यहाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी और उनकी कविता 'सरोज स्मृति' के संपूर्ण और विस्तृत नोट्स दिए गए हैं।

भाग 1: कवि परिचय - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

निराला जी हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े स्तंभ हैं। उनके जीवन और साहित्य से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

 * जन्म और मूल स्थान: निराला जी का जन्म सन् 1898 में बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल गाँव में हुआ था। लेकिन उनका पुश्तैनी गाँव (पितृग्राम) उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का गढ़कोला है।

 * बचपन और शिक्षा: उनके बचपन का नाम सूर्य कुमार था। बहुत छोटी उम्र में ही उनकी माँ का निधन हो गया था। उनकी स्कूली शिक्षा केवल नवीं कक्षा तक ही हो पाई थी।

 * साहित्य की ओर झुकाव: निराला जी की साहित्य और संगीत में रुचि उनकी पत्नी की प्रेरणा से पैदा हुई थी।

 * दुखों से भरा जीवन: उनका जीवन त्रासदियों से भरा था। सन् 1918 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया। इसके बाद पिता, चाचा और चचेरे भाई एक-एक करके दुनिया से चले गए। सबसे बड़ा दुख तब आया जब उनकी युवा पुत्री सरोज की भी मृत्यु हो गई, जिसने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया।

 * साहित्यिक यात्रा: सन् 1916 में उन्होंने अपनी मशहूर कविता 'जूही की कली' लिखी, जिसने उन्हें बहुत प्रसिद्धि दिलाई। उन्हें 'मुक्त छंद' (free verse) का प्रवर्तक माना जाता है। वे 1922 में 'समन्वय' पत्रिका और 1923-24 में 'मतवाला' के संपादक मंडल से जुड़े।

 * स्वभाव: वे बहुत स्वाभिमानी थे, इसी कारण वे कहीं एक जगह टिककर नौकरी नहीं कर पाए और जीवन भर पैसों और पारिवारिक कष्टों से जूझते रहे। 1961 में इलाहाबाद में उनका देहांत हुआ।

 * प्रमुख रचनाएँ: परिमल, गीतिका, अनामिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, राम की शक्ति पूजा, तुलसीदास आदि उनके प्रमुख काव्य हैं। उन्होंने 'बिल्लेसुर बकरिहा' जैसा चर्चित उपन्यास भी लिखा।

भाग 2: 'सरोज स्मृति' कविता का सार और विस्तृत व्याख्या

'सरोज स्मृति' एक शोकगीत (Elegy) है। यह निराला जी द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की याद में लिखा गया एक पिता का रुला देने वाला विलाप है।

कविता का मुख्य भाव:

इस कविता में निराला जी को अपनी बेटी के रूप में अपनी स्वर्गीय पत्नी की झलक दिखाई देती है। यह सिर्फ एक बेटी के लिए दुख नहीं है, बल्कि एक ऐसे भाग्यहीन पिता का संघर्ष है जो समाज से लड़ता रहा और अपनी बेटी के लिए बहुत कुछ न कर पाने के अपराधबोध (अकर्मण्यता बोध) से भी ग्रसित है।

महत्वपूर्ण पंक्तियों की व्याख्या:

 * विवाह का दृश्य: "देखा विवाह आमूल नवल... काँपा अधरों पर थर-थर-थर।"

   * व्याख्या: कवि कहते हैं कि बेटी सरोज का विवाह एकदम अनोखा और नया था। जब उस पर कलश का पवित्र जल पड़ा, तो वह मंद-मंद मुस्कुरा रही थी और उसके होंठ काँप रहे थे। उसके झुके हुए नैनों में एक अनोखी चमक थी और वह बिना कुछ बोले ही अपने श्रृंगार से बहुत कुछ कह रही थी।

 * पत्नी की याद: "रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना मही।"

   * व्याख्या: बेटी को दुल्हन के रूप में देखकर कवि को लगता है कि सरोज ने रति (कामदेव की अत्यंत सुंदर पत्नी) जैसा रूप धारण कर लिया है। उन्हें महसूस होता है कि जैसे आकाश (स्वर्गीया पत्नी) धरती (पुत्री) का रूप लेकर नीचे उतर आया हो।

 * सादगी भरा विवाह: "हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन... नव जीवन के स्वर पर उतरा।"

   * व्याख्या: यह विवाह बिना किसी शोर-शराबे के हुआ। न कोई रिश्तेदार बुलाए गए, न कोई आमंत्रण कार्ड भेजा गया। घर में कोई विवाह के गीत नहीं गाए गए, बस एक मौन संगीत के साथ सरोज ने नए जीवन में प्रवेश किया।

 * नानी का घर और अंत: "वह लता वहीं की, जहाँ कली... ली, मूँदे दृग वर महामरण!"

   * व्याख्या: सरोज अपनी नानी के घर गई, जहाँ उसे अपने मामा-मामी का अपार प्यार मिला। कवि कहते हैं कि सरोज रूपी कली उसी ननिहाल में खिली और पली-बढ़ी, और अंत में उसी ननिहाल की गोद में उसने अपने प्राण भी त्यागे।

 * पिता का दर्द और तर्पण: "मुझ भाग्यहीन की तू संबल... कर, करता मैं तेरा तर्पण!"

   * व्याख्या: कवि खुद को भाग्यहीन कहते हैं और मानते हैं कि बेटी ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा थी। वे कहते हैं- "दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"। अंत में, वे अपने सारे अच्छे कर्मों को अपनी बेटी को अर्पित करके उसका तर्पण (श्रद्धांजलि) करते हैं।

भाग 3: पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास (विस्तृत उत्तर)

प्रश्न 1. सरोज के नव-वधू रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर: नव-वधू के रूप में सरोज बहुत सुंदर लग रही थी। उसके ऊपर शुभ कलश का जल डाला गया था। वह मंद-मंद हँस रही थी और उसके होंठ काँप रहे थे। उसकी झुकी हुई आँखों से एक खास चमक उतर रही थी। अपने इस रूप में वह अपनी माँ के समान ही सुंदर दिखाई दे रही थी।

प्रश्न 2. कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी की याद क्यों आई?

उत्तर: सरोज जब दुल्हन के वेश में सजी हुई थी, तो उसके रूप और रंग में निराला जी को अपनी स्वर्गीया पत्नी का रूप दिखाई पड़ने लगा। इसी समानता के कारण उन्हें अपनी पत्नी की याद आ गई।

प्रश्न 3. 'आकाश बदल कर बना मही' में 'आकाश' और 'मही' शब्द किनकी ओर संकेत करते हैं?

उत्तर: इस पंक्ति में 'आकाश' शब्द कवि की स्वर्गीया पत्नी की ओर संकेत करता है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। वहीं, 'मही' (पृथ्वी) शब्द उनकी साकार पुत्री सरोज की ओर संकेत करता है, जिसमें कवि को अपनी पत्नी की छवि धरती पर उतरती हुई महसूस होती है।

प्रश्न 4. सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था?

उत्तर: सरोज का विवाह बहुत ही सादगी से संपन्न हुआ था। इसमें किसी भी रिश्तेदार या आत्मीय स्वजन को नहीं बुलाया गया था और न ही कोई निमंत्रण पत्र भेजा गया था। अन्य विवाहों की तरह इसमें रात-दिन विवाह के गीत नहीं गाए गए, बल्कि यह एक मौन संगीत के वातावरण में पूरा हुआ।

प्रश्न 5. 'वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली' पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उ‌द्घाटित किया गया है?

उत्तर: इस पंक्ति के द्वारा सरोज के ननिहाल से जुड़े प्रसंग को उद्घाटित किया गया है। कवि कहते हैं कि सरोज की माँ भी उसी घर की लता थी, और सरोज रूपी कली भी अपने ननिहाल में ही मामा-मामी के प्यार से खिली और पली-बढ़ी। अंत में उसने उसी गोद में अपने प्राण भी त्यागे।

प्रश्न 6. 'मुझ भाग्यहीन की तू संबल' निराला की यह पंक्ति क्या 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे कार्यक्रम की माँग करती है।

उत्तर: हाँ, यह पंक्ति इस बात को मजबूती से साबित करती है कि बेटियाँ किसी भी पिता का सबसे बड़ा सहारा (संबल) होती हैं। निराला जी के जीवन के सारे दुखों के बीच सरोज ही उनका एकमात्र सहारा थी। आज के समय में 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' कार्यक्रम भी यही संदेश देता है कि बेटियों को बोझ न समझकर उन्हें आगे बढ़ाना चाहिए क्योंकि वे माता-पिता का सच्चा संबल होती हैं।

प्रश्न 7. निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए-

 * (क) नत नयनों से आलोक उतर: इसका अर्थ है कि नव-वधू सरोज के झुके हुए नेत्रों से एक विशेष प्रकार का प्रकाश (आलोक) या चमक छलक रही थी।

 * (ख) शृंगार रहा जो निराकार: इसका भाव है कि कवि की कल्पनाओं का जो श्रृंगार अब तक बिना किसी आकार के (निराकार) था, वह आज सरोज के सौंदर्य के रूप में साकार हो गया था।

 * (ग) पर पाठ अन्य यह, अन्य कला: कवि ने अपनी बेटी को शकुंतला कहकर याद किया, लेकिन सरोज का जीवन शकुंतला से अलग था। शकुंतला की माँ उसे छोड़कर चली गई थी, जबकि सरोज की माँ का निधन हो गया था।

 * (घ) यदि धर्म, रहे नत सदा माथ: कवि कहते हैं कि यदि वे जीवन में धर्म के मार्ग पर चल रहे हैं, तो उनका मस्तक हमेशा श्रद्धा से झुका रहे, चाहे उनके रास्ते में कितनी भी विपत्तियाँ क्यों न आएं।

भाग 4: महत्वपूर्ण शब्दार्थ

 * आमूल: पूरी तरह या जड़ तक

 * उर: हृदय या मन

 * मही: पृथ्वी

 * जलद: बादल

 * संबल: सहारा

 * तर्पण: देवताओं, ऋषियों और पितरों को जल देने की क्रिया (यहाँ बेटी को श्रद्धांजलि देना)

 * शतदल: कमल

 * रति-रूप: कामदेव की पत्नी के रूप जैसी, अत्यंत सुंदर

क्या आप चाहते हैं कि मैं इस अध्याय के कुछ अतिरिक्त परीक्षा-उपयोगी (extra important) प्रश्न भी 

तैयार करूँ, या फिर हम किसी दूसरे विषय/पाठ की ओर बढ़ें?

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