिश) वाली ऋतु यानी भादो का महीना अब बीत चुका है। अंधेरी रातें खत्म हो गई हैं और अब एक नया, उजला सवेरा हुआ है।
यह सवेरा खरगोश की आँखों जैसा लाल और भूरा है (अर्थात आसमान साफ़ और सूरज लालिमा लिए हुए है)। कवि ने 'शरद ऋतु' का मानवीकरण किया है। वे कहते हैं कि 'शरद' एक उत्साही बालक की तरह अपनी नयी चमकीली साइकिल (साफ़ धूप) को तेज़ चलाते हुए और कई पुलों (ऋतुओं के पड़ाव) को पार करते हुए आया है। वह अपनी साइकिल की घंटी ज़ोर-ज़ोर से बजा रहा है ताकि लोगों का ध्यान खींचे। वह अपने चमकीले इशारों (धूप की चमक) से पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को बुला रहा है कि आओ, अब मौसम साफ़ है।
✦ काव्य-सौंदर्य :
➤ खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा : उपमा अलंकार (Simile) - सवेरे की तुलना खरगोश की आँखों से की गई है।
➤ शरद आया... साइकिल चलाते हुए : मानवीकरण अलंकार (Personification) - ऋतु को बालक के रूप में दिखाया है।
➤ ज़ोर-ज़ोर : पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।
➤बिंब (Imagery) : दृश्य बिंब (लाल सवेरा, चमकीली साइकिल) और श्रव्य बिंब (घंटी बजाते हुए)।
पद्यांश 2 : आकाश और पतंग
"...आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके-
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके-
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके-
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाजुक दुनिया"
प्रसंग : शरद ऋतु द्वारा आसमान को अनुकूल बनाने और पतंग की विशेषताओं का वर्णन।
व्याख्या : शरद ऋतु ने आकाश को मुलायम (स्वच्छ और हवादार) बना दिया है ताकि बच्चों की पतंग ऊपर उठ सके।
कवि पतंग की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि यह दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ है, जो दुनिया के सबसे पतले कागज़ और बाँस की सबसे पतली कमानी (Thin stick) से बनी है।
जब ये पतंगें आसमान में उड़ेंगी, तो बच्चों की खुशी से सीटियों और किलकारियों का शोर शुरू हो जाएगा। आकाश में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें ऐसी लगेंगी मानो तितलियों की नाजुक दुनिया वहाँ बस गई हो।
विशेष बिंदु :
➤ 'सबसे हलकी', 'सबसे पतला' शब्दों का प्रयोग पतंग की कोमलता और बालमन की सुकुमारता को दर्शाता है।
पद्यांश 3 : बच्चों की कोमलता और गति
"जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए"
प्रसंग : बच्चों के शरीर की कोमलता और उनके दौड़ने की तीव्र गति का वर्णन।
व्याख्या : कवि कहते हैं कि बच्चे जन्म से ही अपने साथ कपास (Cotton) लेकर आते हैं। 'कपास' यहाँ कोमलता, नरमी और चोट सहने की क्षमता का प्रतीक है।
बच्चों के पैरों में इतनी चंचलता और ऊर्जा होती है कि ऐसा लगता है मानो पृथ्वी खुद घूमती हुई उनके बेचैन पैरों के पास आ रही है (अर्थात् वे पूरी पृथ्वी नाप लेना चाहते हैं)।
पतंग उड़ाते समय वे बेसुध (मस्त) होकर दौड़ते हैं। कठोर छतें भी उनके लिए कोमल बन जाती हैं (छतों को नरम बनाते हुए), उन्हें कठोरता का अहसास नहीं होता। उनके दौड़ने की पदचाप (आवाज़) से ऐसा लगता है मानो चारों दिशाओं में मृदंग (एक प्रकार का वाद्ययंत्र) बज रहे हों।
काव्य-सौंदर्य :
➤ मृदंग की तरह बजाते हुए : उपमा अलंकार।
➤ पृथ्वी घूमती हुई आती है : मानवीकरण/अतिशयोक्ति अलंकार।
➤ कपास : लाक्षणिक प्रयोग (कोमलता के लिए)।
पद्यांश 4 : रोमांच और संतुलन
"जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर
छतों के खतरनाक किनारों तक-
उस समय गिरने से बचाता है उन्हें
सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे"
प्रसंग : पतंग उड़ाते समय बच्चों के संतुलन और एकाग्रता का वर्णन।
व्याख्या : बच्चे छतों पर इस तरह लहराते हुए चलते हैं जैसे झूले में पेंग ले रहे हों या किसी पेड़ की डाल लचीले वेग से हिल रही हो।
अक्सर वे दौड़ते-दौड़ते छतों के खतरनाक किनारों तक पहुँच जाते हैं। उस वक्त उन्हें कोई और नहीं बचाता, बल्कि उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत (अंदर का लय और उत्साह) उन्हें गिरने से रोकता है।
उस समय ऐसा लगता है कि आकाश में उड़ती पतंगों की धड़कती ऊँचाइयों ने बच्चों को केवल एक धागे के सहारे थाम (पकड़) रखा है।
काव्य-सौंदर्य :
➤ डाल की तरह लचीले वेग : उपमा अलंकार।
➤ धागे के सहारे थाम लेना : पतंग और बच्चे के बीच के गहरे जुड़ाव का वर्णन।
पद्यांश 5 : निडरता और विजय
"पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।"
प्रसंग : भय पर जीत और बढ़ते आत्मविश्वास का वर्णन।
व्याख्या : बच्चे केवल जमीन पर नहीं हैं, मानसिक रूप से वे भी पतंगों के साथ उड़ रहे हैं। वे अपने शरीर के रंध्रों (Rom-chidra/Pores) से निकलने वाले रोमांच के सहारे आकाश छू रहे हैं。
कभी-कभी दुर्भाग्यवश वे छतों के खतरनाक किनारों से गिर जाते हैं, और यदि वे बच जाते हैं, तो उनका डर पूरी तरह खत्म हो जाता है। वे पहले से भी अधिक निडर हो जाते हैं।
वे अगली सुबह सुनहले सूरज (तेज और सफलता का प्रतीक) के सामने सीना तानकर आते हैं। अब उनका उत्साह इतना बढ़ जाता है कि पृथ्वी और भी तेज़ गति से घूमती हुई उनके बेचैन पैरों के पास आती है।
महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Important Questions)
प्रश्न 1 : 'सबसे तेज़ बौछारें गयीं, भादो गया' के बाद प्रकृति में जो परिवर्तन कवि ने दिखाया है, उसका वर्णन करें।
उत्तर : भादो (वर्षा ऋतु) के जाने के बाद मौसम साफ़ हो गया है।
➤ खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा हुआ है।
➤ शरद ऋतु का आगमन हुआ है जो उत्साह से भरा है।
➤ धूप चमकीली हो गई है।
➤ आकाश मुलायम और स्वच्छ हो गया है ताकि पतंगें उड़ सकें।
प्रश्न 2 : कवि ने 'कपास' का प्रयोग किसके लिए और क्यों किया है?
उत्तर : कवि ने 'कपास' (Cotton) का प्रयोग बच्चों की कोमलता और उनकी शारीरिक लोच (Flexibility) के लिए किया है। जिस प्रकार कपास नरम और चोट-सहिष्णु होती है, वैसे ही बच्चे भी कोमल होते हैं और गिरकर भी जल्दी सँभल जाते हैं।
प्रश्न 3 : "दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए" का क्या तात्पर्य है?
उत्तर : इसका तात्पर्य है कि जब बच्चों का झुंड छतों पर बेसुध होकर दौड़ता है, तो उनके पैरों की 'धप-धप' आवाज़ चारों दिशाओं में गूँजती है। यह आवाज़ किसी शोरगुल की तरह नहीं, बल्कि मृदंग के मीठे संगीत की तरह प्रतीत होती है, जो वातावरण में उत्साह भर देती है।
प्रश्न 4 : 'पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं' - आशय स्पष्ट करें।
उत्तर : इसका अर्थ है कि बच्चे शारीरिक रूप से तो छत पर हैं, लेकिन मानसिक रूप से वे पतंग के साथ आकाश में हैं। उनका पूरा ध्यान और आत्मा उस उड़ती हुई पतंग में है। वे अपने रोमांच और कल्पना के सहारे आकाश की ऊँचाइयों को छू रहे हैं।
प्रश्न 5 : "सुनहले सूरज के सामने आते हैं" का भाव क्या है?
उत्तर : गिरने और बचने के बाद बच्चे निडर हो जाते हैं। 'सुनहला सूरज' यहाँ उज्वल भविष्य, नई उम्मीद और भयमुक्त जीवन का प्रतीक है। बच्चे डरने के बजाय चुनौतियों (सूरज) का सामना और अधिक साहस के साथ करते हैं।
काव्य-सौंदर्य और व्याकरण (Grammar & Aesthetics)
✦ बिंब योजना (Imagery): यह कविता बिंबों (Images) से समृद्ध है।
➤ दृश्य बिंब (Visual): लाल सवेरा, चमकीली साइकिल, तितलियों की नाजुक दुनिया।
➤ श्रव्य बिंब (Auditory): घंटी बजाते हुए, सीटियों, किलकारियों, मृदंग।
➤ स्पर्श बिंब (Tactile): आकाश को मुलायम बनाते हुए, छतों को नरम बनाते हुए।
✦ भाषा : साहित्यिक खड़ी बोली हिंदी।
➤ गुण : माधुर्य और ओज गुण का मिश्रण (बाल सुलभ चेष्टाओं में माधुर्य, साइकिल चलाने/दौड़ने में ओज)।
➤ मुक्त छंद : कविता में तुकांतता (Rhyme) का आग्रह नहीं है, यह मुक्त छंद में लिखी गई है।
%20(1).png)
No comments:
Post a Comment