अध्याय 8 : रुबाइयाँ
शायर : फ़िराक गोरखपुरी (Firaq Gorakhpuri)
विस्तृत कवि/शायर परिचय
जीवन और व्यक्तित्व :
➤ मूल नाम : रघुपति सहाय 'फ़िराक'।
➤ जन्म: 28 अगस्त, सन् 1896, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में।
➤ शिक्षा: अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी में। 1917 में डिप्टी कलेक्टर पद पर चयनित हुए, लेकिन स्वराज आंदोलन (गांधी जी का प्रभाव) के कारण 1918 में पद त्याग दिया। 1920 में स्वाधीनता आंदोलन में जेल भी गए। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के अध्यापक रहे।
➤ निधन : सन् 1983 में।
साहित्यिक विशेषताएँ:
➤ परंपरा का भंजन: उर्दू शायरी की पुरानी रवायतों (रुमानियत और रहस्य) को तोड़कर उन्होंने शायरी को लोकजीवन और प्रकृति से जोड़ा।
➤ भाषा शैली : उनकी शायरी में हिंदी, उर्दू और लोकभाषा का अनूठा गठबंधन है। वे 'बातचीत की शैली' (संवाद) का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में एक घरेलू रूप और 'सूरदास' के वात्सल्य वर्णन जैसी सादगी है।
➤ दर्शन : उनका मानना था कि "दिव्यता भौतिकता से अलग नहीं है।"
प्रमुख कृतियाँ और सम्मान :
➤ कृतियाँ : गुले-नग्मा, बज़्मे ज़िंदगी, रंगे-शायरी, उर्दू गज़लगोई।
➤ सम्मान : साहित्य अकादेमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड।
विधा परिचय : रुबाई (Rubai)
➤ परिभाषा: रुबाई उर्दू और फ़ारसी का एक छंद या लेखन शैली है।
➤ संरचना: इसमें चार पंक्तियाँ होती हैं। इसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक (Rhyme/काफ़िया) मिलता है, जबकि तीसरी पंक्ति स्वच्छंद होती है।
'रुबाइयाँ' की विस्तृत सप्रसंग व्याख्या (Detailed Explanation)
इस पाठ में पाँच रुबाइयाँ दी गई हैं, जिनमें माँ-बेटे के प्रेम (वात्सल्य रस) और त्योहारों (दीवाली, रक्षाबंधन) का सुंदर चित्रण है।
रुबाई 1: माँ और बच्चे का स्नेह
आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूँज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी
✦ शब्दार्थ :
➤ चाँद का टुकड़ा: बहुत सुंदर बच्चा (बेटा)।
➤ गोद-भरी: माँ (जिसकी गोद बच्चे से भरी है)।
➤ लोका देना: हवा में उछालना (प्यार करने की क्रिया)।
व्याख्या : एक माँ अपने घर के आँगन में अपने बेटे को गोद में लेकर खड़ी है। वह बेटा उसके लिए 'चाँद के टुकड़े' जैसा सुंदर और प्यारा है।
माँ उसे प्यार से अपने हाथों पर झुलाती है। बीच-बीच में वह उसे हवा में उछाल देती है (लोका देती है)। जैसे ही माँ बच्चे को हवा में उछालती है, बच्चा खुश हो जाता है और उसकी खिलखिलाती हुई हँसी से पूरा घर गूँज उठता है।
➤ भाव : यहाँ माँ का निश्छल प्रेम और बच्चे की मासूम खुशी दिखाई गई है।
रुबाई 2: नहलाना और तैयार करना
नहला के छलके-छलके निर्मल जल से
उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके
किस प्यार से देखता है बच्चा मुँह को
जब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े
✦ शब्दार्थ :
➤ निर्मल जल : साफ़ पानी।
➤ गेसुओं : बाल (Hair)।
➤ पिन्हाती : पहनाती है।
व्याख्या : माँ बच्चे को साफ़ पानी (निर्मल जल) से नहलाती है। नहलाने के बाद वह बच्चे के उलझे हुए बालों (गेसुओं) में प्यार से कंघी करती है।
कपड़े पहनाते समय माँ बच्चे को अपने घुटनों में पकड़कर खड़ा करती है या बिठाती है। उस समय बच्चा अपनी माँ के चेहरे को बड़े प्यार और स्नेह से निहारता (देखता) है।
➤ भाव : यह दृश्य अत्यंत सजीव है। माँ और बच्चे के बीच का मूक संवाद (Silent communication) यहाँ झलकता है।
रुबाई 3: दीवाली का पर्व
दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए
✦ शब्दार्थ :
➤ पुते : सफेदी/रंग-रोगन किए हुए।
➤ लावे : खील-बताशे (प्रसाद)।
➤ रूपवती : सुंदर स्त्री (माँ)।
➤ नर्म दमक : कोमल चमक।
➤ घरौंदा : मिट्टी का छोटा घर (जो बच्चे बनाते हैं)।
व्याख्या : दीवाली की शाम है। घर पुताई करके सजाए गए हैं। पूजा के लिए चीनी के खिलौने (मिठाई) और लावे जगमगा रहे हैं।
सुंदर मुख वाली माँ (रूपवती) के चेहरे पर एक कोमल चमक (नर्म दमक) है (दीयों की रोशनी और खुशी के कारण)।
वह माँ अपने बच्चे के छोटे से मिट्टी के घर (घरौंदे) में प्यार से दीये जला रही है ताकि बच्चे की दुनिया भी रोशन हो सके।
➤ भाव : यहाँ त्योहार की खुशी और बाल-सुलभ इच्छाओं की पूर्ति का वर्णन है।
रुबाई 4: बाल-हठ और दर्पण (Mirror)
आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है
✦ शब्दार्थ :
➤ ठुनक रहा : मचल रहा है (हल्का रोना)।
➤ ज़िदयाया : ज़िद कर रहा है।
➤ हई : है ही (बच्चा तो बच्चा ही है)।
➤ व्याख्या : बच्चा आँगन में ज़िद करके ठुनक रहा (मचल रहा) है। उसकी ज़िद बहुत अनोखी है - उसे आकाश का असली चाँद चाहिए, वह उसे लेने के लिए ललचाया है।
माँ अपनी सूझ-बूझ से काम लेती है। वह बच्चे के हाथ में एक दर्पण (आईना) दे देती है और कहती है - "बेटा, देख! आईने में चाँद उतर आया है।" माँ बच्चे को बहला देती है कि आईने में जो चाँद दिख रहा है, वही असली चाँद है जो तुम्हारे पास आ गया है।
➤ संदर्भ : यह प्रसंग सूरदास के पद "मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों" की याद दिलाता है।
रुबाई 5: रक्षाबंधन (भाई-बहन का प्रेम)
रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हलकी हलकी
बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधती चमकती राखी
➤ शब्दार्थ :
➤ रस की पुतली : मीठी और प्यारी बच्ची (बहन)।
➤ घटा : बादल।
➤ लच्छे : राखी के चमकीले धागे।
व्याख्या : रक्षाबंधन की सुबह है। प्यारी बच्ची (रस की पुतली) खुश है। सावन का महीना है, इसलिए आकाश में हल्की-हल्की घटाएँ (काले बादल) छाई हुई हैं।
राखी के चमकदार लच्छे (धागे) बादलों में चमकने वाली बिजली की तरह चमक रहे हैं। (यहाँ सावन के बादलों और राखी के धागों का संबंध जोड़ा गया है)। बहन अपने भाई की कलाई पर वह चमकती हुई राखी बाँधती है। यह एक पवित्र और मीठा बंधन है।
काव्य-सौंदर्य और शिल्प (Aesthetics & Craft)
भाषा :
➤ हिंदी-उर्दू मिश्रित (हिंदुस्तानी): कवि ने 'आँगन', 'दर्पण', 'राखी' (हिंदी) के साथ 'गेसुओं', 'आब', 'रुबाई' (उर्दू) शब्दों का प्रयोग किया है।
➤ देशज/लोकभाषा: 'लोका देना', 'घुटिनयों में', 'पिन्हाती' जैसे शब्द कविता को घरेलू और आत्मीय बनाते हैं।
बिंब योजना (Imagery) :
➤ दृश्य बिंब (Visual) : चाँद का टुकड़ा, निर्मल जल, उलझे गेसू, जगमगाते लावे, बिजली जैसे लच्छे।
➤ श्रव्य बिंब (Auditory) : खिलखिलाते बच्चे की हँसी।
अलंकार (Figures of Speech) :
➤ रूपक : 'चाँद का टुकड़ा' (बच्चे के लिए), 'रस की पुतली' (बहन के लिए)।
➤ उपमा : 'बिजली की तरह चमक रहे लच्छे'।
➤ पुनरुक्ति प्रकाश : 'रह-रह', 'छलके-छलके', 'हलकी-हलकी'।
✦ शैली : वात्सल्य और घरेलू जीवन के चित्र अत्यंत सजीव हैं। कवि ने 'सूरदास' की परंपरा को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया है।
महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Important Questions)
प्रश्न 1 : "खुद का परदा खोलने" से क्या आशय है? (गज़ल के संदर्भ में)
उत्तर : (यह प्रश्न गज़ल वाले भाग का है, जो इसी अध्याय का हिस्सा है)। "खुद का परदा खोलने" का अर्थ है - अपनी ही बुराई करना या अपनी कमजोरियाँ उजागर करना। शायर कहता है कि जो लोग मेरी निंदा करते हैं, वे असल में मेरा परदा नहीं खोल रहे, बल्कि अपनी ही ईर्ष्या और संकीर्ण मानसिकता का परिचय देकर अपना परदा खोल रहे हैं (अपनी असलियत दिखा रहे हैं)।
प्रश्न 2 : शायर ने राखी के लच्छे को बिजली की चमक की तरह क्यों कहा है?
उत्तर :
➤ चमक : राखी के धागे सुनहरे और चमकदार होते हैं, जो बिजली की तरह चमकते हैं।
➤ सावन का संबंध : रक्षाबंधन सावन के महीने में आता है जब आकाश में बादल छाए होते हैं और बिजली चमकती है। शायर ने राखी के लच्छों का संबंध सावन की बिजली से जोड़कर एक सुंदर प्राकृतिक बिंब रचा है।
प्रश्न 3 : बच्चे की ज़िद और माँ के उपाय का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर : बच्चा आँगन में ज़िद करके रो रहा है कि उसे आसमान वाला असली चाँद चाहिए। माँ उसे बहलाने के लिए एक मनोवैज्ञानिक तरीका अपनाती है। वह बच्चे के हाथ में एक आईना (दर्पण) पकड़ा देती है और कहती है, "देखो, चाँद आसमान से उतरकर इस आईने में आ गया है।" बच्चा प्रतिबिंब देखकर खुश हो जाता है और उसकी ज़िद पूरी हो जाती है।
प्रश्न 4 : "रस की पुतली" किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर : "रस की पुतली" बहन (नन्ही बच्ची) को कहा गया है। इसका अर्थ है - रस (प्रेम/मिठास) से भरी हुई। राखी के दिन बहन के मन में भाई के लिए प्रेम और उमंग होती है, इसलिए वह आनंद और मिठास की साकार मूर्ति लगती है।
प्रश्न 5 : "गूँज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी" - यह किस क्रिया के कारण होता है?
उत्तर : जब माँ बच्चे को प्यार से अपनी गोद में लेकर हवा में उछालती है (जिसे देशज भाषा में 'लोका देना' कहते हैं), तब बच्चा रोमांचित होकर खिलखिलाकर हँस पड़ता है।
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