Class 12 Hindi Chapter 7: Tulsidas (Kavitavali & Lakshman Murcha) | Summary & Explanation

 अध्याय 7 : तुलसीदास (Tulsidas)


(1. कवितावली: उत्तर कांड से | 2. लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप)


विस्तृत कवि परिचय (Poet Introduction)


जीवन और व्यक्तित्व :

➤  जन्म : सन् 1532, उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजापुर गाँव में।

➤  निधन : सन् 1623, काशी में।

➤  भक्ति और दर्शन : तुलसीदास रामभक्ति शाखा के सर्वोपरि कवि हैं। उनकी भक्ति लोकोन्मुख (जनता की भलाई चाहने वाली) है। वे 'लोकमंगल' के कवि हैं।

➤  समन्वयवादी : तुलसीदास समाज में विभिन्न मतों और विचारों में 'समन्वय' (तालमेल) स्थापित करने वाले कवि हैं।

➤  भाषा : यद्यपि वे संस्कृत के विद्वान थे, फिर भी उन्होंने लोकभाषा (अवधी और ब्रजभाषा) को चुना। 'रामचरितमानस' अवधी में और 'कवितावली', 'विनयपत्रिका' ब्रजभाषा में रचित हैं।


प्रमुख रचनाएँ :

➤  महाकाव्य : रामचरितमानस (विश्वप्रसिद्ध)।

➤  अन्य : विनयपत्रिका, गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली, दोहावली, कवितावली, रामाज्ञा-प्रश्न।


साहित्यिक विशेषताएँ :

➤  उपमा और रूपक : कालिदास 'उपमा' के लिए प्रसिद्ध हैं, तो तुलसीदास 'सांगरूपक' (Metaphor) के लिए पहचाने जाते हैं।

➤  छंद विविधता : उन्होंने दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त और सवैया आदि छंदों का प्रयोग किया है।


भाग 1 : कवितावली (उत्तर कांड से)


इस अंश में तुलसीदास ने अपने समय की आर्थिक विषमता, गरीबी और भुखमरी का यथार्थ चित्रण किया है।


पद्यांश 1: पेट की आग (भुखमरी का चित्रण)


किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट,

चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेटकी।

पेटको पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,

अटत गहन-गन अहन अखेटकी।।

ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,

पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।

'तुलसी' बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,

आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी।।


शब्दार्थ : किसबी (धंधा/मजदूर),  बनिक (बनिये/व्यापारी),  भाट (चारण/प्रशंसा करने वाले),  चेटकी (बाजीगर),  अटत (घूमता है),  अहन (दिन),  अखेटकी (शिकारी),  बड़वागि (समुद्र की आग)।

सप्रसंग व्याख्या : तुलसीदास कहते हैं कि इस संसार में मजदूर, किसान परिवार, व्यापारी, भिखारी, भाट, नौकर, चंचल नट, चोर, दूत (चार) और बाजीगर - ये सभी लोग जो कुछ भी करते हैं, पेट के लिए ही करते हैं।

लोग पेट भरने के लिए पढ़ते हैं, तरह-तरह की कलाएं सीखते हैं (गुन गढ़त), और यहाँ तक कि पहाड़ों पर चढ़ते हैं। शिकारी दिन भर घने जंगलों में शिकार की तलाश में भटकता है।

पेट की आग बुझाने के लिए लोग ऊँचे-नीचे (अच्छे-बुरे) कर्म करते हैं, धर्म और अधर्म का विचार नहीं करते।

भूख की विवशता इतनी भयानक है कि लोग अपने बेटा-बेटी तक को बेच देते हैं (बेचत बेटा-बेटकी)।

तुलसीदास कहते हैं कि पेट की यह आग, समुद्र में लगने वाली आग (बड़वाग्नि) से भी बड़ी और भयानक है। इसे केवल राम रूपी घनश्याम (बादल) ही अपनी कृपा रूपी जल से बुझा सकते हैं।


पद्यांश 2 : अकाल और दरिद्रता (गरीबी रूपी रावण)


खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,

बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।

जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,

कहें एक एकन सों 'कहाँ जाई, का करी?'

बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,

साँकरे सबै पै, राम ! रावरें कृपा करी।

दारिद-दसानन दुरित-दहन देखि,

तुलसी हहा करी।।


शब्दार्थ : बलि (दान),  बनिज (व्यापार),  सीद्यमान (दुखी),  साँकरे (संकट),  दारिद-दसानन (दरिद्रता रूपी रावण),  दुरित (पाप),  हहा करी (दुखी होकर पुकारना)।

सप्रसंग व्याख्या : तुलसीदास अपने समय की भीषण मंदी का वर्णन करते हैं। किसान के पास खेती नहीं है, भिखारी को भीख या दान नहीं मिलता, व्यापारी का व्यापार ठप है और नौकर को नौकरी नहीं मिल रही।

जिनके पास कोई रोजगार नहीं है (जीविका विहीन), वे लोग बहुत दुखी और चिंता में हैं। वे एक-दूसरे से पूछते हैं - "कहाँ जाएँ? क्या करें?" (कहाँ जाई, का करी?)

तुलसीदास राम से प्रार्थना करते हैं: हे राम! वेदों और पुराणों में कहा गया है और लोक में भी देखा गया है कि जब सब पर संकट (साँकरे) आता है, तब आप ही कृपा करते हैं।

अभी गरीबी रूपी रावण (दारिद-दसानन) ने पूरी दुनिया को दबा रखा है। इस पाप की जलती हुई आग को देखकर तुलसीदास त्राहि-त्राहि (हहाकार) कर रहे हैं।


पद्यांश 3 : सामाजिक समरसता और आत्मविश्वास


धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।

काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ।।

तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ।

माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।


शब्दार्थ : धूत (धूर्त/त्यागा हुआ),  अवधूत (संन्यासी),  जोलहा (जुलाहा/बुनकर),  सरनाम (प्रसिद्ध),  मसीत (मस्जिद)।

सप्रसंग व्याख्या : तुलसीदास समाज के जाति-पाँति के बंधनों और निंदा की परवाह नहीं करते। वे कहते हैं: चाहे कोई मुझे धूर्त कहे या संन्यासी (अवधूत), चाहे कोई मुझे राजपूत कहे या जुलाहा (निम्न जाति) - मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।

मुझे किसी की बेटी से अपने बेटे की शादी नहीं करवानी है, जिससे मैं किसी की जाति बिगाड़ दूँ। (तात्पर्य: वे गृहस्थ जीवन और जाति-प्रथा के झंझटों से मुक्त हैं)।

तुलसीदास कहते हैं: मैं तो राम का प्रसिद्ध गुलाम (भक्त) हूँ। जिसे जो अच्छा लगे, वह मेरे बारे में वही कहे।

मैं तो माँग कर खाता हूँ और मस्जिद (मसीत) में सोता हूँ। मेरा किसी से कोई लेना-देना नहीं है (लैबोको एकु न दैबको दोऊ - न एक लेना, न दो देना)।

विशेष : 'मस्जिद में सोना' तुलसीदास की उदारता और समाज के रूढ़िवादी बंधनों से मुक्ति को दर्शाता है।


भाग 2 : लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप


यह प्रसंग 'रामचरितमानस' के लंका कांड से लिया गया है। जब लक्ष्मण को शक्ति बाण लगता है और वे मूर्छित हो जाते हैं, तब राम एक साधारण मनुष्य की तरह विलाप करते हैं।


1. दोहा (हनुमान का प्रस्थान)

हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने जा रहे हैं। वे भरत जी से मिलते हैं और कहते हैं कि "हे नाथ! मैं आपके प्रताप को हृदय में रखकर तुरंत (संजीवनी लेकर) पहुँच जाऊँगा।" ऐसा कहकर और भरत के चरणों की वंदना करके हनुमान चल दिए।


2. राम का विलाप (मानवीय संवेदना)


➤  अर्द्धरात्रि बीत गई : आधी रात बीत गई, लेकिन हनुमान नहीं लौटे। राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को उठाकर हृदय से लगा लिया।

➤  राम के वचन : राम एक साधारण मनुष्य की तरह (मनुज अनुसारी) विलाप करते हैं:

➤  "हे भाई! तुम मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदा कोमल (मृदुल) रहा है।"

➤  "मेरे हित के लिए तुमने माता-पिता को त्याग दिया और जंगल में सर्दी, गर्मी और हवा (बिपिन हिम आतप बाता) को सहा।"

➤  "अब वह प्रेम (अनुराग) कहाँ है? मेरे व्याकुल वचन सुनकर तुम उठते क्यों नहीं?"

➤  पछतावा : "अगर मैं जानता कि वन में भाई से बिछोह होगा, तो मैं पिता के वचन (वनवास) को भी नहीं मानता।"


3. भाई का महत्त्व (संसार में सब मिल सकता है, भाई नहीं)


राम कहते हैं :

➤  "संसार में पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार - ये सब बार-बार मिलते हैं और जाते हैं। लेकिन सहोदर भाई (एक ही पेट से जन्मा भाई) बार-बार नहीं मिलता।"

➤  तुलना : "जैसे पंख के बिना पक्षी (खग) दीन है, मणि के बिना साँप (फनि) और सूंड के बिना हाथी (करिबर) शक्तिहीन है, वैसे ही तुम्हारे बिना मेरा जीवन है।"


4. नारी हानि vs भाई की हानि (सामाजिक दृष्टिकोण)


राम अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहते हैं :

➤  "मैं अयोध्या कौन सा मुँह लेकर जाऊँगा? लोग कहेंगे कि पत्नी के लिए प्यारे भाई को गँवा दिया।"

➤  "मैं पत्नी के खोने का अपयश (अपजस) तो संसार में सह लेता, क्योंकि नारी की हानि कोई विशेष क्षति नहीं है (उस समय के सामाजिक संदर्भ में), लेकिन भाई का खोना असहनीय है।"


5. माँ सुमित्रा को क्या जवाब दूँ?


राम कहते हैं : 

"अब मेरा कठोर हृदय अपयश और तुम्हारा शोक दोनों सहेगा। तुम अपनी माता (सुमित्रा) के एकलौते पुत्र हो और उनके प्राणों के आधार हो। उन्होंने सब प्रकार से सुखद और हितकारी जानकर तुम्हें मेरे हाथों में सौंपा था। मैं वहाँ जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा?"

यह सोचकर राम की कमल जैसी आँखों (राजिव दल लोचन) से आँसू बहने लगे।


6. हनुमान का आगमन (वीर रस का संचार)


जब राम विलाप कर रहे थे, तो वानर समूह व्याकुल हो गया। तभी अचानक हनुमान (संजीवनी लेकर) आ गए।

कवि कहते हैं : हनुमान का आना ऐसा लगा जैसे करुण रस के बीच वीर रस का प्रसंग आ गया हो।

राम ने प्रसन्न होकर हनुमान को गले लगाया। वैद्य ने तुरंत उपाय किया और लक्ष्मण हर्षित होकर उठ बैठे।


7. कुंभकर्ण का जागना


रावण को जब पता चला कि लक्ष्मण ठीक हो गए हैं, तो उसने निराश होकर सिर धुना। व्याकुल होकर वह अपने भाई कुंभकर्ण के पास गया और उसे जगाया।

कुंभकर्ण जागा तो ऐसा लग रहा था मानो साक्षात् काल (यमराज) शरीर धारण करके बैठा हो।

कुंभकर्ण ने पूछा : "हे भाई! तुम्हारा मुख क्यों सूखा हुआ है?"

रावण ने बताया कि उसने सीता का हरण किया है और वानरों ने बड़े-बड़े राक्षसों (अतिकाय, अकंपन, महोदर) को मार डाला है।


4. काव्य-सौंदर्य और शिल्प (Literary Devices)

 

रस (Ras) :

➤  'लक्ष्मण-मूर्च्छा' में मुख्य रूप से करुण रस है।

➤  हनुमान के आने पर वीर रस का संचार होता है।

➤  'कवितावली' में शांत और भक्ति रस है।


अलंकार (Alankar) :

➤  रूपक : 'दारिद-दसानन' (गरीबी रूपी रावण), 'राम घनस्याम' (राम रूपी बादल)।

➤  उपमा : 'मनि बिनु फनि' (मणि के बिना साँप की तरह)।

➤  उत्प्रेक्षा : 'मानहुँ कालु देह धरि बैसा' (मानो काल बैठा हो)।

➤  अनुप्रास : 'किसबी किसान', 'बेचत बेटा-बेटकी'।


भाषा (Language) :

➤  'कवितावली' : ब्रजभाषा।

➤ 'रामचरितमानस' (लक्ष्मण-मूर्च्छा) : अवधी।


छंद (Meter) :

➤  'कवितावली' : कवित्त और सवैया (वर्णिक छंद)।

➤  'लक्ष्मण-मूर्च्छा' : दोहा, चौपाई, सोरठा।


महत्त्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Important Questions)


प्रश्न 1: पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है - स्पष्ट करें।

उत्तर : तुलसीदास का मानना है कि पेट की आग (भूख) समुद्र की आग (बड़वाग्नि) से भी बड़ी है। मनुष्य इसके लिए गलत-सही सब कर्म करता है। इस आग को बुझाने की क्षमता केवल 'राम रूपी घनश्याम' (बादल) में है। इसका अर्थ है कि ईश्वर की कृपा से ही मनुष्य को संतोष और जीवन निर्वाह के साधन मिल सकते हैं, साथ ही आध्यात्मिक शांति भी।


प्रश्न 2 : "धूत कहौ..." छंद में तुलसी की कैसी भीतरी असलियत प्रकट होती है?

उत्तर : इस छंद में तुलसीदास एक स्वाभिमानी भक्त के रूप में सामने आते हैं। वे समाज के व्यंग्य और जाति-पाँति के भेदभाव को पूरी तरह नकार देते हैं। वे कहते हैं कि "माँग कर खाऊँगा और मस्जिद में सोऊँगा", जो यह दर्शाता है कि राम का गुलाम होने के बाद उन्हें समाज की परवाह नहीं है। वे निर्भीक और मस्तमौला संत हैं।


प्रश्न 3 : राम ने "नारि हानि बिसेष छति नाहीं" क्यों कहा?

उत्तर : राम ने यह बात शोक और हताशा की स्थिति में कही। उस युग के सामाजिक मूल्यों के अनुसार भाई का स्थान पत्नी से ऊँचा माना जाता था। राम कहते हैं कि पत्नी तो फिर मिल सकती है, लेकिन सगा भाई दोबारा नहीं मिल सकता। यहाँ उनका उद्देश्य नारी का अपमान करना नहीं, बल्कि लक्ष्मण के प्रति अपने प्रेम की गहनता और उनके बिछोह की असहनीय पीड़ा को व्यक्त करना है।


प्रश्न 4 : "भ्रातृशोक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है" - क्या आप सहमत हैं?

 * उत्तर: हाँ, हम पूर्णतः सहमत हैं। इस प्रसंग में राम 'ईश्वर' नहीं, बल्कि एक साधारण 'मनुष्य' की तरह रोते हैं। वे भाई की यादें ताज़ा करते हैं, माँ को जवाब देने की चिंता करते हैं, और अपनी असमर्थता जताते

 हैं। उनके आँसू और प्रलाप (तर्कहीन बातें) एक सामान्य व्यक्ति के दुख को दर्शाते हैं, जिससे पाठक सीधे उनसे जुड़ पाता है।

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