अध्याय 9 : छोटा मेरा खेत / बगुलों के पंख
कवि: उमाशंकर जोशी (Umashankar Joshi)
विस्तृत कवि परिचय (Poet Introduction)
जीवन और व्यक्तित्व :
➤ जन्म : सन् 1911, गुजरात में।
➤ निधन : सन् 1988 में।
➤ पहचान : उमाशंकर जोशी बीसवीं सदी की गुजराती कविता और साहित्य को नई दिशा देने वाले प्रमुख कवि हैं। उन्होंने गुजराती कविता को प्रकृति और आम जिंदगी के अनुभवों से जोड़ा。
➤ स्वतंत्रता संग्राम : वे भारत की आज़ादी की लड़ाई से गहरे जुड़े रहे और जेल भी गए。
➤ अनुवादक: उन्होंने कालिदास के 'अभिज्ञान शाकुंतलम्' और भवभूति के 'उत्तररामचरित' का गुजराती में अनुवाद किया。
प्रमुख रचनाएँ (Major Works) :
➤ काव्य संग्रह : विश्व शांति, गंगोत्री, निशीथ, प्राचीना, आतिथ्य, वसंत वर्षा, महाप्रस्थान।
➤ एकांकी : अभिज्ञा।
➤ कहानी : सापनाभारा, शहीद।
➤ उपन्यास : श्रावणी मेणो, विसामो।
➤ निबंध : पारकांजण्या।
➤ संपादन : गोष्ठी, उघाड़ीबारी, क्लांतकवि, म्हारासॉनेट, स्वप्नप्रयाण, और 1947 से 'संस्कृति' पत्रिका का संपादन。
कविता: छोटा मेरा खेत (Chhota Mera Khet)
मूल विषय :
यह कविता 'खेती' के रूपक (Metaphor) के माध्यम से कवि-कर्म (रचना प्रक्रिया) को समझाती है। कवि ने कागज के पन्ने को खेत मानकर सृजन की प्रक्रिया का वर्णन किया है。
पद्यांश 1 : खेत और बीज
छोटा मेरा खेत चौकोना
कागज़ का एक पन्ना,
कोई अंधड़ कहीं से आया
क्षण का बीज वहाँ बोया गया।
व्याख्या : कवि कहते हैं कि मेरा खेत चौकोर है, जो असल में कागज़ का एक पन्ना है। (जैसे खेत जमीन का टुकड़ा होता है, वैसे ही कवि के लिए पन्ना उसकी कर्मभूमि है)।
अचानक कहीं से कोई अंधड़ (भावनात्मक आँधी/विचारों का तूफ़ान) आया। उस तूफ़ान के कारण कवि के मन में किसी क्षण एक बीज (रचना का मूल विचार/Theme) बोया गया।
तुलना :
➤ खेत = कागज़ का पन्ना
➤ अंधड़ = प्रेरणा या भावों का आवेग
➤ बीज = विचार या शब्द
पद्यांश 2 : सृजन प्रक्रिया (अंकुर फूटना)
कल्पना के रसायनों को पी
बीज गल गया निःशेष;
शब्द के अंकुर फूटे,
पल्लव-पुष्पों से नमित हुआ विशेष।
व्याख्या : जैसे खेत में बीज खाद-पानी (रसायन) पीकर गल जाता है और तभी उसमें से अंकुर निकलता है, ठीक वैसे ही रचना का बीज (विचार) कवि की कल्पना रूपी रसायनों को पीकर पूरी तरह गल जाता है (अहंकार मिट जाता है)।
जब विचार और कल्पना एक हो जाते हैं, तब शब्दों के अंकुर फूटते हैं। धीरे-धीरे वह रचना भावों और शब्दों के पल्लव-पुष्पों (पत्ते और फूल) से लदकर झुक जाती है (नमित हुआ विशेष), यानी रचना पूर्णता की ओर बढ़ती है।
पद्यांश 3 : रस का अक्षय पात्र (अमर साहित्य)
झूमने लगे फल,
रस अलौकिक,
अमृत धाराएँ फूटतीं
रोपाई क्षण की,
कटाई अनंतता की
लुटते रहने से जरा भी नहीं कम होती।
रस का अक्षय पात्र सदा का
छोटा मेरा खेत चौकोना।
व्याख्या : जब रचना पूरी हो जाती है, तो उसमें फल झूमने लगते हैं। इन फलों में अलौकिक रस (आनंद) भरा होता है, जिससे अमृत जैसी धाराएँ फूटती हैं।
विरोधाभास : खेती और कविता में एक बड़ा अंतर है। खेत में बीज बोने और फसल काटने का समय निश्चित होता है। लेकिन कविता की रोपाई तो क्षण भर की थी (एक पल में विचार आया), लेकिन उसकी कटाई अनंत काल तक चलती है।
उत्तम साहित्य कालजयी होता है। इसे जितना भी पढ़ा जाए (लूटा जाए), इसका रस जरा भी कम नहीं होता।
इसलिए कवि कहते हैं कि मेरा यह छोटा चौकोना खेत (कागज़) रस का अक्षय पात्र (कभी खाली न होने वाला बर्तन) है।
कविता: बगुलों के पंख (Bagulo Ke Pankh)
मूल विषय :
यह एक सौंदर्य-प्रधान कविता है। इसमें काले बादलों के बीच उड़ते सफ़ेद बगुलों के सौंदर्य का चित्रात्मक वर्णन है। कवि इस सौंदर्य में इतना डूब जाता है कि उसे सब कुछ भूल जाता है。
पद्यांश : सौंदर्य का जादू
नभ में पाँती-बँधे बगुलों के पंख,
चुराए लिए जातीं वे मेरी आँखें।
कजरारे बादलों की छाई नभ छाया,
तैरती साँझ की सतेज श्वेत काया।
व्याख्या : कवि आकाश में देखता है कि बगुलों की पंक्ति अपने सफ़ेद पंख फैलाकर उड़ रही है। यह दृश्य इतना सुंदर है कि वह कवि की आँखें चुराए लिए जा रही है (कवि की नज़र उस दृश्य से हट नहीं रही)।
आकाश में कजरारे (काले) बादल छाए हुए हैं। उन काले बादलों की पृष्ठभूमि पर उड़ते हुए सफ़ेद बगुले ऐसे लगते हैं मानो साँझ (संध्या) की सतेज श्वेत काया (चमकती हुई सफ़ेद शरीर) तैर रही हो।
पद्यांश
हौले हौले जाती मुझे बाँध निज माया से।
उसे कोई तनिक रोक रक्खो।
वह तो चुराए लिए जाती मेरी आँखें
नभ में पाँती-बँधी बगुलों की पाँखें।
व्याख्या : यह सुंदर दृश्य धीरे-धीरे (हौले-हौले) कवि को अपने मायाजाल (जादू) में बाँध रहा है। कवि उस सौंदर्य में खोता जा रहा है,
कवि गुहार लगाता है - "उसे कोई तनिक रोक रक्खो"। वह चाहता है कि यह पल यहीं थम जाए ताकि वह इस सौंदर्य को जी भर कर देख सके। आकाश में पंक्तिबद्ध उड़ते बगुलों के पंख कवि की आँखों को (ध्यान को) चुराकर ले जा रहे है ।
काव्य-सौंदर्य और शिल्प (Literary Devices)
रूपक (Metaphor) : 'छोटा मेरा खेत' पूरी कविता ही एक सांगरूपक है।
➤ खेत = कागज़
➤ बीज = विचार
➤ रसायन = कल्पना
➤ अंकुर = शब्द
➤ फल = कृति/साहित्यिक रस
बिंब (Imagery) :
➤ दृश्य बिंब : चौकोना खेत, पल्लव-पुष्प, कजरारे बादल, तैरती साँझ, बगुलों की पाँखें。
➤ भाषा : खड़ी बोली हिंदी (मूलतः गुजराती से अनुवादित)। भाषा सरल और चित्रात्मक है।
➤ विरोधाभास : "रोपाई क्षण की, कटाई अनंतता की" - एक क्षण का कर्म अनंत काल तक फल देता है।
➤ विशेषण : 'कजरारे बादल', 'सतेज श्वेत काया'।
महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Important Questions)
प्रश्न 1: छोटे चौकोने खेत को कागज़ का पन्ना कहने में क्या अर्थ निहित है?
उत्तर : कवि ने 'कागज़ के पन्ने' की तुलना 'छोटे चौकोने खेत' से की है क्योंकि:
➤ आकार : दोनों का आकार चौकोर होता है।
➤ सृजन भूमि : जैसे खेत में अनाज पैदा होता है, वैसे ही कागज़ पर कविता (साहित्य) पैदा होती है।
➤ प्रक्रिया : खेत में बीज, खाद, पानी चाहिए; कागज़ पर विचार, कल्पना और शब्द चाहिए। यह उपमा कवि-कर्म को एक श्रमसाध्य और सृजनात्मक कार्य के रूप में स्थापित करती है。
प्रश्न 2 : "रस का अक्षय पात्र" से कवि का क्या आशय है?
उत्तर : 'अक्षय पात्र' वह बर्तन है जो कभी खाली नहीं होता। कवि 'साहित्य' को रस का अक्षय पात्र कहते हैं क्योंकि:
➤ खेत का अनाज (अन्न) एक बार खाने पर खत्म हो जाता है।
➤ लेकिन कविता का रस (आनंद) अनंत काल तक बना रहता है। इसे जितनी बार पढ़ा जाए, हर बार नया आनंद मिलता है। यह पीढ़ियों तक चलता रहता है (कटाई अनंतता की)。
प्रश्न 3 : 'बगुलों के पंख' कविता में 'सतेज श्वेत काया' किसे कहा गया है?
उत्तर : 'सतेज श्वेत काया' (चमकती हुई सफ़ेद शरीर) साँझ (संध्या) के लिए प्रयुक्त हुआ है जो बगुलों के रूप में आकाश में तैर रही है। काले बादलों के बीच सफ़ेद बगुलों की पंक्ति ऐसी लगती है मानो शाम ने कोई श्वेत रूप धारण कर लिया हो और वह तैर रही हो。
प्रश्न 4 : रचना के संदर्भ में 'अंधड़' और 'बीज' क्या हैं?
उत्तर :
➤ अंधड़ : यह किसी भावनात्मक आवेग (Emotional storm) या प्रेरणा का प्रतीक है जो अचानक आता है और कवि को झकझोर देता है।
➤ बीज : यह वह मूल विचार (Idea/Theme) है जो उस अंधड़ के दौरान कवि के मन (खेत) में बो दिया जाता है, जिससे बाद में कविता का जन्म होता है。
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